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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1916)

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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

कर्णका मद्र आदि बाहीक-निवासियोँके दोष बताना, शल्यका उत्तर देना और दुर्योधनका दोनोंको शान्त करना

कर्ण उवाच

हन्त शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ।
उच्यमानं मया सम्यक् त्वमेकाग्रमनाः शृणु ॥ १ ॥
**कर्ण बोला—**शल्य! पहले जो बातें बतायी गयी हैं, उन्हें समझो। अब मैं पुनः तुमसे कुछ कहता हूँ। मेरी कही हुई इस बातको तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो— ॥ १ ॥

ब्राह्मणः किल नो गेहमध्यगच्छत् पुरातिथिः ।
आचारं तत्र सम्प्रेक्ष्य प्रीतो वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
पूर्वकालमें एक ब्राह्मण अतिथिरूपसे हमारे घरपर ठहरा था। उसने हमारे यहाँका आचार-विचार देखकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए यह बात कही— ॥ २ ॥

मया हिमवतः शृङ्गमेकेनाध्युषितं चिरम् ।
दृष्टाश्च बहवो देशा नानाधर्मसमावृताः ॥ ३ ॥
‘मैंने अकेले ही दीर्घकालतक हिमालयके शिखरपर निवास किया है और विभिन्न धर्मोंसे सम्पन्न बहुत-से देश देखे हैं ॥ ३ ॥

न च केन च धर्मेण विरुध्यन्ते प्रजा इमाः ।
सर्वं हि तेऽब्रुवन् धर्मं यदुक्तं वेदपारगैः ॥ ४ ॥
‘इन सब देशोंके लोग किसी भी निमित्तसे धर्मके विरुद्ध नहीं जाते। वेदोंके पारगामी विद्वानोंने जैसा बताया है, उसी रूपमें वे लोग सम्पूर्ण धर्मको मानते और बतलाते हैं ॥ ४ ॥

अटता तु ततो देशान् नानाधर्मसमाकुलान् ।
आगच्छता महाराज वाहीकेषु निशामितम् ॥ ५ ॥
‘महाराज! विभिन्न धर्मोंसे युक्त अनेक देशोंमें घूमता-घामता जब मैं बाहीक देशमें आ रहा था, तब वहाँ ऐसी बातें देखने और सुननेमें आयीं ॥ ५ ॥

तत्र वै ब्राह्मणो भूत्वा ततो भवति क्षत्रियः ।
वैश्यः शूद्रश्च वाहीकस्ततो भवति नापितः ॥ ६ ॥
नापितश्च ततो भूत्वा पुनर्भवति ब्राह्मणः ।
द्विजो भूत्वा च तत्रैव पुनर्दासोऽभिजायते ॥ ७ ॥

'उस देशमें एक ही बाहीक पहले ब्राह्मण होकर फिर क्षत्रिय होता है। तत्पश्चात् वैश्य और शूद्र भी बन जाता है। उसके बाद वह नाई होता है। नाई होकर फिर ब्राह्मण हो जाता है। ब्राह्मण होनेके पश्चात् फिर वही दास बन जाता है* ।। ६-७ ।।
भवन्त्येककुले विप्राः प्रसृष्टाः कामचारिणः ।
गान्धारा मद्रकाश्चैव वाहीकाश्चाल्पचेतसः ॥ ८ ॥
'वहाँ एक ही कुलमें कुछ लोग ब्राह्मण और कुछ लोग स्वेच्छाचारी वर्णसंकर संतान उत्पन्न करनेवाले होते हैं। गान्धार, मद्र और बाहीक—इन सभी देशोंके लोग मन्दबुद्धि हुआ करते हैं ।। ८ ।।
एतन्मया श्रुतं तत्र धर्मसंकरकारकम् ।
कृत्स्नामटित्वा पृथिवीं वाहीकेषु विपर्ययः ॥ ९ ॥
'उस देशमें मैंने इस प्रकार धर्मसंकरता फैलानेवाली बातें सुनीं। सारी पृथ्वीमें घूमकर केवल बाहीक देशमें ही मुझे धर्मके विपरीत आचार-व्यवहार दिखायी दिया' ।।
हन्त शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ।
यदप्यन्योऽब्रवीद् वाक्यं वाहीकानां च कुत्सितम् ॥ १० ॥
शल्य! ये सब बातें जान लो। अभी और कहता हूँ। एक दूसरे यात्रीने भी बाहीकोंके सम्बन्धमें जो घृणित बातें बतायी थीं, उन्हें सुनो— ।। १० ।।
सती पुरा हृता काचिदारट्टात् किल दस्युभिः ।
अधर्मतश्चोपयाता सा तानभ्यशपत् ततः ॥ ११ ॥
'कहते हैं, प्राचीन कालमें लुटेरे डाकुओंने आरट्ट देशसे किसी सती स्त्रीका अपहरण कर लिया और अधर्मपूर्वक उसके साथ समागम किया। तब उसने उन्हें यह शाप दे दिया— ।। ११ ।।
बालां बन्धुमतीं यन्मामधर्मेणोपगच्छथ ।
तस्मान्नार्यो भविष्यन्ति बन्धक्यो वै कुलस्य च ॥ १२ ॥
न चैवास्मात् प्रमोक्ष्यध्वं घोरात् पापान्नराधमाः ।
'मैं अभी बालिका हूँ और मेरे भाई-बन्धु मौजूद हैं तो भी तुमलोगोंने अधर्मपूर्वक मेरे साथ समागम किया है। इसलिये इस कुलकी सारी स्त्रियाँ व्यभिचारिणी होंगी। नराधमो! तुम्हें इस घोर पापसे कभी छुटकारा नहीं मिलेगा' ।। १२ १/२ ।।
तस्मात् तेषां भागहरा भागिनेया न सूनवः ॥ १३ ॥
'इसलिये उनकी धन-सम्पत्तिके उत्तराधिकारी भानजे होते हैं, पुत्र नहीं ।। १३ ।।
कुरवः सहपाञ्चालाः शाल्वा मत्स्याः सनैमिषाः ।
कोसलाः काशयोऽङ्गाश्च कालिङ्गा मागधास्तथा ॥ १४ ॥
चेदयश्च महाभागा धर्मं जानन्ति शाश्वतम् ।

'कुरु, पांचाल, शाल्व, मत्स्य, नैमिष, कोसल, काशी, अंग, कलिंग, मगध और चेदिदेशोंके बड़भागी मनुष्य सनातन धर्मको जानते हैं ।। १४१/२ ।।

नानादेशेषु सन्तश्च प्रायो बाह्यालयादृते ।। १५ ।।
आ मत्स्येभ्यः कुरुपञ्चालदेश्या
आ नैमिषाच्चेदयो ये विशिष्टाः ।
धर्मं पुराणमुपजीवन्ति सन्तो
मद्रानृते पाञ्चनदांश्च जिह्यान् ।। १६ ।।

'भिन्न-भिन्न देशोंमें बाहीकनिवासियोंको छोड़कर प्रायः सर्वत्र श्रेष्ठ पुरुष उपलब्ध होते हैं। मत्स्यसे लेकर कुरु और पांचाल देशतक, नैमिषारण्यसे लेकर चेदिदेशतक जो लोग निवास करते हैं, वे सभी श्रेष्ठ एवं साधु पुरुष हैं और प्राचीन धर्मका आश्रय लेकर जीवननिर्वाह करते हैं। मद्र और पंचनद प्रदेशोंमें ऐसी बात नहीं है। वहाँके लोग कुटिल होते हैं' ।। १५-१६ ।।

एवं विद्वान् धर्मकथासु राजं-
स्तूष्णींभूतो जडवच्छल्य भूयः ।
त्वं तस्य गोप्ता च जनस्य राजा
षड्भागहर्ता शुभदुष्कृतस्य ।। १७ ।।

राजा शल्य! ऐसा जानकर तुम जड पुरुषोंके समान धर्मोपदेशकी ओरसे मुँह मोड़कर चुपचाप बैठे रहो। तुम बाहीक देशके लोगोंके राजा और रक्षक हो; अतः उनके पुण्य और पापका भी छठा भाग ग्रहण करते हो ।। १७ ।।

अथवा दुष्कृतस्य त्वं हर्ता तेषामरक्षिता ।
रक्षिता पुण्यभाग् राजा प्रजानां त्वं ह्यपुण्यभाक् ।। १८ ।।

अथवा उनकी रक्षा न करनेके कारण तुम केवल उनके पापोंमें ही हिस्सा बँटाते हो। प्रजाकी रक्षा करनेवाला राजा ही उसके पुण्यका भागी होता है; तुम तो केवल पापके ही भागी हो ।। १८ ।।

पूज्यमाने पुरा धर्मे सर्वदेशेषु शाश्वते ।
धर्मं पाञ्चनदं दृष्ट्वा धिगित्याह पितामहः ।। १९ ।।

पूर्वकालमें समस्त देशोंमें प्रचलित सनातन धर्मकी जब प्रशंसा की जा रही थी, उस समय ब्रह्माजीने पंचनदवासियोंके धर्मपर दृष्टिपात करके कहा था कि 'धिक्कार है इन्हें!' ।। १९ ।।

व्रात्यानां दासमीयानां कृतेऽप्यशुभकर्मणाम् ।
ब्रह्मणा निन्दिते धर्मे स त्वं लोके किमब्रवीः ।। २० ।।

संस्कारहीन, जारज और पापकर्मों पंचनदवासियोंके धर्मकी जब ब्रह्माजीने सत्ययुगमें भी निन्दा की, तब तुम उसी देशके निवासी होकर जगत्‌मे क्यों धर्मोपदेश करने चले

हो? ॥ २० ॥
इति पाञ्चनदं धर्ममवमेने पितामहः ।
स्वधर्मस्थेषु वर्षेषु सोऽप्येतान् नाभ्यपूजयत् ॥ २१ ॥
पितामह ब्रह्माने पंचनदनिवासियोंके आचार-व्यवहाररूपी धर्मका इस प्रकार अनादर किया है। अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले अन्य देशोंकी तुलनामें उन्होंने इनका आदर नहीं किया ॥ २१ ॥
हन्त शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ।
कल्माषपादः सरसि निमज्जन् राक्षसोऽब्रवीत् ॥ २२ ॥
शल्य! इन सब बातोंको अच्छी तरह जान लो। अभी इस विषयमें तुमसे कुछ और भी बातें बता रहा हूँ, जिन्हें सरोवरमें डूबते हुए राक्षस कल्माषपादने कहा था— ॥ २२ ॥
क्षत्रियस्य मलं भैक्ष्यं ब्राह्मणस्याश्रुतं मलम् ।
मलं पृथिव्यां वाहीकाः स्त्रीणां मद्रस्त्रियो मलम् ॥ २३ ॥
‘क्षत्रियका मल है भिक्षावृत्ति, ब्राह्मणका मल है वेद-शास्त्रोंके विपरीत आचरण, पृथ्वीके मल हैं बाहीक और स्त्रियोंके मल हैं मद्रदेशकी स्त्रियाँ’ ॥ २३ ॥
निमज्जमानमुद्धृत्य कश्चिद् राजा निशाचरम् ।
अपृच्छत् तेन चाख्यातं प्रोक्तवांस्तन्निबोध मे ॥ २४ ॥
उस डूबते हुए राक्षसका किसी राजाने उद्धार करके उससे कुछ प्रश्न किया। उनके उस प्रश्नके उत्तरमें राक्षसने जो कुछ कहा था, उसे सुनो— ॥ २४ ॥
मानुषाणां मलं म्लेच्छा म्लेच्छानां शौण्डिका मलम् ।
शौण्डिकानां मलं षण्ढाः षण्ढानां राजयाजकाः ॥ २५ ॥
‘मनुष्योंके मल हैं म्लेच्छ, म्लेच्छोंके मल हैं शराब बेचनेवाले कलाल, कलालोंके मल हैं हींजड़े और हींजड़ोंके मल हैं राजपुरोहित ॥ २५ ॥
राजयाजकयाज्यानां मद्रकाणां च यन्मलम् ।
तद् भवेद् वै तव मलं यद्यस्मान्न विमुञ्चसि ॥ २६ ॥
‘राजपुरोहितोंके पुरोहितों तथा मद्रदेशवासियोंका जो मल है, वह सब तुम्हें प्राप्त हो, यदि इस सरोवरसे तुम मेरा उद्धार न कर दो’ ॥ २६ ॥
इति रक्षोपसृष्टेषु विषवीर्यहतेषु च ।
राक्षसं भेषजं प्रोक्तं संसिद्धवचनोत्तरम् ॥ २७ ॥
जिनपर राक्षसोंका उपद्रव है तथा जो विषके प्रभावसे मारे गये हैं, उनके लिये यह उत्तम सिद्ध वाक्य ही राक्षसके प्रभावका निवारण करनेवाला एवं जीवनरक्षक औषध बताया गया है ॥ २७ ॥
ब्राह्मं पञ्चालाः कौरवेयास्तु धर्म्यं
सत्यं मत्स्याः शूरसेनाश्च यज्ञम् ।

प्राच्या दासा वृषला दाक्षिणात्याः
स्तेना वाहीकाः संकरा वै सुराष्ट्राः ॥ २८ ॥
पांचाल देशके लोग वेदोक्त धर्मका आश्रय लेते हैं, कुरुदेशके निवासी धर्मानुकूल कार्य करते हैं, मत्स्यदेशके लोग सत्य बोलते और शूरसेननिवासी यज्ञ करते हैं। पूर्वदेशके लोग दासकर्म करनेवाले, दक्षिणके निवासी वृषल, बाहीक देशके लोग चोर और सौराष्ट्र-निवासी वर्णसंकर होते हैं ॥ २८ ॥

कृतघ्नता परवित्तापहारो
मद्यपानं गुरुदारावमर्दः ।
वाक्पारुष्यं गोवधो रात्रिचर्या
बहिर्गेहं परवस्त्रोपभोगः ॥ २९ ॥
येषां धर्मस्तान् प्रति नास्त्यधर्मो
ह्यारट्टानां पञ्चनदान् धिगस्तु ।
कृतघ्नता, दूसरोंके धनका अपहरण, मदिरापान, गुरुपत्नीगमन, कटुवचनका प्रयोग, गोवध, रातके समय घरसे बाहर घूमना और दूसरोंके वस्त्रका उपभोग करना—ये सब जिनके धर्म हैं, उन आरट्टों और पंचनदवासियोंके लिये अधर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। उन्हें धिक्कार है! ॥ २९ १/२ ॥

आ पाञ्चाल्येभ्यः कुरवो नैमिषाश्च
मत्स्याश्चैतेऽप्यथ जानन्ति धर्मम् ।
अथोदीच्याश्चाङ्गका मागधाश्च
शिष्टान् धर्मानुपजीवन्ति वृद्धाः ॥ ३० ॥
पांचाल, कौरव, नैमिष और मत्स्यदेशोंके निवासी धर्मको जानते हैं। उत्तर, अंग तथा मगधदेशोंके वृद्ध पुरुष शास्त्रोक्त धर्मोंका आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं ॥

प्राचीं दिशं श्रिता देवा जातवेदःपुरोगमाः ।
दक्षिणां पितरो गुप्तां यमेन शुभकर्मणा ॥ ३१ ॥
प्रतीचीं वरुणः पाति पाल्यानः सुरान् बली ।
उदीचीं भगवान् सोमो ब्राह्मणैः सह रक्षति ॥ ३२ ॥
अग्नि आदि देवता पूर्वदिशाका आश्रय लेकर रहते हैं, पितर पुण्यकर्मा यमराजके द्वारा सुरक्षित दक्षिण दिशामें निवास करते हैं, बलवान् वरुण देवताओंका पालन करते हुए पश्चिम दिशाकी रक्षामें तत्पर रहते हैं और भगवान् सोम ब्राह्मणोंके साथ उत्तर दिशाकी रक्षा करते हैं ॥

तथा रक्षःपिशाचाश्च हिमवन्तं नगोत्तमम् ।
गुह्यकाश्च महाराज पर्वतं गन्धमादनम् ॥ ३३ ॥
ध्रुवः सर्वाणि भूतानि विष्णुः पाति जनार्दनः ।

महाराज! राक्षस, पिशाच और गुह्यक—ये गिरिराज हिमालय तथा गन्धमादन पर्वतकी रक्षा करते हैं और अविनाशी एवं सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन समस्त प्राणियोंका पालन करते हैं (परंतु बाहीक देशपर किसी भी देवताका विशेष अनुग्रह नहीं है) ॥ ३३ १/२ ॥
इङ्गितज्ञाश्च मगधाः प्रेक्षितज्ञाश्च कोसलाः ॥ ३४ ॥
अर्धोक्ताः कुरुपञ्चालाः शाल्वाः कृत्स्नानुशासनाः ।
पर्वतीयाश्च विषमा यथैव शिबयस्तथा ॥ ३५ ॥
मगधदेशके लोग इशारेसे ही सब बात समझ लेते हैं, कोसलनिवासी नेत्रोंकी भावभंगीसे मनका भाव जान लेते हैं, कुरु तथा पांचालदेशके लोग आधी बात कहनेपर ही पूरी बात समझ लेते हैं, शाल्वदेशके निवासी पूरी बात कह देनेपर उसे समझ पाते हैं, परंतु शिबिदेशके लोगोंकी भाँति पर्वतीय प्रान्तोंके निवासी इन सबसे विलक्षण होते हैं। वे पूरी बात कहनेपर भी नहीं समझ पाते ॥ ३४-३५ ॥
सर्वज्ञा यवना राजन् शूराश्चैव विशेषतः ।
म्लेच्छाः स्वसंज्ञानियता नानुक्तमितरे जनाः ॥ ३६ ॥
प्रतिरब्धास्तु वाहीका न च केचन मद्रकाः ।
राजन्! यद्यपि यवनजातीय म्लेच्छ सभी उपायोंसे बात समझ लेनेवाले और विशेषतः शूर होते हैं, तथापि अपने द्वारा कल्पित संज्ञाओंपर ही अधिक आग्रह रखते हैं (वैदिक धर्मको नहीं मानते)। अन्य देशोंके लोग बिना कहे हुए कोई बात नहीं समझते हैं, परंतु बाहीक देशके लोग सब काम उलटे ही करते हैं (उनकी समझ उलटी ही होती है) और मद्रदेशके कुछ निवासी तो ऐसे होते हैं कि कुछ भी नहीं समझ पाते ॥ ३६ १/२ ॥
स त्वमेतादृशः शल्य नोत्तरं वक्तुमर्हसि ।
पृथिव्यां सर्वदेशानां मद्रको मलमूच्यते ॥ ३७ ॥
शल्य! ऐसे ही तुम हो। अब मेरी बातका जवाब नहीं दोगे। मद्रदेशके निवासीको पृथ्‍वीके सम्पूर्ण देशोंका मल बताया जाता है ॥ ३७ ॥
सीधोः पानं गुरुतल्पावमर्दो
भ्रूणहत्या परवित्तापहारः ।
येषां धर्मस्तान् प्रति नास्त्यधर्म
आरट्टजान् पञ्चनदान् धिगस्तु ॥ ३८ ॥
मदिरापान, गुरुकी शय्याका उपभोग, भ्रूणहत्या और दूसरोंके धनका अपहरण—ये जिनके लिये धर्म हैं, उनके लिये अधर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। ऐसे आरट्ट और पंचनददेशके लोगोंको धिक्कार है! ॥
एतज्ज्ञात्वा जोषमास्व प्रतीपं मा स्म वै कृथाः ।
मा त्वां पूर्वमहं हत्वा हनिष्ये केशवार्जुनौ ॥ ३९ ॥

यह जानकर तुम चुपचाप बैठे रहो। फिर कोई प्रतिकूल बात मुँहसे न निकालो। अन्यथा पहले तुम्हींको मारकर पीछे श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध करूँगा ॥ ३९ ॥

शल्य उवाच

आतुराणां परित्यागः स्वदारसुतविक्रयः ।
अङ्गे प्रवर्तते कर्ण येषामधिपतिर्भवान् ॥ ४० ॥
**शल्य बोले—**कर्ण! तुम जहाँके राजा बनाये गये हो, उस अंगदेशमें क्या होता है? अपने सगे-सम्बन्धी जब रोगसे पीड़ित हो जाते हैं तो उनका परित्याग कर दिया जाता है। अपनी ही स्त्री और बच्चोंको वहाँके लोग सरे बाजार बेचते हैं ॥ ४० ॥
रथातिरथसंख्यायां यत् त्वां भीष्मस्तदाब्रवीत् ।
तान् विदित्वाऽऽत्मनो दोषान् निर्मन्युर्भव मा क्रुधः ॥ ४१ ॥
उस दिन रथी और अतिरथियोंकी गणना करते समय भीष्मजीने तुमसे जो कुछ कहा था, उसके अनुसार अपने उन दोषोंको जानकर क्रोधरहित हो शान्त हो जाओ ॥ ४१ ॥
सर्वत्र ब्राह्मणाः सन्ति सन्ति सर्वत्र क्षत्रियाः ।
वैश्याः शूद्रास्तथा कर्ण स्त्रियः साध्व्यश्च सुव्रताः ॥ ४२ ॥
कर्ण! सर्वत्र ब्राह्मण हैं। सब जगह क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं तथा सभी देशोंमें उत्तम व्रतका पालन करनेवाली साध्वी स्त्रियाँ होती हैं ॥ ४२ ॥
रमन्ते चोपहासेन पुरुषाः पुरुषैः सह ।
अन्योन्यमवतक्षन्तो देशे देशे समैथुनाः ॥ ४३ ॥
सभी देशोंके पुरुष दूसरे पुरुषोंके साथ बात करते समय उपहासके द्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचाते हैं और स्त्रियोंके साथ रमण करते हैं ॥ ४३ ॥
परवाच्येषु निपुणः सर्वो भवति सर्वदा ।
आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि च मुह्यति ॥ ४४ ॥
दूसरोंके दोष बतानेमें सभी लोग सदा ही निपुण होते हैं; परंतु अपने दोषोंका उन्हें पता नहीं रहता, अथवा जानकर भी अनजान बने रहते हैं ॥ ४४ ॥
सर्वत्र सन्ति राजानः स्वं स्वं धर्ममनुव्रताः ।
दुर्मनुष्यान् निगृह्णन्ति सन्ति सर्वत्र धार्मिकाः ॥ ४५ ॥
सभी देशोंमें अपने-अपने धर्मका पालन करनेवाले राजा रहते हैं, जो दुष्टोंका दमन करते हैं तथा सर्वत्र ही धर्मात्मा मनुष्य निवास करते हैं ॥ ४५ ॥
न कर्ण देशसामान्यात् सर्वः पापं निषेवते ।
यादृशाः स्वस्वभावेन देवा अपि न तादृशाः ॥ ४६ ॥
कर्ण! एक देशमें रहनेमात्रसे सब लोग पापका ही सेवन नहीं करते हैं। उसी देशमें मनुष्य अपने श्रेष्ठ शील-स्वभावके कारण ऐसे महापुरुष हो जाते हैं कि देवता भी उनकी

बराबरी नहीं कर सकते ।। ४६ ।।

संजय उवाच

ततो दुर्योधनो राजा कर्णशल्याववारयत् ।
सखिभावेन राधेयं शल्यं स्वाञ्जल्यकेन च ।। ४७ ।।
संजय कहते हैं— राजन्! तब राजा दुर्योधनने कर्ण तथा शल्य दोनोंको रोक दिया। उसने कर्णको तो मित्रभावसे समझाकर मना किया और शल्यको हाथ जोड़कर रोका ।। ४७ ।।
ततो निवारितः कर्णो धार्तराष्ट्रेण मारिष ।
कर्णोऽपि नोत्तरं प्राह शल्योऽप्यभिमुखः परान् ।
ततः प्रहस्य राधेयः पुनर्याहीत्यचोदयत् ।। ४८ ।।
मान्यवर! दुर्योधनके मना करनेपर कर्णने कोई उत्तर नहीं दिया और शल्यने भी शत्रुओंकी ओर मुँह फेर लिया। तब राधापुत्र कर्णने हँसकर शल्यको रथ बढ़ानेकी आज्ञा देते हुए कहा—'चलो, चलो' ।। ४८ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४५ ।।


* विभिन्न जातियोंके कर्मको अपनानेके कारण वह उन जातियोंके नामसे निर्दिष्ट होने लगता है।