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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

अध्याय (पृष्ठ 298)

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रहे थे, जिनके ऊपर मनोहर मुकुट और पगड़ीकी शोभा होती थी, जो मणिरत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे, जिनकी प्रभा सूर्य और चन्द्रमाके समान जान पड़ती थी, जो बिना नालके प्रफुल्ल कमलके समान प्रतीत होते थे, जो समय-समयपर हित एवं प्रियकी बातें बताते थे, जिनकी संख्या बहुत अधिक थी तथा जो पवित्र सुगन्धसे सुवासित थे, शत्रुओंके उन मस्तकोंद्वारा अभिमन्युने वहाँकी सारी पृथ्वीको पाट दिया ।। २८—३० ।।

अभिमन्युके द्वारा कौरव-सेनाके प्रमुख वीरोंका संहार

गन्धर्वनगराकारान् विधिवत् कल्पितान् रथान् ।
वीषामुखान् द्वित्रिवेणून् न्यस्तदण्डकबन्धरान् ।। ३१ ।।
विजङ्घाकूबरांस्तत्र विनेमिदशनानपि ।
विचक्रोपस्करोपस्थान् भग्नोपकरणानपि ।। ३२ ।।
प्रपातितोपस्तरणान् हतयोधान् सहस्रशः ।
शरैर्विशकलीकुर्वन् दिक्षु सर्वासुअदृश्यत ।। ३३ ।।

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इसी प्रकार अभिमन्यु अपने बाणोंसे शत्रुओंके गन्धर्वनगरके समान विशाल तथा विधिपूर्वक सुसज्जित बहुसंख्यक रथोंके टुकड़े-टुकड़े करता हुआ सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिगोचर हो रहा था। उन रथोंके प्रधान ईषादण्ड नष्ट हो गये थे। त्रिवेणु चूर-चूर हो गये थे। स्तम्भदण्ड उखड़ गये थे। उसके बन्धन टूट गये थे। जंघा (नीचेका स्थान) और कूबर (जूएका आधारभूत काष्ठ) टूट-फूट गये थे। पहियोंके ऊपरी भाग और अरे चौपट कर दिये गये थे। पहिये, रथकी सजावटके समान और बैठकें नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थीं। सारी सामग्री तथा रथके अवयव चूर-चूर हो गये थे। रथकी छतरी और आवरणको गिरा दिया गया था तथा उन रथोंके समस्त योद्धा मार डाले गये थे। इस तरह सहस्रों रथोंकी धज्जियाँ उड़ गयी थीं ॥ ३१—३३ ॥

पुनर्द्विपान् द्विपारोहान् वैजयन्त्यङ्कुशध्वजान् ।
तूणान् वर्माण्यथो कक्ष्या ग्रैवेयांश्च सकम्बलान् ॥ ३४ ॥
घण्टाःशुण्डाविषाणाग्रान् छत्रमालाः पदानुगान् ।
शरैर्निशितधाराग्रैः शात्रवाणामशातयत् ॥ ३५ ॥
रथोंका संहार करके अभिमन्युने पुनः तीखी धारवाले बाणोंद्वारा शत्रुओंके हाथियों, गजारोहियों, उनके झंडों, अंकुशों, ध्वजाओं, तूणीरों, कवचों, रस्सों, कण्ठाभूषणों, झूलों, घंटों, सूँडों, दाँतों, छत्रों, मालाओं और पादरक्षकों को भी काट डाला ॥ ३४-३५ ॥

वनायुजान् पर्वतीयान् काम्बोजानथ बाह्लिकान् ।
स्थिरबालधिकर्णाक्षाञ्जवनान् साधुवाहिनः ॥ ३६ ॥
आरूढाञ्शिक्षितैर्योधैः शक्त्यृष्टिप्रासयोधिभिः ।
विध्वस्तचामरमुखान् विप्रविद्धप्रकीर्णकान् ॥ ३७ ॥
निरस्तजिह्वानयनान् निष्कीर्णान्त्रयकृद्घनान् ।
हतारोहांश्छिन्नघण्टान् क्रव्यादगणमोदकान् ॥ ३८ ॥
निकृत्तचर्मकवचान् शकृन्मूत्रासृगाप्लुतान् ।
निपातयन्नश्ववरांस्तावकान् स व्यरोचत ॥ ३९ ॥
एको विष्णु रिवाचिन्त्यं कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।

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राजन्! आपके वनायुज, पर्वतीय, काम्बोज तथा बाह्निक देशीय श्रेष्ठ घोड़ोंको, जो पूँछ, कान और नेत्रोंको निश्चल करके दौड़नेवाले, वेगवान् और अच्छी तरह सवारीका काम देनेवाले थे तथा जिनके ऊपर शक्ति, ऋष्टि एवं प्रासद्वारा युद्ध करनेवाले सुशिक्षित योद्धा सवार थे, धराशायी करता हुआ अकेला वीर अभिमन्यु एकमात्र भगवान् विष्णुकी भाँति अचिन्त्य एवं दुष्कर कर्म करके बड़ी शोभा पा रहा था। उन घोड़ोंके मस्तक और गर्दनके चँवरके समान बड़े-बड़े बाल और मुख बाणोंके आघातसे नष्ट हो गये थे। वे सब-के-सब घायल हो गये थे। कितने ही अश्वोंके सिर छिन्न-भिन्न होकर बिखर गये थे। कितनोंकी जिह्वा और नेत्र बाहर निकल आये थे। आँत और जिगरके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। उन सबके सवार मार डाले गये थे। उनके गलेके घुँघुरू कटकर गिर गये थे। वे घोड़े मृत्युके अधीन होकर मांसभक्षी प्राणियोंका हर्ष बढ़ा रहे थे। उनके चमड़े और कवच टूक-टूक हो गये थे और वे मल-मूत्र तथा रक्तमें डूबे हुए थे॥ ३६—३९ १/२॥

तथा निर्मथितं तेन त्र्यङ्गं तव बलं महत् ॥ ४० ॥
यथासुरबलं घोरं त्र्यम्बकेण महौजसा।
जैसे महान् तेजस्वी त्रिनेत्रधारी भगवान् रुद्रने असुरोंकी सेनाको मथ डाला था, उसी प्रकार अभिमन्युने रथ, हाथी और घोड़े—इन तीन अंगोंसे युक्त आपकी विशाल सेनाको रौंद डाला॥ ४० १/२॥

कृत्वा कर्म रणेऽसह्यं परैरार्जुनिराहवे ॥ ४१ ॥
अभिनच्च पदात्योघांस्त्वदीयानेव सर्वशः।
इस प्रकार अर्जुनकुमार अभिमन्युने रणक्षेत्रमें शत्रुओंके लिये असह्य पराक्रम करके आपके पैदल योद्धाओंके समूहोंका सभी प्रकारसे विनाश आरम्भ किया॥ ४१ १/२॥

एवमेकेन तां सेनां सौभद्रेण शितैः शरैः ॥ ४२ ॥
भृशं विप्रहतां दृष्ट्वा स्कन्देनेवासुरीं चमूम्।
त्वदीयास्तव पुत्राश्च वीक्षमाणा दिशो दश ॥ ४३ ॥
संशुष्कास्याश्चलन्नेत्राः प्रस्विन्ना रोमहर्षिणः।
पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये ॥ ४४ ॥
जैसे कार्तिकेयने असुरोंकी सेनाको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था, उसी प्रकार एकमात्र सुभद्राकुमार अभिमन्युने अपने तीखे बाणोंद्वारा समस्त कौरव-सेनाको अत्यन्त छिन्न-भिन्न कर डाला है; यह देखकर आपके पुत्र और सैनिक भयभीत हो दसों दिशाओंकी ओर देखने लगे। उनके मुख सूख गये थे, नेत्र चंचल हो उठे थे, सारे अंगोंमें पसीना हो आया था और उनके रोंगटे खड़े हो गये थे। अब वे भागनेमें उत्साह दिखाने लगे। शत्रुओंको जीतनेके लिये उनके मनमें तनिक भी उत्साह नहीं रह गया था॥ ४२—४४॥

गोत्रनामभिरन्योन्यं क्रन्दन्तो जीवितैषिणः।
हतान् पुत्रान् पितॄन् भ्रातॄन् बन्धून् सम्बन्धिनस्तथा ॥ ४५ ॥

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प्रातिष्ठन्त समुत्सृज्य त्वरयन्तो हयद्विपान् ।। ४६ ।।
वे जीवनकी इच्छा रखकर अपने-अपने सगे-सम्बन्धियोंके गोत्र और नामका उच्चारण करके एक-दूसरेके लिये क्रन्दन कर रहे थे। उस समय आपके सैनिक इतने डर गये थे कि वहाँ मारे गये अपने पुत्रों, पितृतुल्य सम्बन्धियों, भाई-बन्धुओं तथा नातेदारोंको भी छोड़कर अपने घोड़ों और हाथियोंको उतावलीके साथ हाँकते हुए रणभूमिसे पलायन कर गये ।। ४५-४६ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युपराक्रमे षट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युका पराक्रमविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४७ श्लोक हैं।)