महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११६-
षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिका पराक्रम तथा दुर्योधन और कृतवर्माकी पुनः पराजय
संजय उवाच
ते किरन्तः शरव्रातान् सर्वे यत्ताः प्रहारिणः ।
त्वरमाणा महाराज युयुधानमयोधयन् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! वे प्रहारकुशल सम्पूर्ण योद्धा सावधान हो बड़ी फुर्तीके साथ बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए वहाँ युयुधानके साथ युद्ध करने लगे ॥ १ ॥
तं द्रोणः सप्तसप्तत्या जघान निशितैः शरैः ।
दुर्मर्षणो द्वादशभिर्दुःसहो दशभिः शरैः ॥ २ ॥
द्रोणाचार्यने सात्यकिको सतहत्तर तीखे बाणोंसे घायल कर दिया। फिर दुर्मर्षणने बारह और दुःसहने दस बाणोंसे उन्हें बींध डाला ॥ २ ॥
विकर्णश्चापि निशितैस्त्रिंशद्भिः कङ्कपत्रिभिः ।
विव्याध सव्ये पार्श्वे तु स्तनाभ्यामन्तरे तथा ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् विकर्णने भी कंककी पाँखवाले तीस तीखे बाणोंसे सात्यकिकी बायीं पसली और छाती छेद डाली ॥ ३ ॥
दुर्मुखो दशभिर्बाणैस्तथा दुःशासनोऽष्टभिः ।
चित्रसेनश्च शैनेयं द्वाभ्यां विव्याध मारिष ॥ ४ ॥
आर्य! तदनन्तर दुर्मुखने दस, दुःशासनने आठ और चित्रसेनने दो बाणोंसे सात्यकिको घायल कर दिया ॥ ४ ॥
दुर्योधनश्च महता शरवर्षेण माधवम् ।
अपीडयद् रणे राजन् शूराश्चान्ये महारथाः ॥ ५ ॥
राजन्! उस रणक्षेत्रमें दुर्योधन तथा अन्य शूरवीर महारथियोंने भारी बाण-वर्षा करके सात्यकिको पीड़ित कर दिया ॥ ५ ॥
सर्वतः प्रतिविद्धस्तु तव पुत्रैर्महारथैः ।
तान् प्रत्यविध्यद् वार्ष्णेयः पृथक् पृथगजिह्मगैः ॥ ६ ॥
आपके महारथी पुत्रोंद्वारा सब ओरसे घायल किये जानेपर वृष्णिवंशी वीर सात्यकिने उन सबको पृथक्-पृथक् अपने बाणोंसे बींधकर बदला चुकाया ॥ ६ ॥
भारद्वाजं त्रिभिर्बाणैर्दुःसहं नवभिः शरैः ।
विकर्णं पञ्चविंशत्या चित्रसेनं च सप्तभिः ॥ ७ ॥
दुर्मर्षणं द्वादशभिरष्टाभिश्च विविंशतिम् ।
सत्यव्रतं च नवभिर्विजयं दशभिः शरैः ॥ ८ ॥
उन्होंने द्रोणाचार्यको तीन, दुःसहको नौ, विकर्णको पचीस, चित्रसेनको सात, दुर्मर्षणको बारह, विविंशतिको आठ, सत्यव्रतको नौ तथा विजयको दस बाणोंसे घायल किया ॥ ७-८ ॥
ततो रुक्माङ्गदं चापं विधुन्वानो महारथः ।
अभ्ययात् सात्यकिस्तूर्णं पुत्रं तव महारथम् ॥ ९ ॥
तदनन्तर महारथी सात्यकिने सोनेके अंगदसे विभूषित अपने विशाल धनुषको हिलाते हुए तुरंत ही आपके महारथी पुत्र दुर्योधनपर आक्रमण किया ॥ ९ ॥
राजानं सर्वलोकस्य सर्वलोकमहारथम् ।
शरैरभ्याहनद् गाढं ततो युद्धमभूत् तयोः ॥ १० ॥
सब लोगोंके राजा और समस्त संसारके विख्यात महारथी दुर्योधनको उन्होंने अपने बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो उन दोनोंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ १० ॥
विमुञ्चन्तौ शरांस्तीक्ष्णान् संदधानौ च सायकान् ।
अदृश्यं समरेऽन्योन्यं चक्रतुस्तौ महारथौ ॥ ११ ॥
उन दोनों महारथियोंने समरभूमिमें बाणोंका संधान और तीखे बाणोंका प्रहार करते हुए एक-दूसरेको अदृश्य कर दिया ॥ ११ ॥
सात्यकिः कुरुराजेन निर्विद्धो बह्वशोभत ।
अस्रवद् रुधिरं भूरि स्वरसं चन्दनो यथा ॥ १२ ॥
सात्यकि कुरुराज दुर्योधनके बाणोंसे बिंधकर अधिक मात्रामें रक्त बहाने लगे। उस समय वे अपना रक्त बहाते हुए लाल चन्दनवृक्षके समान अधिक शोभा पा रहे थे ॥ १२ ॥
सात्वतेन च बाणौघैर्निर्विद्धस्तनयस्तव ।
शातकुम्भमयापीडो बभौ यूप इवोच्छ्रितः ॥ १३ ॥
सात्यकिके बाणसमूहोंसे घायल होकर आपका पुत्र दुर्योधन सुवर्णमय मुकुट धारण किये ऊँचे यूपके समान सुशोभित हो रहा था ॥ १३ ॥
माधवस्तु रणे राजन् कुरुराजस्य धन्विनः ।
धनुश्चिच्छेद समरे क्षुरप्रेण हसन्निव ॥ १४ ॥
राजन्! रणक्षेत्रमें सात्यकिने धनुर्धर दुर्योधनके धनुषको एक क्षुरप्रद्वारा हँसते हुए-से काट दिया ॥ १४ ॥
अथैनं छिन्नधन्वानं शरैर्बहुभिसचिनोत् ।
निर्भिन्नश्च शरैस्तेन द्विषता क्षिप्रकारिणा ॥ १५ ॥
नामृष्यत रणे राजा शत्रोर्विजयलक्षणम् ।
धनुष कट जानेपर उन्होंने बहुत-से बाण मारकर दुर्योधनके शरीरको चुन दिया। शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले अपने शत्रु सात्यकिके बाणोंद्वारा विदीर्ण होकर राजा दुर्योधन रणभूमिमें विपक्षीके उस विजय-सूचक पराक्रमको सह न सका ।। १५ १/२ ।।
अथान्यद् धनुरादाय हेमपृष्ठं दुरासदम् ।। १६ ।।
विव्याध सात्यकिं तूर्णं सायकानां शतेन ह ।
उसने सोनेकी पीठवाले दूसरे दुर्धर्ष धनुषको लेकर शीघ्र ही सौ बाणोंसे सात्यकिको घायल कर दिया ।। १६ १/२ ।।
सोऽतिविद्धो बलवता तव पुत्रेण धन्विना ।। १७ ।।
अमर्षवशमापन्नस्तव पुत्रमपीडयत् ।
आपके बलवान् और धनुर्धर पुत्रके द्वारा अत्यन्त घायल किये जानेपर सात्यकिने भी अमर्षके वशीभूत होकर आपके पुत्रको बड़ी पीड़ा दी ।। १७ १/२ ।।
पीडितं नृपतिं दृष्ट्वा तव पुत्रा महारथाः ।। १८ ।।
सात्यकिं शरवर्षेण छादयामासुरोजसा ।
राजाको पीड़ित देखकर आपके अन्य महारथी पुत्रोंने बलपूर्वक बाणोंकी वर्षा करके सात्यकिको आच्छादित कर दिया ।। १८ १/२ ।।
स छाद्यमानो बहुभिस्तव पुत्रैर्महारथैः ।। १९ ।।
एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सप्तभिः ।
दुर्योधनं च त्वरितो विव्याधाष्टभिराशुगैः ।। २० ।।
आपके बहुसंख्यक महारथी पुत्रोंद्वारा बाणोंसे आच्छादित किये जानेपर सात्यकिने उनमेंसे एक-एकको पहले पाँच-पाँच बाणोंसे घायल किया। फिर सात-सात बाणोंसे बींध डाला। तत्पश्चात् तुरंत ही आठ शीघ्रगामी बाणोंद्वारा दुर्योधनको भी गहरी चोट पहुँचायी ।। १९-२० ।।
प्रहसंश्चास्य चिच्छेद कार्मुकं रिपुभीषणम् ।
नागं मणिमयं चैव शरैर्ध्वजमपातयत् ।। २१ ।।
इसके बाद युयुधानने हँसते हुए ही दुर्योधनके शत्रु भीषण धनुषको और मणिमय नागसे चिह्नित ध्वजको भी बाणोंद्वारा काट गिराया ।। २१ ।।
हत्वा तु चतुरो वाहांश्चतुर्भिर्निशितैः शरैः ।
सारथिं पातयामास क्षुरप्रेण महायशाः ।। २२ ।।
फिर चार तीखे बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको मारकर महायशस्वी सात्यकिने क्षुरप्रद्वारा उसके सारथिको भी मार गिराया ।। २२ ।।
एतस्मिन्नन्तरे चैव कुरुराजं महारथम् ।
अवाकिरच्छरैर्हृष्टो बहुभिर्मर्मभेदिभिः ।। २३ ।।
तदनन्तर हर्षमें भरे हुए सात्यकिने महारथी कुरुराज दुर्योधनपर बहुत-से मर्मभेदी बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २३ ॥
स वध्यमानः समरे शैनेयस्य शरोत्तमैः ।
प्राद्रवत् सहसा राजन् पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ २४ ॥
आप्लुतश्च ततो यानं चित्रसेनस्य धन्विनः ।
राजन्! सात्यकिके श्रेष्ठ बाणोंद्वारा समरांगणमें क्षत-विक्षत होकर आपका पुत्र दुर्योधन सहसा भागा और धनुर्धर चित्रसेनके रथपर जा चढ़ा ॥ २४ १/२ ॥
हाहाभूतं जगच्चासीद् दृष्ट्वा राजानमाहवे ॥ २५ ॥
ग्रस्यमानं सात्यकिना खे सोममिव राहुणा ।
जैसे आकाशमें राहु चन्द्रमापर ग्रहण लगाता है, उसी प्रकार सात्यकिद्वारा राजा दुर्योधनको ग्रस्त होते देख वहाँ सब लोगोंमें हाहाकार मच गया ॥ २५ १/२ ॥
तं तु शब्दमथ श्रुत्वा कृतवर्मा महारथः ॥ २६ ॥
अभ्ययात् सहसा तत्र यत्रास्ते माधवः प्रभुः ।
उस कोलाहलको सुनकर महारथी कृतवर्मा सहसा वहीं आ पहुँचा, जहाँ शक्तिशाली सात्यकि खड़े थे ॥
विधुन्वानो धनुः श्रेष्ठं चोदयंश्चैव वाजिनः ॥ २७ ॥
भर्त्सयन् सारथिं चाग्रे याहि याहीति सत्वरम् ।
वह अपने श्रेष्ठ धनुषको कँपाता, घोड़ोंको हाँकता और 'आगे बढ़ो, जल्दी चलो' कहकर सारथिको फटकारता हुआ वहाँ आया ॥ २७ १/२ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य व्यादितास्यमिवान्तकम् ॥ २८ ॥
युयुधानो महाराज यन्तारमिदमब्रवीत् ।
महाराज! मुँह बाये हुए कालके समान कृतवर्माको वहाँ आते देख युयुधानने अपने सारथिसे कहा— ॥ २८ १/२ ॥
कृतवर्मा रथेनैष द्रुतमापतते शरी ॥ २९ ॥
प्रत्युद्याहि रथेनैनं प्रवरं सर्वधन्विनाम् ।
‘सूत! यह कृतवर्मा बाण लेकर रथके द्वारा तीव्र वेगसे आ रहा है। यह सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ है। तुम रथके द्वारा इसकी अगवानी करो' ॥ २९ १/२ ॥
ततः प्रजविताश्वेन विधिवत् कल्पितेन च ॥ ३० ॥
आससाद रणे भोजं प्रतिमानं धनुष्मताम् ।
तदनन्तर सात्यकि विधिपूर्वक सजाये गये तेज घोड़ोंवाले रथके द्वारा रणभूमिमें धनुर्धरोंके आदर्शभूत कृतवर्माके पास जा पहुँचे ॥ ३० १/२ ॥
ततः परमसंक्रुद्धौ ज्वलिताविव पावकौ ॥ ३१ ॥
समेयातां नरव्याघ्रौ व्याघ्राविव तरस्विनौ ।
तत्पश्चात् प्रज्वलित पावक और वेगशाली व्याघ्रोंके समान वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर अत्यन्त कुपित हो एक-दूसरेसे भिड़ गये ॥ ३१ १/२ ॥
कृतवर्मा तु शैनेयं षड्विंशत्या समर्पयत् ॥ ३२ ॥
निशितैः सायकैस्तीक्ष्णैर्यन्तारं चास्य पञ्चभिः ।
कृतवर्माने सात्यकिपर तेज धारवाले छब्बीस तीखे बाण चलाये और पाँच बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी घायल कर दिया ॥ ३२ १/२ ॥
चतुरश्चतुरो वाहांश्चतुर्भिः परमेषुभिः ॥ ३३ ॥
अविध्यत् साधुदान्तान् वै सैन्धवान् सात्वतस्य हि ।
इसके बाद चार उत्तम बाण मारकर उसने सात्यकिके सुशिक्षित एवं विनीत चारों सिंधी घोड़ोंको भी बींध डाला ॥ ३३ १/२ ॥
रुक्मध्वजो रुक्मपृष्ठं महद् विस्फार्य कार्मुकम् ॥ ३४ ॥
रुक्माङ्गदी रुक्मवर्मा रुक्मपुङ्खैरवारयत् ।
तदनन्तर सोनेके केयूर और सोनेके ही कवच धारण करनेवाले सुवर्णमय ध्वजासे सुशोभित कृतवर्माने सोनेकी पीठवाले अपने विशाल धनुषकी टंकार करके स्वर्णमय पंखवाले बाणोंसे सात्यकिको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ३४ १/२ ॥
ततोऽशीतिं शिनेः पौत्रः सायकान् कृतवर्मणे ॥ ३५ ॥
प्राहिणोत् त्वरया युक्तो द्रष्टुकामो धनंजयम् ।
तब शिनिपौत्र सात्यकिने बड़ी उतावलीके साथ मनमें अर्जुनके दर्शनकी कामना लिये वहाँ कृतवर्माको अस्सी बाण मारे ॥ ३५ १/२ ॥
सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुतापनः ॥ ३६ ॥
समकम्पत दुर्धर्षः क्षितिकम्पे यथाचलः ।
शत्रुओंको संताप देनेवाला दुर्धर्ष वीर कृतवर्मा अपने बलवान् शत्रु सात्यकिके द्वारा अत्यन्त घायल होकर उसी प्रकार काँपने लगा, जैसे भूकम्पके समय पर्वत हिलने लगता है ॥ ३६ १/२ ॥
त्रिषष्ट्या चतुरोऽस्याश्वान् सप्तभिः सारथिं तथा ॥ ३७ ॥
विव्याध निशितैस्तूर्णं सात्यकिः सत्यविक्रमः ।
तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी सात्यकिने तिरसठ बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको और सात तीखे बाणोंसे उसके सारथिको भी शीघ्र ही क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३७ १/२ ॥
सुवर्णपुङ्खं विशिखं समाधाय च सात्यकिः ॥ ३८ ॥
व्यसृजत् तं महाज्वालं संक्रुद्धमिव पन्नगम् ।
अब सात्यकिने अपने धनुषपर सुवर्णमय पंखवाले अत्यन्त तेजस्वी बाणका संधान किया, जो क्रोधमें भरे हुए सर्पके समान प्रतीत होता था। उस बाणको उन्होंने कृतवर्मापर छोड़ दिया॥ ३८१/२॥
सोऽविध्यत् कृतवर्माणं यमदण्डोपमः शरः॥ ३९॥
जाम्बूनदविचित्रं च वर्म निर्भिद्य भानुमत्।
अभ्यगाद् धरणीमुग्रो रुधिरेण समुक्षितः॥ ४०॥
सात्यकिका वह बाण यमदण्डके समान भयंकर था। उसने कृतवर्माके सुवर्णजटित चमकीले कवचको छिन्न-भिन्न करके उसे गहरी चोट पहुँचायी तथा खूनसे लथपथ होकर वह धरतीमें समा गया॥ ३९-४०॥
संजातरुधिरश्चाजौ सात्वतेषुभिरर्दितः।
सशरं धनुरुत्सृज्य न्यपतत् स्यन्दनोत्तमात्॥ ४१॥
युद्धस्थलमें सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो कृतवर्मा खूनकी धारा बहाता हुआ धनुष-बाण छोड़कर उस उत्तम रथसे उसके पिछले भागमें गिर पड़ा॥ ४१॥
स सिंहदंष्ट्रो जानुभ्यां पतितोऽमितविक्रमः।
शरार्दितः सात्यकिना रथोपस्थे नरर्षभः॥ ४२॥
सिंहके समान दाँतोंवाला अमितपराक्रमी नरश्रेष्ठ कृतवर्मा सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो घुटनोंके बलसे रथकी बैठकमें गिर गया॥ ४२॥
सहस्रबाहुसदृशमक्षोभ्यमिव सागरम्।
निवार्य कृतवर्माणं सात्यकिः प्रययौ ततः॥ ४३॥
सहस्रबाहु अर्जुनके समान दुर्जय तथा महासागरके समान अक्षोभ्य कृतवर्माको इस प्रकार पराजित करके सात्यकि वहाँसे आगे बढ़ गये॥ ४३॥
खड्गशक्तिधनुःकीर्णां गजाश्वरथसंकुलाम्।
प्रवर्तितोग्ररुधिरां शतशः क्षत्रियर्षभैः॥ ४४॥
प्रेक्षतां सर्वसैन्यानां मध्येन शिनिपुङ्गवः।
अभ्यागाद्वाहिनीं हित्वा वृत्रहेवासुरीं चमूम्॥ ४५॥
जैसे वृत्रनाशक इन्द्र असुरोंकी सेनाको लाँघकर जा रहे हों, उसी प्रकार शिनिप्रवर सात्यकि सम्पूर्ण सैनिकोंके देखते-देखते उनके बीचसे होकर उस सेनाका परित्याग करके चल दिये। उस कौरव-सेनामें सैकड़ों क्षत्रिय-शिरोमणियोंने भयानक रक्तकी धारा बहा दी थी। वहाँ हाथी, घोड़े तथा रथ खचाखच भरे हुए थे और खड्ग, शक्ति एवं धनुष सब ओर व्याप्त थे॥ ४४-४५॥
समाश्र्वस्य च हार्दिक्यो गृह्य चान्यन्महद् धनुः।
तस्थौ स तत्र बलवान् वारयन् युधि पाण्डवान्॥ ४६॥
उधर बलवान् कृतवर्मा आश्वस्त होकर दूसरा विशाल धनुष हाथमें लेकर युद्धस्थलमें पाण्डवोंका सामना करता हुआ वहीं खड़ा रहा ।। ४६ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे दुर्योधनकृतवर्मपराजये षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिके कौरव-सेनामें प्रवेशके पश्चात् दुर्योधन और कृतवर्माके पराजयविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११६ ।।