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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

१५२-

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

दुर्योधन और कर्णकी बातचीत तथा पुनः युद्धका आरम्भ

संजय उवाच

ततो दुर्योधनो राजा द्रोणेनैवं प्रचोदितः ।
अमर्षवशमापन्नो युद्धायैव मनो दधे ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर द्रोणाचार्यसे इस प्रकार प्रेरित हो अमर्षमें भरे हुए राजा दुर्योधनने मन-ही-मन युद्ध करनेका ही निश्चय किया ॥ १ ॥

अब्रवीच्च तदा कर्णं पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
पश्य कृष्णसहायेन पाण्डवेन किरीटिना ॥ २ ॥
आचार्यविहितं व्यूहं भित्त्वा देवैः सुदुर्भिदम् ।
तव व्यायच्छमानस्य द्रोणस्य च महात्मनः ॥ ३ ॥
मिषतां योधमुख्यानां सैन्धवो विनिपातितः ।
उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने कर्णसे इस प्रकार कहा—‘कर्ण! देखो, श्रीकृष्णसहित पाण्डुपुत्र अर्जुनने आचार्यद्वारा निर्मित व्यूहको, जिसका भेदन करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था, भेदकर तुम्हारे और महात्मा द्रोणके युद्धमें तत्पर रहते हुए भी मुख्य-मुख्य योद्धाओंके देखते-देखते सिंधुराज जयद्रथको मार गिराया है ॥ २-३ १/२ ॥

पश्य राधेय पृथ्वीशाः पृथिव्यां प्रवरा युधि ॥ ४ ॥
पार्थेनैकेन निहताः सिंहेनेवेतरे मृगाः ।
‘राधानन्दन! देखो, जैसे सिंह दूसरे वन्य पशुओंका संहार कर डालता है, उसी प्रकार एकमात्र कुन्तीकुमार अर्जुनद्वारा मारे गये ये भूमण्डलके श्रेष्ठ भूपाल युद्धभूमिमें पड़े हैं ॥ ४ १/२ ॥

मम व्यायच्छमानस्य द्रोणस्य च महात्मनः ॥ ५ ॥
अल्पावशेषं सैन्यं मे कृतं शक्रात्मजेन ह ।
'मेरे और महात्मा द्रोणके परिश्रमपूर्वक युद्ध करते रहनेपर भी इन्द्रपुत्र अर्जुनने मेरी सेनाको अल्प-मात्रामें ही जीवित छोड़ा है (अधिकांश सेनाको तो मार ही डाला है) ।। ५१/२ ।।

कथं नियच्छमानस्य द्रोणस्य युधि फाल्गुनः ॥ ६ ॥
भिन्द्यात् सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानोऽपि संयुगे ।
प्रतिज्ञाया गतः पारं हत्वा सैन्धवमर्जुनः ॥ ७ ॥
'यदि इस युद्धमें आचार्य द्रोण अर्जुनको रोकनेकी पूरी चेष्टा करते तो प्रयत्न करनेपर भी वे समरांगणमें उस दुर्भेद्य व्यूहको कैसे तोड़ सकते थे? सिंधुराजको मारकर अर्जुन अपनी प्रतिज्ञाके भारसे मुक्त हो गये ।।

पश्य राधेय पृथ्वीशान् पृथिव्यां पातितान् बहून् ।
पार्थेन निहतान् संख्ये महेन्द्रोपमविक्रमान् ॥ ८ ॥
'राधाकुमार! संग्रामभूमिमें पार्थके मारे और पृथ्वीपर गिराये हुए इन बहुसंख्यक भूपतियोंको देखो, ये सब-के-सब देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे ।। ८ ।।

अनिच्छतः कथं वीर द्रोणस्य युधि पाण्डवः ।
भिन्द्यात् सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानस्य शुष्मिणः ॥ ९ ॥
‘वीर! यदि बलवान् द्रोणाचार्य पूरा प्रयत्न करके उन्हें व्यूहमें नहीं घुसने देना चाहते तो वे उस दुर्भेद्य व्यूहको कैसे तोड़ सकते थे? ॥ ९ ॥
दयितः फाल्गुनो नित्यमाचार्यस्य महात्मनः ।
ततोऽस्य दत्तवान् द्वारमयुद्धेनैव शत्रुहन् ॥ १० ॥
‘शत्रुसूदन! किंतु अर्जुन तो महात्मा आचार्य द्रोणको सदा ही परम प्रिय हैं। इसीलिये उन्होंने युद्ध किये बिना ही उन्हें व्यूहमें घुसनेका मार्ग दे दिया ॥ १० ॥
अभयं सिन्धुराजाय दत्त्वा द्रोणः परंतपः ।
प्रादात् किरीटिने द्वारं पश्य निर्गुणतां मयि ॥ ११ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्यने सिंधुराजको अभय-दान देकर भी किरीटधारी अर्जुनको व्यूहमें घुसनेका मार्ग दे दिया। देखो, मुझमें कितनी गुणहीनता है ॥
यद्यदास्यदनुज्ञां वै पूर्वमेव गृहान् प्रति ।
प्रस्थातुं सिन्धुराजस्य नाभविष्यज्जनक्षयः ॥ १२ ॥
‘यदि उन्होंने पहले ही सिंधुराजको घर जानेकी आज्ञा दे दी होती तो यह इतना बड़ा जनसंहार नहीं होता ॥ १२ ॥
जयद्रथो जीवितार्थी गच्छमानो गृहान् प्रति ।
मयानानार्येण संरुद्धो द्रोणात् प्राप्याभयं सखे ॥ १३ ॥
‘सखे! जयद्रथ अपनी जीवनरक्षाके लिये घरकी ओर पधार रहे थे, परंतु मुझ अधमने ही द्रोणाचार्यसे अभय पाकर उन्हें रोक लिया ॥ १३ ॥
(रक्षामि सैन्धवं युद्धे नैनं प्राप्स्यति फाल्गुनः ।
मम सैन्यविनाशाय रुद्धो विप्रेण सैन्धवः ॥
‘मैं युद्धमें सिंधुराजकी रक्षा करूँगा; अर्जुन उसे नहीं पा सकेंगे’ ऐसा कहकर इस ब्राह्मणने मेरी सेनाका संहार करानेके लिये सिंधुराजको रोक लिया।
तस्य मे मन्दभाग्यस्य यतमानस्य संयुगे ।
हतानि सर्वसैन्यानि हतो राजा जयद्रथः ॥
‘युद्धमें प्रयत्न करनेपर भी मुझ भाग्यहीनकी सारी सेनाएँ नष्ट हो गयीं और राजा जयद्रथ भी मार डाले गये।
पश्य योधवरान् कर्ण शतशोऽथ सहस्रशः ।
पार्थनामाङ्कितैर्बाणैः सर्वे नीता यमक्षयम् ॥
‘कर्ण! इन सैकड़ों-हजारों श्रेष्ठ योद्धाओंको देखो, ये सब-के-सब अर्जुनके नामसे अंकित बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचाये गये हैं।
कथमेकरथेनाजौ बहूनां नः प्रपश्यताम् ।

विपन्नः सैन्धवो राजा योधाश्चैव सहस्रशः ॥)
'हम बहुसंख्यक योद्धा देखते ही रह गये और युद्धस्थलमें एकमात्र रथकी सहायतासे अर्जुनने मेरे इन सहस्रों योद्धाओं तथा सिंधुराज जयद्रथको भी मार डाला। यह कैसे सम्भव हुआ।
अद्य मे भ्रातरः क्षीणाश्चित्रसेनादयो रणे ।
भीमसेनं समासाद्य पश्यतां नो दुरात्मनाम् ॥ १४ ॥
'आज युद्धमें हम दुरात्माओंके देखते-देखते मेरे चित्रसेन आदि भाई भीमसेनसे भिड़कर नष्ट हो गये' ॥

कर्ण उवाच

आचार्यं मा विगर्हस्व शक्त्यासौ युध्यते द्विजः ।
यथाबलं यथोत्साहं त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥ १५ ॥
कर्ण बोला— भाई! तुम आचार्यकी निन्दा न करो। वह ब्राह्मण तो अपने बल, शक्ति और उत्साहके अनुसार प्राणोंका भी मोह छोड़कर युद्ध करता ही है ॥
यद्येनं समतिक्रम्य प्रविष्टः श्वेतवाहनः ।
नात्र सूक्ष्मोऽपि दोषः स्यादाचार्यस्य कथंचन ॥ १६ ॥
यदि श्वेतवाहन अर्जुन आचार्य द्रोणका उल्लंघन करके सेनामें घुस गये तो इसमें किसी प्रकार आचार्यका कोई सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म दोष नहीं है ॥ १६ ॥
कृती दक्षो युवा शूरः कृतास्त्रो लघुविक्रमः ।
दिव्यास्त्रयुक्तमास्थाय रथं वानरलक्षणम् ॥ १७ ॥
कृष्णेन च गृहीताश्वमभेद्यकवचावृतः ।
गाण्डीवमजरं दिव्यं धनुरादाय वीर्यवान् ॥ १८ ॥
प्रवर्षन् निशितान् बाणान् बाहुद्रविणदर्पितः ।
यदर्जुनोऽभ्ययाद् द्रोणमुपपन्नं हि तस्य तत् ॥ १९ ॥
अर्जुन अस्त्रविद्याके विद्वान्, दक्ष, युवावस्थासे सम्पन्न, शूरवीर, अनेक दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और शीघ्रता-पूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले हैं। वे दिव्यास्त्रोंसे सम्पन्न एवं वानरध्वजसे उपलक्षित रथपर बैठे हुए थे। श्रीकृष्णने उनके घोड़ोंकी बागडोर ले रखी थी। वे अभेद्य कवचसे सुरक्षित थे। उन्हें अपने बाहुबलका अभिमान है ही। ऐसी दशामें पराक्रमी अर्जुन कभी जीर्ण न होनेवाले दिव्य गाण्डीव धनुषको लेकर तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए यदि वहाँ आचार्य द्रोणको लाँघ गये तो वह उनके योग्य ही कर्म था ॥ १७—१९ ॥
आचार्यः स्थविरो राजन् शीघ्रयाने तथाक्षमः ।
बाहुव्यायामचेष्टायामशक्तस्तु नराधिप ॥ २० ॥

राजन्! नरेश्वर! आचार्य द्रोण अब बूढ़े हुए। वे शीघ्रतापूर्वक चलनेमें भी असमर्थ हैं। भुजाओंद्वारा परिश्रमपूर्वक की जानेवाली प्रत्येक चेष्टामें अब उनकी शक्ति उतनी काम नहीं देती है ॥ २० ॥

तेनैवमभ्यतिक्रान्तः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ।
तस्य दोषं न पश्यामि द्रोणस्यानेन हेतुना ॥ २१ ॥
इसीलिये श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं, वे श्वेतवाहन अर्जुन द्रोणाचार्यको लाँघ गये। यही कारण है कि मैं इसमें द्रोणाचार्यका दोष नहीं देख रहा हूँ ॥ २१ ॥

अजय्यान् पाण्डवान् मन्ये द्रोणेनास्त्रविदा मृधे ।
तथा ह्येनमतिक्रम्य प्रविष्टः श्वेतवाहनः ॥ २२ ॥
मैं तो ऐसा मानता हूँ कि अस्त्रवेत्ता होनेपर भी द्रोण युद्धमें पाण्डवोंको नहीं जीत सकते, तभी तो उन्हें लाँघकर श्वेतवाहन अर्जुन व्यूहमें घुस गये ॥ २२ ॥

दैवादिष्टेऽन्यथाभावो न मन्ये विद्यते क्वचित् ।
यतो नो युध्यमानानां परं शक्त्या सुयोधन ॥ २३ ॥
सैन्धवो निहतो युद्धे दैवमत्र परं स्मृतम् ।
सुयोधन! दैवके विधानमें कहीं कोई उलट-फेर नहीं हो सकता, यह मेरी मान्यता है; क्योंकि हमलोग सम्पूर्ण शक्ति लगाकर युद्ध कर रहे थे, तो भी रणभूमिमें सिंधुराज मारे गये। इस विषयमें दैव (प्रारब्ध)-को ही प्रधान माना गया है ॥ २३ १/२ ॥

परं यत्नं कुर्वतां च त्वया सार्धं रणाजिरे ॥ २४ ॥
हत्वास्माकं पौरुषं वै दैवं पश्चात् करोति नः ।
सततं चेष्टमानानां निकृत्या विक्रमेण च ॥ २५ ॥
समरांगणमें तुम्हारे साथ हमलोग भी विजयके लिये महान् प्रयत्न करते हैं, छल-कपट तथा पराक्रमद्वारा भी सदा विजयकी चेष्टामें लगे रहते हैं, तो भी दैव हमारे पुरुषार्थको नष्ट करके हमें पीछे धकेल देता है ॥

दैवोपसृष्टः पुरुषो यत् कर्म कुरुते क्वचित् ।
कृतं कृतं हि तत्कर्म दैवेन विनिपात्यते ॥ २६ ॥
दैव या दुर्भाग्यका मारा हुआ पुरुष कहीं जो भी कर्म करता है, उसके किये हुए प्रत्येक कर्मको दैव उलट देता है ॥ २६ ॥

यत् कर्तव्यं मनुष्येण व्यवसायवता सदा ।
तत् कार्यमविशङ्केन सिद्धिर्देवे प्रतिष्ठिता ॥ २७ ॥
मनुष्यको सदा उद्योगशील होकर निःशंकभावसे अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये; परंतु उसकी सिद्धि दैवके ही अधीन है ॥ २७ ॥

निकृत्या वञ्चिताः पार्था विषयौघैश्च भारत ।
दग्धा जतुगृहे चापि द्यूतेन च पराजिताः ॥ २८ ॥

राजनीतिं व्यपाश्रित्य प्रहिताश्चैव काननम्।
यत्नेन च कृतं तत्तद् दैवेन विनिपातितम्॥ २९॥
भारत! हमलोगोंने कपट करके कुन्तीकुमारोंको छला, उन्हें मारनेके लिये विषका प्रयोग किया, लाक्षागृहमें जलाया, जूएमैं हराया और राजनीतिका सहारा लेकर उन्हें वनमें भी भेजा। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक किये हुए हमारे उन सभी कार्योंको दैवने नष्ट कर दिया॥ २८-२९॥

युध्यस्व यत्नमास्थाय दैवं कृत्वा निरर्थकम्।
यततस्तव तेषां च दैवं मार्गेण यास्यति॥ ३०॥
फिर भी तुम दैवको व्यर्थ समझकर प्रयत्नपूर्वक युद्ध करो। तुम्हारे और पाण्डवोंके अपनी-अपनी विजयके लिये प्रयत्न करते रहनेपर दैव अपने गन्तव्य मार्गसे जाता रहेगा॥ ३०॥

न तेषां मतिपूर्वं हि सुकृतं दृश्यते क्वचित्।
दुष्कृतं तव वा वीर बुद्ध्या हीनं कुरूद्वह॥ ३१॥
वीर कुरुश्रेष्ठ! मुझे तो पाण्डवोंका बुद्धिपूर्वक किया हुआ कहीं कोई सुकृत नहीं दिखायी देता अथवा तुम्हारा बुद्धिहीनतापूर्वक किया हुआ कोई दुष्कृत भी देखनेमें नहीं आता॥ ३१॥

दैवं प्रमाणं सर्वस्य सुकृतस्येतरस्य वा।
अनन्यकर्म दैवं हि जागर्ति स्वपतामपि॥ ३२॥
सुकृत हो या दुष्कृत, सबपर दैवका ही अधिकार है; वही उसका फल देनेवाला है। अपना ही पूर्वकृत कर्म दैव है, जो मनुष्योंके सो जानेपर भी जागता रहता है॥ ३२॥

बहूनि तव सैन्यानि योधाश्च बहवस्तव।
न तथा पाण्डुपुत्राणामेवं युद्धमवर्तत॥ ३३॥
पहले तुम्हारे पास बहुत-सी सेनाएँ और बहुत-से योद्धा थे। पाण्डवोंके पास उतने सैनिक नहीं थे। इस अवस्थामें युद्ध आरम्भ हुआ था॥ ३३॥

तैरल्पैर्बहवो यूयं क्षयं नीताः प्रहारिणः।
शङ्के दैवस्य तत् कर्म पौरुषं येन नाशितम्॥ ३४॥
तथापि उन अल्पसंख्यकोंने तुम बहुसंख्यक योद्धाओंको क्षीण कर दिया। मैं समझता हूँ, वह दैवका ही कर्म है; जिसने तुम्हारे पुरुषार्थका नाश कर दिया है॥ ३४॥

संजय उवाच

एवं सम्भाषमाणानां बहु तत् तज्जनाधिप।
पाण्डवानामनीकानि समदृश्यन्त संयुगे॥ ३५॥

संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार जब कर्ण और दुर्योधन परस्पर बहुत-सी बातें कर रहे थे, उसी समय युद्धस्थलमें पाण्डवोंकी सेनाएँ दिखायी दीं ॥ ३५ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् ।
तावकानां परैः सार्धं राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ३६ ॥
राजन्! तदनन्तर आपकी कुमन्त्रणाके अनुसार आपके पुत्रोंका शत्रुओंके साथ घोर युद्ध छिड़ गया, जिसमें रथसे रथ और हाथीसे हाथी भिड़ गये थे ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि पुनर्युद्धारम्भे
द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें पुनः युद्धारम्भविषयक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं।)