महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextअपने धर्मपर दृष्टि रखनेवाले क्षत्रिय-बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वही यह मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ है? ।। ५१ ½ ।।
देवार्हा मानुषा भोगाः प्राप्ता असुलभा नृपैः ।। ५२ ।।
ऐश्वर्यं चोत्तमं प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया ।
जो दूसरे राजाओंके लिये दुर्लभ हैं, वे देवताओंको ही सुलभ होनेवाले मानवभोग मुझे प्राप्त हुए हैं। मैंने उत्तम ऐश्वर्य पा लिया है; अतः मुझसे उत्कृष्ट अन्त और किसका हुआ है? ।। ५२ ½ ।।
ससुहृत् सानुगश्चैव स्वर्गं गन्ताहमच्युत ।। ५३ ।।
यूयं निहतसंकल्पाः शोचन्तो वर्तयिष्यथ ।
अच्युत! मैं सुहृदों और सेवकोंसहित स्वर्गलोकमें जाऊँगा और तुमलोग भग्नमनोरथ होकर शोचनीय जीवन बिताते रहोगे ।। ५३ ½ ।।
(न मे विषादो भीमेन पादेन शिर आहतम् ।
काका वा कङ्कगृध्रा वा निधास्यन्ति पदं क्षणात् ।।)
भीमसेनने अपने पैरसे जो मेरे सिरपर आघात किया है, इसके लिये मुझे कोई खेद नहीं है; क्योंकि अभी क्षणभरके बाद कौए, कंक अथवा गृध्र भी तो इस शरीरपर अपना पैर रखेंगे।
संजय उवाच
अस्य वाक्यस्य निधने कुरुराजस्य धीमतः ।। ५४ ।।
अपतत् सुमहद् वर्षं पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् ।
संजय कहते हैं— राजन्! बुद्धिमान् कुरुराज दुर्योधनकी यह बात पूरी होते ही उसके ऊपर पवित्र सुगंधवाले पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी ।। ५४ ½ ।।
अवादयन्त गन्धर्वा वादित्रं सुमनोहरम् ।। ५५ ।।
जगुश्चाप्सरसो राज्ञो यशःसम्बद्धमेव च ।
गन्धर्वगण अत्यन्त मनोहर बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ राजा दुर्योधनके सुयशसम्बन्धी गीत गाने लगीं ।।
सिद्धाश्च मुमुचुर्वाचः साधु साध्विति पार्थिव ।। ५६ ।।
ववौ च सुरभिर्वायुः पुण्यगन्धो मृदुः सुखः ।
व्यराजंश्च दिशः सर्वा नभो वैडूर्यसंनिभम् ।। ५७ ।।
राजन्! उस समय सिद्धगण बोल उठे—‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’। फिर पवित्र गन्धवाली मनोहर, मृदुल एवं सुखदायक हवा चलने लगी। सारी दिशाओंमें प्रकाश छा गया और आकाश नीलमके समान चमक उठा ।। ५६-५७ ।।
अत्यद्भुतानि ते दृष्ट्वा वासुदेवपुरोगमाः ।