महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
अध्याय (पृष्ठ 317)
चत्वारिंशोऽध्यायः
अभिमन्युके द्वारा दुःशासन और कर्णकी पराजय
संजय उवाच
(ततः समभवद् युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः ।
तस्मिन् काले महाबाहुः सौभद्रः परवीरहा ॥
सशरं कार्मुकं छित्त्वा लाघवेन व्यपातयत् ।
दुःशासनं शरैर्घोरैः संततक्ष समन्ततः ॥)
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर उन दोनों पुरुषसिंहोंमें घोर युद्ध होने लगा। उस समय शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबाहु सुभद्रकुमारने बड़ी फुर्तीके साथ दुःशासनके बाणसहित धनुषको काट गिराया और उसे अपने भयंकर बाणोंद्वारा सब ओरसे क्षत-विक्षत कर दिया ।।
शरविक्षतगात्रं तु प्रत्यमित्रमवस्थितम् ।
अभिमन्युः स्मयन् धीमान् दुःशासनमथाब्रवीत् ॥ १ ॥
इसके बाद बुद्धिमान् अभिमन्यु किंचित् मुसकराकर सामने विपक्षमें खड़े हुए दुःशासनसे, जिसका शरीर बाणोंसे अत्यन्त घायल हो गया था, इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
दिष्ट्या पश्यामि संग्रामे मानिनं शूरमागतम् ।
निष्ठुरं त्यक्तधर्माणमाक्रोशनपरायणम् ॥ २ ॥
‘बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज मैं युद्धमें सामने आये हुए और अपनेको शूरवीर माननेवाले तुझ अभिमानी, निष्ठुर, धर्मत्यागी और दूसरोंकी निन्दामें तत्पर रहनेवाले शत्रुको प्रत्यक्ष देख रहा हूँ ॥ २ ॥
यत् सभायां त्वया राज्ञो धृतराष्ट्रस्य शृण्वतः ।
कोपितः परुषैर्वाक्यैर्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
जयोन्मत्तेन भीमश्च बह्वबद्धं प्रभाषितः ।
अक्षकूटं समाश्रित्य सौबलस्यात्मनो बलम् ॥ ४ ॥
तत् त्वयेदमनुप्राप्तं तस्य कोपान्महात्मनः ।
‘ओ मूर्ख! तूने द्यूतक्रीडामें विजय पानेसे उन्मत्त होकर सभामें राजा धृतराष्ट्रके सुनते हुए जो अपने निष्ठुर वचनोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरको कुपित किया था और शकुनिके आत्मबल—जूएममें छल-कपटका आश्रय लेकर जो भीमसेनके प्रति बहुत-सी अंट-संट बातें कही थीं, इससे उन महात्मा धर्मराजको जो क्रोध हुआ, उसीका यह फल है कि तुझे आज यह दुर्दिन प्राप्त हुआ है ॥ ३-४ १/२ ॥
परवित्तापहारस्य क्रोधस्याप्रशमस्य च ॥ ५ ॥
लोभस्य ज्ञाननाशस्य द्रोहस्यात्याहितस्य च ।
पितॄणां मम राज्यस्य हरणस्योग्रधन्विनाम् ॥ ६ ॥
तत् त्वयेदमनुप्राप्तं प्रकोपाद् वै महात्मनाम् ।
‘दूसरोंके धनका अपहरण, क्रोध, अशान्ति, लोभ, ज्ञानलोप, द्रोह, दुःसाहसपूर्ण बर्ताव तथा मेरे उग्र धनुर्धर पितरोंके राज्यका अपहरण—इन सभी बुराइयोंके फलस्वरूप उन महात्मा पाण्डवोंके क्रोधसे तुझे आज यह बुरा दिन प्राप्त हुआ है ॥ ५-६ १/२ ॥
स तस्योग्रमधर्मस्य फलं प्राप्नुहि दुर्मते ॥ ७ ॥
शासितास्म्यद्य ते बाणैः सर्वसैन्यस्य पश्यतः ।
अद्याहमनृणस्तस्य कोपस्य भविता रणे ॥ ८ ॥
‘दुर्मते! तू अपने उस अधर्मका भयंकर फल प्राप्त कर। आज मैं सारी सेनाओंके देखते-देखते अपने बाणोंद्वारा तुझे दण्ड दूँगा। आज मैं युद्धमें उन महात्मा पितरोंके उस क्रोधका बदला चुकाकर उऋण हो जाऊँगा ॥ ७-८ ॥
अमर्षितायाः कृष्णायाः काङ्क्षितस्य च मे पितुः ।
अद्य कौरव्य भीमस्य भवितास्म्यनृणो युधि ॥ ९ ॥
‘कुरुकुलकलंक! आज रोषमें भरी हुई माता कृष्णा तथा पितृतुल्य (ताऊ) भीमसेनका अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करके इस युद्धमें उनके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा ॥ ९ ॥
न हि मे मोक्ष्यसे जीवन् यदि नोत्सृजसे रणम् ।
एवमुक्त्वा महाबाहुर्बाणं दुःशासनान्तकम् ॥ १० ॥
संदधे परवीरघ्नः कालाग्न्यनिलवर्चसम् ।
‘यदि तू युद्ध छोड़कर भाग नहीं जायगा तो आज मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा।’ ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले महाबाहु अभिमन्युने काल, अग्नि और वायुके समान तेजस्वी बाणका संधान किया, जो दुःशासनके प्राण लेनेमें समर्थ था ॥ १० १/२ ॥
तस्योरस्तूर्णमासाद्य जत्रुदेशे विभिद्य तम् ॥ ११ ॥
जगाम सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः ।
अथैनं पञ्चविंशत्या पुनरेव समर्पयत् ॥ १२ ॥
वह बाण तुरंत ही उसके वक्षःस्थलपर पहुँचकर उसके गलेकी हँसलीको विदीर्ण करता हुआ पंखसहित भीतर घुस गया, मानो कोई सर्प बाँबीमें समा गया हो। तत्पश्चात् अभिमन्युने दुःशासनको पचीस बाण और मारे ॥ ११-१२ ॥
शरैरग्निसमस्पर्शैराकर्णसमचोदितैः ।
स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् ॥ १३ ॥
दुःशासनों महाराज कश्मलं चाविशन्महत् ।
धनुषको कानतक खींचकर चलाये हुए उन बाणोंद्वारा, जिनका स्पर्श अग्निके समान दाहक था, गहरी चोट खाकर दुःशासन व्यथित हो रथकी बैठकमें बैठ गया। महाराज! उस समय उसे भारी मूर्च्छा आ गयी ॥ १३ १/२ ॥
सारथिस्त्वरमाणस्तु दुःशासनमचेतनम् ॥ १४ ॥
रणमध्यादपोवाह सौभद्रशरपीडितम् ।
तब अभिमन्युके बाणोंसे पीड़ित एवं अचेत हुए दुःशासनको सारथि बड़ी उतावलीके साथ युद्धस्थलसे बाहर हटा ले गया ॥ १४ १/२ ॥
पाण्डवा द्रौपदेयाश्च विराटश्च समीक्ष्य तम् ॥ १५ ॥
पञ्चालाः केकयाश्चैव सिंहनादमथानदन् ।
उस समय पाण्डव, पाँचों द्रौपदीकुमार, राजा विराट, पांचाल और केकय दुःशासनको पराजित हुआ देख जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ १५ १/२ ॥
वादित्राणि च सर्वाणि नानालिङ्गानि सर्वशः ॥ १६ ॥
प्रावादयन्त संहृष्टाः पाण्डूनां तत्र सैनिकाः ।
अपश्यन् स्मयमानाश्च सौभद्रस्य विचेष्टितम् ॥ १७ ॥
पाण्डवोंके सैनिक वहाँ हर्षमें भरकर नाना प्रकारके सभी रणवाद्य बजाने लगे और मुसकराते हुए वे सुभद्राकुमारका पराक्रम देखने लगे ॥ १६-१७ ॥
अत्यन्तवैरिणं दृप्तं दृष्ट्वा शत्रुं पराजितम् ।
धर्ममारुतशक्राणामश्विनोः प्रतिमास्तथा ॥ १८ ॥
धारयन्तो ध्वजाग्रेषु द्रौपदेया महारथाः ।
सात्यकिश्चेकितनश्च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ॥ १९ ॥
केकया धृष्टकेतुश्च मत्स्याः पञ्चालसृञ्जयाः ।
पाण्डवाश्च मुदा युक्ता युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ २० ॥
अभ्यद्रवन्त त्वरिता द्रोणानीकं बिभित्सवः ।
घमंडमें भरे हुए अपने कट्टर शत्रुको पराजित हुआ देख अपनी ध्वजाओंके अग्रभागमें धर्म, वायु, इन्द्र और अश्विनीकुमारोंकी प्रतिमा धारण करनेवाले महारथी द्रौपदीकुमार, सात्यकि, चेकितान, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, केकय-राजकुमार, धृष्टकेतु, मत्स्य, पांचाल, सृंजय तथा युधिष्ठिर आदि पाण्डव बड़े हर्षके साथ उतावले होकर द्रोणाचार्यके व्यूहका भेदन करनेकी इच्छासे उसपर टूट पड़े ॥ १८—२० १/२ ॥
ततोऽभवन्महायुद्धं त्वदीयानां परैः सह ॥ २१ ॥
जयमाकाङ्क्षमाणानां शूराणामनिवर्तिनाम् ।
तदनन्तर विजयकी अभिलाषा रखकर युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले आपके शूरवीर सैनिकोंका शत्रुओंके साथ महान् युद्ध होने लगा ॥ २१ १/२ ॥
तथा तु वर्तमाने वै संग्रामेऽतिभयंकरे ।। २२ ।।
दुर्योधनो महाराज राधेयमिदमब्रवीत् ।
महाराज! जब इस प्रकार अत्यन्त भयंकर संग्राम हो रहा था, उस समय दुर्योधनने राधापुत्र कर्णसे यों कहा— ।। २२ १/२ ।।
पश्य दुःशासनं वीरमभिमन्युवशं गतम् ।। २३ ।।
प्रतपन्तमिवादित्यं निघ्नन्तं शात्रवान् रणे ।
‘कर्ण! देखो, वीर दुःशासन सूर्यके समान शत्रु-सैनिकोंको संतप्त करता हुआ युद्धमें उन्हें मार रहा था, इसी अवस्थामें वह अभिमन्युके वशमें पड़ गया है ।।
अथ चैते सुसंरब्धाः सिंहा इव बलोत्कटाः ।। २४ ।।
सौभद्रमुद्यतास्त्रातुम्भ्यधावन्त पाण्डवाः ।
‘इधर ये क्रोधमें भरे हुए पाण्डव सुभद्राकुमारकी रक्षा करनेके लिये उद्यत हो प्रचण्ड बलशाली सिंहोंके समान धावा कर चुके हैं’ ।। २४ १/२ ।।
ततः कर्णः शरैस्तीक्ष्णैरभिमन्युं दुरासदम् ।। २५ ।।
अभ्यवर्षत संक्रुद्धः पुत्रस्य हितकृत् तव ।
यह सुनकर आपके पुत्रका हित करनेवाला कर्ण अत्यन्त क्रोधमें भरकर दुर्द्धर्ष वीर अभिमन्युपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ।। २५ १/२ ।।
तस्य चानुचरांस्तीक्ष्णैर्विव्याध परमेषुभिः ।। २६ ।।
अवज्ञापूर्वकं शूरः सौभद्रस्य रणाजिरे ।
शूरवीर कर्णने समरांगणमें सुभद्राकुमारके सेवकोंको भी तीखे एवं उत्तम बाणोंद्वारा अवहेलनापूर्वक बींध डाला ।। २६ १/२ ।।
अभिमन्युस्तु राधेयं त्रिसप्तत्या शिलीमुखैः ।। २७ ।।
अविध्यत् त्वरितो राजन् द्रोणं प्रेप्सुर्महामनाः ।
राजन्! उस समय महामनस्वी अभिमन्युने द्रोणाचार्यके समीप पहुँचनेकी इच्छा रखकर तुरंत ही तिहत्तर बाणोंद्वारा कर्णको घायल कर दिया ।। २७ १/२ ।।
तं तथा नाशकत् कश्चिद् द्रोणाद् वारयितुं रथी ।। २८ ।।
आरुजन्तं रथव्रातान् वज्रहस्तात्मजात्मजम् ।
कोई भी रथी रथसमूहोंको नष्ट-भ्रष्ट करते हुए इन्द्रकुमार अर्जुनके उस पुत्रको द्रोणाचार्यकी ओर जानेसे रोक न सका ।। २८ १/२ ।।
ततः कर्णो जयप्रेप्सुर्मानी सर्वधनुष्मताम् ।। २९ ।।
सौभद्रं शतशोऽविध्यदुत्तमास्त्राणि दर्शयन् ।
सोऽस्त्रैरस्त्रविदां श्रेष्ठो रामशिष्यः प्रतापवान् ।। ३० ।।
समरे शत्रुदुर्धर्षमभिमन्युमपीडयत् ।
विजय पानेकी इच्छा रखनेवाला, सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें मानी, अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परशुरामजीके शिष्य और प्रतापी वीर कर्णने अपने उत्तम अस्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए सैकड़ों बाणोंद्वारा शत्रुदुर्जय सुभद्रकुमार अभिमन्युको बींध डाला और समरांगणमें उसे पीड़ा देना आरम्भ किया ।। २९-३० ।।
स तथा पीड्यमानस्तु राधेयेनास्त्रवृष्टिभिः ।। ३१ ।।
समरेऽमरसंकाशः सौभद्रो न व्यशीर्यत ।
कर्णके द्वारा उसकी अस्त्रवर्षासे पीड़ित होनेपर भी देवतुल्य अभिमन्यु समरभूमिमें शिथिल नहीं हुआ ।। ३१ १/२ ।।
ततः शिलाशितैस्तीक्ष्णैर्भल्लैरानतपर्वभिः ।। ३२ ।।
छित्त्वा धनूंषि शूराणामार्जुनिः कर्णमर्दयत् ।
तत्पश्चात् अर्जुनकुमारने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए झुकी हुई गाँठवाले तीखे भल्लोंद्वारा शूरवीरोंके धनुष काटकर कर्णको सब ओरसे पीड़ा दी ।। ३२ १/२ ।।
धनुर्मण्डलनिर्मुक्तैः शरैराशीविषोपमैः ।। ३३ ।।
सच्छत्रध्वजयन्तारं साश्वमाशु स्मयन्निव ।
उसने मुसकराते हुए-से अपने मण्डलाकार धनुषसे छूटे हुए विषधर सर्पोंके समान भयानक बाणोंद्वारा छत्र, ध्वज, सारथि और घोड़ोंसहित कर्णको शीघ्र ही घायल कर दिया ।। ३३ १/२ ।।
कर्णोऽपि चास्य चिक्षेप बाणान् संनतपर्वणः ।। ३४ ।।
असम्भ्रान्तश्च तान् सर्वानगृह्णात् फाल्गुनात्मजः ।
कर्णने भी उसके ऊपर झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाण चलाये; परंतु अर्जुनकुमारने उन सबको बिना किसी घबराहटके सह लिया ।। ३४ १/२ ।।
ततो मुहूर्तात् कर्णस्य बाणेनैकेन वीर्यवान् ।। ३५ ।।
सध्वजं कार्मुकं वीरश्छित्त्वा भूमावपातयत् ।
तदनन्तर दो ही घड़ीमें पराक्रमी वीर अभिमन्युने एक बाण मारकर कर्णके ध्वजसहित धनुषको पृथ्वीपर काट गिराया ।। ३५ १/२ ।।
ततः कृच्छ्रगतं कर्णं दृष्ट्वा कर्णादनन्तरः ।। ३६ ।।
सौभद्रमभ्ययात् तूर्णं दृढमुद्यम्य कार्मुकम् ।
तत उच्चुक्रुशुः पार्थास्तेषां चानुचरा जनाः ।
वादित्राणि च संजघ्नुः सौभद्रं चापि तुष्टुवुः ।। ३७ ।।
कर्णको संकटमें पड़ा देख उसका छोटा भाई सुदृढ़ धनुष हाथमें लेकर तुरंत ही सुभद्राकुमारका सामना करनेके लिये आ पहुँचा। उस समय कुन्तीके सभी पुत्र और उनके
अनुगामी सैनिक जोर-जोरसे गरजने, बाजे बजाने और अभिमन्युकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ।। ३६-३७ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि कर्णदुःशासनपराभवे चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें कर्ण तथा दुःशासनकी पराजयविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३९ श्लोक हैं।)