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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

१०४-

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चतुरधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनका कौरव महारथियोंके साथ घोर युद्ध

संजय उवाच

तावका हि समीक्ष्यैवं वृष्ण्यन्धककुरूत्तमौ ।
प्रागत्वरन् जिघांसन्तस्तथैव विजयः परान् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! आपके सैनिक इस प्रकार वृष्णि और अन्धकवंशके श्रेष्ठ पुरुष श्रीकृष्ण तथा कुरुकुलरत्न अर्जुनको आगे देखकर उनका वध करनेकी इच्छासे उतावले हो उठे। इसी प्रकार अर्जुन भी शत्रुओंके वधकी अभिलाषासे शीघ्रता करने लगे ॥ १ ॥

सुवर्णचित्रैर्वैयाघ्रैः स्वनवद्भिर्महारथैः ।
दीपयन्तो दिशः सर्वा ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥ २ ॥
वे कौरव-सैनिक व्याघ्रचर्मसे आच्छादित सुवर्णजटित और गम्भीर घोष करनेवाले प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी विशाल रथोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥ २ ॥

रुक्मपुङ्खैश्च दुष्प्रेक्ष्यैः कार्मुकैः पृथिवीपते ।
कूजद्भिरतुलान् नादान् कोपितैस्तुरगैरिव ॥ ३ ॥
पृथ्वीपते! वे सोनेके पंखवाले दुर्लक्ष्य बाणों और क्रोधमें भरे हुए घोड़ोंके समान अनुपम टंकारध्वनि करनेवाले धनुषोंके द्वारा भी समस्त दिशाओंमें दीप्ति बिखेर रहे थे ॥ ३ ॥

भूरिश्रवाः शलः कर्णो वृषसेनो जयद्रथः ।
कृपश्च मद्रराजश्च द्रौणिश्च रथिनां वरः ॥ ४ ॥
ते पिबन्त इवाकाशमश्वैरष्टौ महारथाः ।
व्यराजयन् दश दिशो वैयाघ्रैर्हेमचन्द्रकैः ॥ ५ ॥
भूरिश्रवा, शल, कर्ण, वृषसेन, जयद्रथ, कृपाचार्य, मद्रराज शल्य तथा रथियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा—ये आठ महारथी व्याघ्रचर्मद्वारा आच्छादित तथा सुवर्णमय चन्द्रचिह्नोंसे विभूषित अश्वोंद्वारा आकाशको पीते हुए-से दसों दिशाओंको सुशोभित कर रहे थे ॥ ४-५ ॥

ते दंशिताः सुसंरब्धा रथैर्मेघौघनिःस्वनैः ।
समावृण्वन् दश दिशः पार्थस्य निशितैः शरैः ॥ ६ ॥
कौलूतका हयाश्चित्रा वहन्तस्तान् महारथान् ।
व्यशोभन्त तदा शीघ्रा दीपयन्तो दिशो दश ॥ ७ ॥

रोषमें भरे हुए उन कवचधारी वीरोंने मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले रथों और पैने बाणोंद्वारा अर्जुनकी दसों दिशाओंको आच्छादित कर दिया। कुलूतदेशके विचित्र एवं शीघ्रगामी घोड़े उस समय उन महारथियोंके वाहन बनकर दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ।। ६-७ ।।

आजानेयैर्महावेगैर्नानादेशसमुत्थितैः ।
पर्वतीयैर्नदीजैश्च सैन्धवैश्च हयोत्तमैः ।। ८ ।।
कुरुयोधवरा राजंस्तव पुत्रं परीप्सवः ।
धनंजयरथं शीघ्रं सर्वतः समुपाद्रवन् ।। ९ ।।

राजन्! नाना देशोंमें उत्पन्न महान् वेगशाली आजानेय³, पर्वतीय³ (पहाड़ी), नदीज³ (दरियाई) तथा सिंधुदेशीय उत्तम घोड़ोंद्वारा आपके पुत्रकी रक्षाके लिये उत्सुक हुए श्रेष्ठ कौरवयौद्धा सब ओरसे शीघ्र ही अर्जुनके रथपर टूट पड़े ।। ८-९ ।।

ते प्रगृह्य महाशङ्खान् दध्मुः पुरुषसत्तमाः ।
पूरयन्तो दिवं राजन् पृथिवीं च ससागराम् ।। १० ।।

नरेश्वर! उन पुरुषप्रवर योद्धाओंने समुद्रसहित पृथ्वी और आकाशको शब्दोंसे व्याप्त करते हुए बड़े-बड़े शंख लेकर बजाये ।। १० ।।

तथैव दध्मतुः शङ्खौ वासुदेवधनंजयौ ।
प्रवरौ सर्वदेवानां सर्वशङ्खवरौ भुवि ।। ११ ।।

इसी प्रकार सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुन भूतलके समस्त शंखोंमें उत्तम अपने दिव्य शंख बजाने लगे ।। ११ ।।

देवदत्तं च कौन्तेयः पाञ्चजन्यं च केशवः ।
शब्दस्तु देवदत्तस्य धनंजयसमीरितः ।। १२ ।।
पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिशश्चैव समावृणोत् ।

कुन्तीकुमार अर्जुनने देवदत्त नामक शंख बजाया और श्रीकृष्णने पांचजन्य। धनंजयके बजाये हुए देवदत्तका शब्द पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हो गया ।। १२ ½ ।।

तथैव पाञ्चजन्योऽपि वासुदेवसमीरितः ।। १३ ।।
सर्वशब्दानतिक्रम्य पूरयामास रोदसी ।

इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके बजाये हुए पांचजन्यने भी सम्पूर्ण शब्दोंको दबाकर अपनी ध्वनिसे पृथ्वी और आकाशको भर दिया ।। १३ ½ ।।

तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे नादसंकुले ।। १४ ।।
भीरूणां त्रासजनने शूराणां हर्षवर्धने ।
प्रवादितासु भेरीषु झर्झरिष्वानकेषु च ।। १५ ।।

मृदङ्गेष्वपि राजेन्द्र वाद्यमानेष्वनेकशः ।
महारथाः समाख्याता दुर्योधनहितैषिणः ॥ १६ ॥
अमृष्यमाणास्तं शब्दं क्रुद्धाः परमधन्विनः ।
नानादेश्या महीपालाः स्वसैन्यपरिरक्षिणः ॥ १७ ॥
अमर्षिता महाशङ्खान् दध्मुर्वीरा महारथाः ।
कृते प्रतिकरिष्यन्तः केशवस्यार्जुनस्य च ॥ १८ ॥
राजेन्द्र! इस प्रकार जब वहाँ भयंकर शब्द व्याप्त हो गया, जो कायरोंको डराने और शूरवीरोंके हर्षको बढ़ानेवाला था, जब मेरी, झाँझ, ढोल और मृदंग आदि अनेक प्रकारके बाजे बजने और बजाये जाने लगे, उस समय दुर्योधनका हित चाहनेवाले विख्यात महारथी उस शब्दको न सह सकनेके कारण कुपित हो उठे। वे नाना देशोंमें उत्पन्न वीर, महारथी, महाधनुर्धर महीपाल, जो अपनी सेनाका संरक्षण कर रहे थे, अमर्षमें भरकर बड़े-बड़े शंख बजाने लगे; वे श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रत्येक कार्यका बदला चुकानेको उद्यत थे ॥ १४—१८ ॥
बभूव तव तत् सैन्यं शङ्खशब्दसमीरितम् ।
उद्विग्नरथनागाश्वमस्वस्थमिव वा विभो ॥ १९ ॥
प्रभो! आपकी वह सेना शंखके शब्दसे व्याप्त होनेके कारण अस्वस्थ-सी दिखायी देती थी। उसके हाथी, घोड़े और रथी सभी उद्विग्न हो उठे थे ॥ १९ ॥
तत् प्रविद्धमिवाकाशं शूरैः शङ्खविनादितम् ।
बभूव भृशमुद्विग्नं निर्घातैरिव नादितम् ॥ २० ॥
शूरवीरोंने शंखध्वनिसे आकाशको विद्ध-सा कर डाला। वह वज्रकी गड़गड़ाहटसे व्याप्त-सा होकर अत्यन्त उद्वेगजनक हो गया ॥ २० ॥
स शब्दःसुमहान् राजन् दिशः सर्वा व्यनादयत् ।
त्रासयामास तत् सैन्यं युगान्त इव सम्भृतः ॥ २१ ॥
राजन्! प्रलयकालके समान सब ओर फैला हुआ वह महान् शब्द सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने और आपकी सेनाको डराने लगा ॥ २१ ॥
ततो दुर्योधनोऽष्टौ च राजानस्ते महारथाः ।
जयद्रथस्य रक्षार्थं पाण्डवं पर्यवारयन् ॥ २२ ॥
तदनन्तर दुर्योधन तथा आठ महारथी नरेशोंने जयद्रथकी रक्षाके लिये अर्जुनको घेर लिया ॥ २२ ॥
ततो द्रौणिस्त्रिसप्तत्या वासुदेवमताडयत् ।
अर्जुनं च त्रिभिर्भल्लैर्ध्वजमश्वांश्च पञ्चभिः ॥ २३ ॥
उस समय अश्वत्थामाने भगवान् श्रीकृष्णको तिहत्तर बाण मारे, तीन भल्लोंसे अर्जुनको चोट पहुँचायी और पाँचसे उनके ध्वज एवं घोड़ोंको घायल कर दिया ॥ २३ ॥

तमर्जुनः पृषत्कानां शतैः षड्भिरताडयत् ।
अत्यर्थमिव संक्रुद्धः प्रतिविद्धे जनार्दने ॥ २४ ॥
श्रीकृष्णके घायल हो जानेपर अर्जुन अत्यन्त कुपित हो उठे। उन्होंने छः सौ बाणोंद्वारा अश्वत्थामाको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २४ ॥

कर्णं च दशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं त्रिभिस्तथा ।
शल्यस्य सशरं चापं मुष्टौ चिच्छेद वीर्यवान् ॥ २५ ॥
फिर पराक्रमी अर्जुनने दस बाणोंसे कर्णको और तीन बाणोंद्वारा वृषसेनको घायल करके राजा शल्यके बाणसहित धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट डाला ॥ २५ ॥

गृहीत्वा धनुरन्यत् तु शल्यो विव्याध पाण्डवम् ।
भूरिश्रवास्त्रिभिर्बाणैर्हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ २६ ॥
तब शल्यने दूसरा धनुष हाथमें लेकर पाण्डुपुत्र अर्जुनको बींध डाला। भूरिश्रवाने सानपर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तीन बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया ॥ २६ ॥

कर्णो द्वात्रिंशता चैव वृषसेनश्च सप्तभिः ।
जयद्रथस्त्रिसप्तत्या कृपश्च दशभिः शरैः ॥ २७ ॥
मद्रराजश्च दशभिर्विव्याधुः फाल्गुनं रणे ।
फिर कर्णने बत्तीस, वृषसेनने सात, जयद्रथने तिहत्तर, कृपाचार्यने दस तथा मद्रराज शल्यने भी दस बाण मारकर रणक्षेत्रमें अर्जुनको बींध डाला ॥ २७ १/२ ॥

ततः शराणां षष्ट्या तु द्रौणिः पार्थमवाकिरत् ॥ २८ ॥
वासुदेवं च विंशत्या पुनः पार्थं च पञ्चभिः ।
तत्पश्चात् अश्वत्थामाने अर्जुनपर साठ बाण बरसाये, फिर श्रीकृष्णको बीस और अर्जुनको भी पाँच बाण मारे ॥ २८ १/२ ॥

प्रहसंस्तु नरव्याघ्रः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ॥ २९ ॥
प्रत्यविध्यत् स तान् सर्वान् दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
तब श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं, उन श्वेतवाहन पुरुषसिंह अर्जुनने जोर-जोरसे हँसते और हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए उन सबको बींधकर बदला चुकाया ॥ २९ १/२ ॥

कर्णं द्वादशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं त्रिभिः शरैः ॥ ३० ॥
शल्यस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे व्यकृन्तत ।
कर्णको बारह और वृषसेनको तीन बाणोंसे घायल करके राजा शल्यके बाणसहित धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे पुनः काट डाला ॥ ३० १/२ ॥

सौमदत्तिं त्रिभिर्विद्ध्वा शल्यं च दशभिः शरैः ॥ ३१ ॥
शितैरग्निशिखाकारैर्द्रौणिं विव्याध चाष्टभिः ।
इसके बाद भूरिश्रवाको तीन और शल्यको दस बाणोंसे बींधकर अग्निकी ज्वालाके समान आकारवाले आठ तीखे बाणोंद्वारा अश्वत्थामाको घायल कर दिया ॥

गौतमं पञ्चविंशत्या सैन्धवं च शतेन ह ॥ ३२ ॥
पुनर्द्रोणिं च सप्तत्या शराणां सोऽभ्यताडयत् ।
तत्पश्चात् कृपाचार्यको पचीस, जयद्रथको सौ तथा अश्वत्थामाको पुनः उन्होंने सत्तर बाण मारे ॥ ३२ १/२ ॥
भूरिश्रवास्तु संक्रुद्धः प्रतोदं चिच्छिदे हरेः ॥ ३३ ॥
अर्जुनं च त्रिसप्तत्या बाणानामाजघान ह ॥ ३४ ॥
भूरिश्रवाने कुपित होकर श्रीकृष्णका चाबुक काट डाला और अर्जुनको तिहत्तर बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३३-३४ ॥
ततः शरशतैस्तीक्ष्णैस्तानरीन् श्वेतवाहनः ।
प्रत्यषेधद् द्रुतं क्रुद्धो महावातो घनानिव ॥ ३५ ॥
तदनन्तर जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार श्वेतवाहन अर्जुनने कुपित हो सैकड़ों तीखे बाणोंद्वारा उन शत्रुओंको तुरंत पीछे हटा दिया ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि संकुलयुद्धे चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥


<u>१.</u> आजानेयका लक्षण इस प्रकार है—गुड़गन्धाः काये ये सुश्लक्ष्णाः कान्तितो जितक्रोधाः । सारयुता जितेन्द्रियाः क्षुत्तृडाहितं चापि नो दुःखम् ।। जानन्त्याजानेया निर्दिष्टा वाजिनो धीरैः । अर्थात् जिनके शरीरसे गुड़की-सी गन्ध आती हो, जो कान्तिसे अत्यन्त चिकने और चमकीले जान पड़ते हों, क्रोधको जीत चुके हों, बलवान् और जितेन्द्रिय हों तथा भूख-प्यासके कष्टका अनुभव न करते हों, उन घोड़ोंको धीर पुरुषोंने ‘आजानेय’ कहा है।
<u>२.</u> पर्वतीय घोड़ोंका लक्षण यों होना चाहिये—वाहास्तु पर्वतीया बलान्विताः स्निग्धकेशाश्च वृत्तखुरा दृढ़पादा महाजवास्तेऽतिविख्याताः । अर्थात् अत्यन्त विख्यात ‘पर्वतीय’ घोड़े बलवान् होते हैं, उनके बाल चिकने, टाप गोल, पैर सुदृढ़ और वेग महान् होते हैं।
<u>३.</u> नदीज या दरियाई घोड़ोंका लक्षण इस प्रकार है—अश्वाः सकर्णिकाराः क्वचन नदीतीरजाः समुद्दिष्टाः । पूर्वार्धेषूद्ग्राः पश्चार्धे चानताः किंचित् । कहीं नदीके तटपर उत्पन्न हुए कनेरयुक्त अश्व ‘नदीज’ कहलाते हैं। वे आगेके आधे शरीरसे ऊँचे और पिछले आधे शरीरसे कुछ नीचे होते हैं।