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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2745)

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः

विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

ततो विनशनं राजन् जगामाथ हलायुधः ।
शूद्राभीरान् प्रति द्वेषाद् यत्र नष्टा सरस्वती ॥ १ ॥
तस्मात् तु ऋषयो नित्यं प्राहुर्विनशनेति च ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उदपानतीर्थसे चलकर हलधारी बलराम विनशनतीर्थमें आये, जहाँ (दुष्कर्मपरायण) शूद्रों और आभीरोंके प्रति द्वेष होनेसे सरस्वती नदी विनष्ट (अदृश्य) हो गयी है। इसीलिये ऋषिगण उसे सदा विनशनतीर्थ कहते हैं ॥ १ १/२ ॥

तत्राप्युपस्पृश्य बलः सरस्वत्यां महाबलः ॥ २ ॥
सुभूमिकं ततोऽगच्छत् सरस्वत्यास्तटे वरे ।
महाबली बलराम वहाँ भी सरस्वतीमें आचमन और स्नान करके उसके सुन्दर तटपर स्थित हुए 'सुभूमिक' तीर्थमें गये ॥ २ १/२ ॥

तत्र चाप्सरसः शुभ्रा नित्यकालमतन्द्रिताः ॥ ३ ॥
क्रीडाभिर्विमलाभिश्च क्रीडन्ति विमलाननाः ।
उस तीर्थमें गौरवर्ण तथा निर्मल मुखवाली सुन्दरी अप्सराएँ आलस्य त्यागकर सदा नाना प्रकारकी विमल क्रीडाओंद्वारा मनोरंजन करती हैं ॥ ३ १/२ ॥

तत्र देवाः सगन्धर्वा मासि मासि जनेश्वर ॥ ४ ॥
अभिगच्छन्ति तत् तीर्थं पुण्यं ब्राह्मणसेवितम् ।
जनेश्वर! वहाँ उस ब्राह्मणसेवित पुण्यतीर्थमें गन्धर्वोंसहित देवता भी प्रतिमास आया करते हैं ॥ ४ १/२ ॥

तत्रादृश्यन्त गन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५ ॥
समेत्य सहिता राजन् यथाप्राप्तं यथासुखम् ।
राजन्! गन्धर्वगण और अप्सराएँ एक साथ मिलकर वहाँ आती और सुखपूर्वक विचरण करती दिखायी देती हैं ॥ ५ १/२ ॥

तत्र मोदन्ति देवाश्च पितरश्च सवीरुधः ॥ ६ ॥

पुण्यैः पुष्पैः सदा दिव्यैः कीर्यमाणाः पुनः पुनः ।
वहाँ देवता और पितर लता-वेलोंके साथ आमोदित होते हैं, उनके ऊपर सदा पवित्र एवं दिव्य पुष्पोंकी वर्षा बारंबार होती रहती है ॥ ६ १/२ ॥
आक्रीडभूमिः सा राजंस्तासामप्सरसां शुभा ॥ ७ ॥
सुभूमिकेति विख्याता सरस्वत्यास्तटे वरे ।
राजन्! सरस्वतीके सुन्दर तटपर वह उन अप्सराओंकी मंगलमयी क्रीडाभूमि है, इसलिये वह स्थान सुभूमिक नामसे विख्यात है ॥ ७ १/२ ॥
तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च वसु विप्राय माधवः ॥ ८ ॥
श्रुत्वा गीतं च तद् दिव्यं वादित्राणां च निःस्वनम् ।
छायाश्च विपुला दृष्ट्वा देवगन्धर्वरक्षसाम् ॥ ९ ॥
गन्धर्वाणां ततस्तीर्थमागच्छद् रोहिणीसुतः ।
बलरामजीने वहाँ स्नान करके ब्राह्मणोंको धन दान किया और दिव्य गीत एवं दिव्य वाद्योंकी ध्वनि सुनकर देवताओं, गन्धर्वों तथा राक्षसोंकी बहुत-सी मूर्तियोंका दर्शन किया। तत्पश्चात् रोहिणीनन्दन बलराम गन्धर्वतीर्थमें गये ॥ ८-९ १/२ ॥
विश्वावसुमुखास्तत्र गन्धर्वास्तपसान्विताः ॥ १० ॥
नृत्यवादित्रगीतं च कुर्वन्ति सुमनोरमम् ।
वहाँ तपस्यामें लगे हुए विश्वावसु आदि गन्धर्व अत्यन्त मनोरम नृत्य, वाद्य और गीतका आयोजन करते रहते हैं ॥ १० १/२ ॥
तत्र दत्त्वा हलधरो विप्रेभ्यो विविधं वसु ॥ ११ ॥
अजाविकं गोखरोष्ट्रं सुवर्णं रजतं तथा ।
भोजयित्वा द्विजान् कामैः संतर्प्य च महाधनैः ॥ १२ ॥
प्रययौ सहितो विप्रैः स्तूयमानश्च माधवः ।
हलधरने वहाँ भी ब्राह्मणोंको भेड़, बकरी, गाय, गदहा, ऊँट और सोना-चाँदी आदि नाना प्रकारके धन देकर उन्हें इच्छानुसार भोजन कराया तथा प्रचुर धनसे संतुष्ट करके ब्राह्मणोंके साथ ही वहाँसे प्रस्थान किया। उस समय ब्राह्मण लोग बलरामजीकी बड़ी स्तुति करते थे ॥ ११-१२ १/२ ॥
तस्माद् गन्धर्वतीर्थाच्च महाबाहुररिंदमः ॥ १३ ॥
गर्गस्रोतो महातीर्थमाजगामैककुण्डली ।
उस गन्धर्वतीर्थसे चलकर एक कानमें कुण्डल धारण करनेवाले शत्रुदमन महाबाहु बलराम गर्गस्रोत नामक महातीर्थमें आये ॥ १३ १/२ ॥
तत्र गर्गेण वृद्धेन तपसा भावितात्मना ॥ १४ ॥
कालज्ञानगतिश्चैव ज्योतिषां च व्यतिक्रमः ।

उत्पाता दारुणाश्चैव शुभाश्च जनमेजय ।। १५ ।।
सरस्वत्याः शुभे तीर्थे विदिता वै महात्मना।
तस्य नाम्ना च तत् तीर्थं गर्गस्रोत इति स्मृतम् ।। १६ ।।
जनमेजय! वहाँ तपस्यासे पवित्र अन्तःकरणवाले महात्मा वृद्ध गर्गने सरस्वतीके उस शुभ तीर्थमें कालका ज्ञान, कालकी गति, ग्रहों और नक्षत्रोंके उलट-फेर, दारुण उत्पात तथा शुभ लक्षण—इन सभी बातोंकी जानकारी प्राप्त कर ली थी। उन्हींके नामसे वह तीर्थ गर्गस्रोत कहलाता है ।। १४—१६ ।।

तत्र गर्गं महाभागमृषयः सुव्रता नृप ।
उपासांचक्रिरे नित्यं कालज्ञानं प्रति प्रभो ।। १७ ।।
सामर्थ्यशाली नरेश्वर! वहाँ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषियोंने कालज्ञानके लिये सदा महाभाग गर्गमुनिकी उपासना (सेवा) की थी ।। १७ ।।

तत्र गत्वा महाराज बलः श्वेतानुलेपनः ।
विधिवद्धि धनं दत्त्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ।। १८ ।।
उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान् विप्रेभ्यो विप्रदाय सः ।
नीलवासास्तदागच्छच्छङ्खतीर्थं महायशाः ।। १९ ।।
महाराज! वहाँ जाकर श्वेतचन्दनचर्चित, नीलाम्बरधारी महायशस्वी बलरामजी विशुद्ध अन्त करणवाले महर्षियोंको विधिपूर्वक धन देकर ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ समर्पित करके वहाँसे शंखतीर्थमें चले गये ।। १८-१९ ।।

तत्रापश्यन्महाशङ्खं महामेरुमिवोच्छ्रितम् ।
श्वेतपर्वतसंकाशमृषिसंघैर्निषेवितम् ।। २० ।।
सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो बली ।
वहाँ तालचिह्नित ध्वजावाले बलवान् बलरामने महाशंख नामक एक वृक्ष देखा, जो महान् मेरुपर्वतके समान ऊँचा और श्वेताचलके समान उज्ज्वल था। उसके नीचे ऋषियोंके समूह निवास करते थे। वह वृक्ष सरस्वतीके तटपर ही उत्पन्न हुआ था ।। २० १/२ ।।

यक्षा विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चामितौजसः ।। २१ ।।
पिशाचाश्चामितबला यत्र सिद्धाः सहस्रशः ।
उस वृक्षके आस-पास यक्ष, विद्याधर, अमित तेजस्वी राक्षस, अनन्त बलशाली पिशाच तथा सिद्धगण सहस्रोंकी संख्यामें निवास करते थे ।। २१ १/२ ।।

ते सर्वे ह्यशनं त्यक्त्वा फलं तस्य वनस्पतेः ।। २२ ।।
व्रतैश्च नियमैश्चैव काले काले स्म भुञ्जते ।
वे सब-के-सब अन्न छोड़कर व्रत और नियमोंका पालन करते हुए समय-समयपर उस वृक्षका ही फल खाया करते थे ।। २२ १/२ ।।

प्राप्तैश्च नियमैस्तैस्तैर्विचरन्तः पृथक् पृथक् ।। २३ ।।

अदृश्यमाना मनुजैर्व्यचरन् पुरुषर्षभ ।
एवं ख्यातो नरव्याघ्र लोकेऽस्मिन् स वनस्पतिः ॥ २४ ॥
पुरुषश्रेष्ठ! वे उन स्वीकृत नियमोंके अनुसार पृथक्-पृथक् विचरते हुए मनुष्योंसे अदृश्य रहकर घूमते थे। नरव्याघ्र! इस प्रकार वह वनस्पति इस विश्वमें विख्यात था ॥ २३-२४ ॥
ततस्तीर्थं सरस्वत्याः पावनं लोकविश्रुतम् ।
तस्मिंश्च यदुशार्दूलो दत्त्वा तीर्थे पयस्विनीः ॥ २५ ॥
ताम्रायसानि भाण्डानि वस्त्राणि विविधानि च ।
पूजयित्वा द्विजांश्चैव पूजितश्च तपोधनैः ॥ २६ ॥
वह वृक्ष सरस्वतीका लोकविख्यात पावन तीर्थ है। यदुश्रेष्ठ बलराम उस तीर्थमें दूध देनेवाली गौओंका दान करके ताँबे और लोहेके बर्तन तथा नाना प्रकारके वस्त्र भी ब्राह्मणोंको दिये। ब्राह्मणोंका पूजन करके वे स्वयं भी तपस्वी मुनियोंद्वारा पूजित हुए ॥ २५-२६ ॥
पुण्यं द्वैतवनं राजन्नाजगाम हलायुधः ।
तत्र गत्वा मुनीन् दृष्ट्वा नानावेषधरान् बलः ॥ २७ ॥
आप्लुत्य सलिले चापि पूजयामास वै द्विजान् ।
राजन्! वहाँसे हलधर बलभद्रजी पवित्र द्वैतवनमें आये और वहाँके नाना वेशधारी मुनियोंका दर्शन करके जलमें गोता लगाकर उन्होंने ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥
तथैव दत्त्वा विप्रेभ्यः परिभोगान् सुपुष्कलान् ॥ २८ ॥
ततः प्रायाद् बलो राजन् दक्षिणेन सरस्वतीम् ।
राजन्! इसी प्रकार विप्रवृन्दको प्रचुर भोगसामग्री अर्पित करके फिर बलरामजी सरस्वतीके दक्षिण तटपर होकर यात्रा करने लगे ॥ २८ ½ ॥
गत्वा चैवं महाबाहुर्नातिदूरे महायशाः ॥ २९ ॥
धर्मात्मा नागधन्वानं तीर्थमागमदच्युतः ।
यत्र पन्नगराजस्य वासुकेः संनिवेशनम् ॥ ३० ॥
महाद्युतेर्महाराज बहुभिः पन्नगैर्वृतम् ।
ऋषीणां हि सहस्राणि तत्र नित्यं चतुर्दश ॥ ३१ ॥
महाराज! इस प्रकार थोड़ी ही दूर जाकर महाबाहु, महायशस्वी धर्मात्मा भगवान् बलराम नागधन्वा नामक तीर्थमें पहुँच गये, जहाँ महातेजस्वी नागराज वासुकिका बहुसंख्यक सर्पोंसे घिरा हुआ निवासस्थान है। वहाँ सदा चौदह हजार ऋषि निवास करते हैं ॥ २९—३१ ॥
यत्र देवाः समागम्य वासुकिं पन्नगोत्तमम् ।
सर्वपन्नगराजनमभ्यषिञ्चन् यथाविधि ॥ ३२ ॥

वहीं देवताओंने आकर सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकिको समस्त सर्पोंके राजाके पदपर विधिपूर्वक अभिषिक्त किया था ॥ ३२ ॥
पन्नगेभ्यो भयं तत्र विद्यते न स्म पौरव ।
तत्रापि विधिवद् दत्त्वा विप्रेभ्यो रत्नसंचयान् ॥ ३३ ॥
प्रायात् प्राचीं दिशं तत्र तत्र तीर्थान्यनेकGeneric: । -> प्रायात् प्राचीं दिशं तत्र तत्र तीर्थान्यनेकशः ।
सहस्रशतसंख्यानि प्रथितानि पदे पदे ॥ ३४ ॥
पौरव! वहाँ किसीको सर्पोंसे भय नहीं होता। उस तीर्थमें भी बलरामजी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक ढेर-के-ढेर रत्न देकर पूर्वदिशाकी ओर चल दिये, जहाँ पग-पगपर अनेक प्रकारके प्रसिद्ध तीर्थ प्रकट हुए हैं। उनकी संख्या लगभग एक लाख है ॥ ३३-३४ ॥
आप्लुत्य तत्र तीर्थेषु यथोक्तं तत्र चर्षिभिः ।
कृत्वोपवासनियमं दत्त्वा दानानि सर्वशः ॥ ३५ ॥
अभिवाद्य मुनींस्तान् वै तत्र तीर्थनिवासिनः ।
उद्दिष्टमार्गः प्रययौ यत्र भूयः सरस्वती ॥ ३६ ॥
प्राङ्मुखं वै निवृते वृष्टिर्वातहता यथा ।
उन तीर्थोंमें स्नान करके उन्होंने ऋषियोंके बताये अनुसार व्रत-उपवास आदि नियमोंका पालन किया। फिर सब प्रकारके दान करके तीर्थनिवासी मुनियोंको मस्तक नवाकर उनके बताये हुए मार्गसे वे पुनः उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ सरस्वती हवाकी मारी हुई वर्षाके समान पुनः पूर्वदिशाकी ओर लौट पड़ी हैं ॥
ऋषीणां नैमिषेयाणामवेक्षार्थं महात्मनाम् ॥ ३७ ॥
निवृत्तां तां सरिच्छ्रेष्ठां तत्र दृष्ट्वा तु लाङ्गली ।
बभूव विस्मितो राजन् बलः श्वेतानुलेपनः ॥ ३८ ॥
राजन्! नैमिषारण्यनिवासी महात्मा मुनियोंके दर्शनके लिये पूर्वदिशाकी ओर लौटी हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका दर्शन करके श्वेत-चन्दनचर्चित हलधारी बलराम आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ३७-३८ ॥

जनमेजय उवाच

कस्मात् सरस्वती ब्रह्मन् निवृत्ता प्राङ्मुखीभवत् ।
व्याख्यातमेतदिच्छामि सर्वमध्वर्युसत्तम ॥ ३९ ॥
कस्मिंश्चित् कारणे तत्र विस्मितो यदुनन्दनः ।
निवृत्ता हेतुना केन कथमेव सरिद्वरा ॥ ४० ॥
जनमेजयने पूछा—यजुर्वेदके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर! मैं आपके मुँहसे यह सुनना चाहता हूँ कि सरस्वती नदी किस कारणसे पीछे लौटकर पूर्वाभिमुख बहने लगी? क्या

कारण था कि वहाँ यदुनन्दन बलरामजीको भी आश्चर्य हुआ? सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती किस कारणसे और किस प्रकार पूर्वदिशाकी ओर लौटी थीं? ।।

वैशम्पायन उवाच

पूर्वं कृतयुगे राजन् नैमिषेयास्तपस्विनः ।
वर्तमाने सुविपुले सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ ४१ ॥
ऋषयो बहवो राजंस्तत् सत्रमभिप्रेदिरे ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है वहाँ बारह वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले एक महान् यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया गया था। उस सत्रमें नैमिषारण्यनिवासी तपस्वी मुनि तथा अन्य बहुतसे ऋषि पधारे थे ॥ ४१ १/२ ॥

उषित्वा च महाभागास्तस्मिन् सत्रे यथाविधि ॥ ४२ ॥
निवृत्ते नैमिषेये वै सत्रे द्वादशवार्षिके ।
आजग्मुर्ऋषयस्तत्र बहवस्तीर्थकारणात् ॥ ४३ ॥
नैमिषारण्यवासियोंके उस द्वादशवर्षीय यज्ञमें वे महाभाग ऋषि दीर्घकालतक रहे। जब वह यज्ञ समाप्त हो गया तब बहुत-से महर्षि तीर्थसेवनके लिये वहाँ आये ॥

ऋषीणां बहुलत्वात्तु सरस्वत्या विशाम्पते ।
तीर्थानि नगरायन्ते कूले वै दक्षिणे तदा ॥ ४४ ॥
प्रजानाथ! ऋषियोंकी संख्या अधिक होनेके कारण सरस्वतीके दक्षिण तटपर जितने तीर्थ थे, वे सभी नगरोंके समान प्रतीत होने लगे ॥ ४४ ॥

समन्तपञ्चकं यावत्तावत्ते द्विजसत्तमाः ।
तीर्थलोभान्ररव्याघ्र नद्यास्तीरं समाश्रिताः ॥ ४५ ॥
पुरुषसिंह! तीर्थसेवनके लोभसे वे ब्रह्मर्षिगण समन्तपंचक तीर्थतक सरस्वती नदीके तटपर ठहर गये ॥

जुह्वतां तत्र तेषां तु मुनीनां भावितात्मनाम् ।
स्वाध्यायेनातिमहता बभूवुः पूरिता दिशः ॥ ४६ ॥
वहाँ होम करते हुए पवित्रात्मा मुनियोंके अत्यन्त गम्भीर स्वरसे किये जानेवाले स्वाध्यायके शब्दसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठी थीं ॥ ४६ ॥

अग्निहोत्रैस्ततस्तेषां क्रियमाणैर्महात्मनाम् ।
अशोभत सरिच्छ्रेष्ठा दीप्यमानैः समन्ततः ॥ ४७ ॥
चारों ओर प्रकाशित हुए उन महात्माओंद्वारा किये जानेवाले यज्ञसे सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४७ ॥

वालखिल्या महाराज अश्मकुट्टाश्च तापसाः ।
दन्तोलूखलिनश्चान्ये प्रसंख्यानास्तथा परे ॥ ४८ ॥

वायुभक्षा जलाहाराः पर्णभक्षाश्च तापसाः ।
नानानियमयुक्ताश्च तथा स्थण्डिलशायिनः ॥ ४९ ॥
आसन् वै मुनयस्तत्र सरस्वत्याः समीपतः ।
शोभयन्तः सरिच्छ्रेष्ठां गङ्गामिव दिवौकसः ॥ ५० ॥
महाराज! सरस्वतीके उस निकटवर्ती तटपर सुप्रसिद्ध तपस्वी वालखिल्य, अश्मकुट्ट³, दन्तोलूखली³, प्रसंख्यान³, हवा पीकर रहनेवाले, जलपानपर ही निर्वाह करनेवाले, पत्तोंका ही आहार करनेवाले, भाँति-भाँतिके नियमोंमें संलग्न तथा वेदीपर शयन करनेवाले तपस्वीमुनि विराजमान थे। वे सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीकी उसी प्रकार शोभा बढ़ा रहे थे, जैसे देवतालोग गंगाजीकी ॥ ४८—५० ॥

शतशश्च समापेतुर्ऋषयः सत्रयाजिनः ।
तेऽवकाशं न ददृशुः सरस्वत्या महाव्रताः ॥ ५१ ॥
सत्रयागमें सम्मिलित हुए सैकड़ों महान् व्रतधारी ऋषि वहाँ आये थे; परंतु उन्होंने सरस्वतीके तटपर अपने रहनेके लिये स्थान नहीं देखा ॥ ५१ ॥

ततो यज्ञोपवीतैस्ते तत्तीर्थं निर्मिमाय वै ।
जुहुवुश्चाग्निहोत्रांश्च चक्रुश्च विविधाः क्रियाः ॥ ५२ ॥
तब उन्होंने यज्ञोपवीतसे उस तीर्थका निर्माण करके वहाँ अग्निहोत्रसम्बन्धी आहुतियाँ दीं और नाना प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान किया ॥ ५२ ॥

ततस्तमृषिसंघातं निराशं चिन्तयान्वितम् ।
दर्शयामास राजेन्द्र तेषामर्थे सरस्वती ॥ ५३ ॥
राजेन्द्र! उस समय उस ऋषिसमूहको निराश और चिन्तित जान सरस्वतीने उनकी अभीष्ट-सिद्धिके लिये उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ ५३ ॥

ततः कुञ्जान् बहून् कृत्वा संनिवृत्ता सरस्वती ।
ऋषीणां पुण्यतपसां कारुण्याज्जनमेजय ॥ ५४ ॥
जनमेजय! तत्पश्चात् बहुत-से कुंजोंका निर्माण करती हुई सरस्वती पीछे लौट पड़ीं; क्योंकि उन पुण्यतपस्वी ऋषियोंपर उनके हृदयमें करुणाका संचार हो आया था ॥ ५४ ॥

ततो निवृत्य राजेन्द्र तेषामर्थे सरस्वती ।
भूयः प्रतीच्याभिमुखी प्रसुस्राव सरिद्वरा ॥ ५५ ॥
राजेन्द्र! उनके लिये लौटकर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती पुनः पश्चिमकी ओर मुड़कर बहने लगीं ॥ ५५ ॥

अमोघागमनं कृत्वा तेषां भूयो व्रजाम्यहम् ।
इत्यद्भुतं महच्चक्रे तदा राजन् महानदी ॥ ५६ ॥

राजन्! उस महानदीने यह सोच लिया था कि मैं इन ऋषियोंके आगमनको सफल बनाकर पुनः पश्चिम मार्गसे ही लौट जाऊँगी। यह सोचकर ही उसने वह महान् अद्भुत कर्म किया ।। ५६ ।।
एवं स कुञ्जो राजन् वै नैमिषीय इति स्मृतः ।
कुरुश्रेष्ठ कुरुक्षेत्रे कुरुष्व महतीं क्रियाम् ।। ५७ ।।
नरेश्वर! इस प्रकार वह कुंज नैमिषीय नामसे प्रसिद्ध हुआ। कुरुश्रेष्ठ! तुम भी कुरुक्षेत्रमें महान् कर्म करो ।। ५७ ।।
तत्र कुञ्जान् बहून् दृष्ट्वा निवृत्तां च सरस्वतीम् ।
बभूव विस्मयस्तत्र रामस्याथ महात्मनः ।। ५८ ।।
वहाँ बहुत-से कुंजों तथा लौटी हुई सरस्वतीका दर्शन करके महात्मा बलरामजीको बड़ा विस्मय हुआ ।। ५८ ।।
उपस्पृश्य तु तत्रापि विधिवद् यदुनन्दनः ।
दत्त्वा दायान् द्विजातिभ्यो भाण्डानि विविधानि च ।। ५९ ।।
भक्ष्यं भोज्यं च विविधं ब्राह्मणेभ्यः प्रदाय च ।
ततः प्रायाद् बलो राजन् पूज्यमानो द्विजातिभिः ।। ६० ।।
यदुनन्दन बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके ब्राह्मणोंको धन और भाँति-भाँतिके बर्तन दान किये। राजन्! फिर उन्हें नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ देकर द्विजातियोंद्वारा पूजित होते हुए बलरामजी वहाँसे चल दिये ।। ५९-६० ।।
सरस्वतीतीर्थवरं नानाद्विजगणायुतम् ।
बदरेङ्गुदकाश्मर्यप्लक्षाम्रत्थविभीतकैः ।। ६१ ।।
कङ्कोलैश्च पलाशैश्च करीरैः पीलुभिस्तथा ।
सरस्वतीतीररुहैस्तरुभिर्विविधैस्तथा ।। ६२ ।।
करूषकवरैश्चैव बिल्वैराम्रातकैस्तथा ।
अतिमुक्तकषण्डैश्च पारिजातैश्च शोभितम् ।। ६३ ।।
कदलीवनभूयिष्ठं दृष्टिकान्तं मनोहरम् ।
वाय्वम्बुनफलपर्णादैर्दन्तोलूखलिकैरपि ।। ६४ ।।
तथाश्मकुट्टैर्वान्यैर्मुनिभिर्बहुभिर्वृतम् ।
स्वाध्यायघोषसंघुष्टं मृगयूथशताकुलम् ।। ६५ ।।
अहिंस्रैर्धर्मपरमैर्नृभिरत्यर्थसेवितम् ।
सप्तसारस्वतं तीर्थमाजगाम हलायुधः ।। ६६ ।।
यत्र मङ्कणकः सिद्धस्तपस्तेपे महामुनिः ।। ६७ ।।
तदनन्तर हलायुध बलदेवजी सप्तसारस्वत नामक तीर्थमें आये जो सरस्वतीके तीर्थोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। वहाँ अनेकानेक ब्राह्मणोंके समुदाय निवास करते थे। वेर, इंगुद, काश्मर्य

(गम्भारी), पाकर, पीपल, बहेड़े, कंकोल, पलाश, करीर, पीलु, करूष, बिल्व, अमड़ा, अतिमुक्त, पारिजात तथा सरस्वतीके तटपर उगे हुए अन्य नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित वह तीर्थ देखनेमें कमनीय और मनको मोह लेनेवाला है। वहाँ केलेके बहुत-से बगीचे हैं। उस तीर्थमें वायु, जल, फल और पत्ते चबाकर रहनेवाले, दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेनेवाले और पत्थरसे फोड़े हुए फल खानेवाले बहुतेरे वानप्रस्थ मुनि भरे हुए थे। वहाँ वेदोंके स्वाध्यायकी गम्भीर ध्वनि गूँज रही थी। मृगोंके सैकड़ों यूथ सब ओर फैले हुए थे। हिंसारहित धर्मपरायण मनुष्य उस तीर्थका अधिक सेवन करते थे। वहीं सिद्ध महामुनि मंकणकने बड़ी भारी तपस्या की थी ॥ ६१—६७ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥


१. पत्थरसे फोड़े हुए फलका भोजन करनेवाले। २. दाँतसे ही ओखलीका काम लेनेवाले अर्थात् ओखलीमें कूटकर नहीं, दाँतोंसे ही चबाकर खानेवाले। ३. गिने हुए फल खानेवाले।