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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

पन्द्रह लम्बक ७३७

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पन्द्रह लम्बक ७३७
मैंने महारानी के आगे एकाएक लम्बी-चौड़ी डींग तो हाँक दी किन्तु ऐसा विधान तो मैं
जानती नहीं ॥१३३॥
अन्य साधारण स्थानों के समान राजा के घर में ऐसा छल-कपट करना उचित नहीं
क्योंकि रहस्य खुलने पर शक्तिशाली राजा प्राणदंड दे सकते हैं ॥१३४॥
हाँ एक उपाय सूझ रहा है। मेरा मित्र एक नापित (नाई) है वह ऐसे कार्यों में चतुर
है। वह कुछ उपाय कर सकता है ॥१३५॥
ऐसा सोचकर वह भिक्षुकी नापित के पास गई और उसे अपना सर्वकार्य करानेवाली
सारी योजनाएँ बताई ॥१३६॥
तब वह वृद्ध और धूर्त नापित सोचने लगा- 'मेरे भाग्य से ही लाभ का यह अवसर
मिला है ॥१३७॥
इसलिए नई राजवधू को मारना न चाहिए प्रत्युत इसकी रक्षा करनी चाहिए
क्योंकि इस रानी का पिता दिव्य दृष्टिवाला है। वह योगबल से सब जानकर प्रकट कर
देगा ॥१३८॥
इस समय तो उसे राजा से पृथक् करके महारानी का धन पाते हैं, क्योंकि रहस्य में
सहायता करनेवाले सेवक के सामने स्वामी स्वयं सेवक बन जाता है ॥१३९॥
राजा और नई रानी दोनों को अलग-अलग कराकर यथासमय राजा को ऐसा समझा
दूँगा कि जिससे राजा और महिष्या दोनों ही सदा के लिए मेरी जीविका के स्रोत बन जायेंगे।
इस प्रकार, भारी पाप भी न होगा और मेरे लिए स्थायी जीविका भी बन जायगी ऐसा सोचकर
वह मूर्ख नापित उस कपटी तपस्विनी से कहने लगा - 'माता मैं यह सब तो कर दूँगा किन्तु किसी
उपाय से यदि राजा की नई रानी को मार दिया जाय तो यह उचित न होगा ॥१४०-१४२॥
रहस्य फूट पड़ने पर, राजा हमलोगों को फाँसी दे सकता है। स्त्री-हत्या करना पाप
भी होगा और रानी का पिता मुनि भी हमें शाप देगा ॥१४३॥
इसलिए केवल बुद्धि के बल से ही उसे राजा से पृथक कर दिया जाय तो महारानी भी
सुख से रहेगी और हमें भी धन मिलेगा ॥१४४॥
यह बात तो क्या है? बुद्धि से मैं क्या नहीं कर सकता। मेरी बुद्धि का वैभव सुनो
मैं कहता हूँ ॥१४५॥
नाई और राजा की कथा
इस राजा दृढ़वर्मा का पिता बहुत ही दुश्चरित्र था। मैं उसका दास था और
उसका क्षौर कर्म किया करता था ॥१४६॥
किसी समय इधर-उधर घूमते हुए उसने मेरी पत्नी को देख लिया। उस सुन्दरी युवती की
ओर उसका मन खिंच गया ॥१४७॥
९३

७३८ कथासरित्सागर

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७३८ कथासरित्सागर
नापितस्त्रीति सावोधि पृष्ट्वा परिजनं स ताम्।
किं नापितः करोतीति प्रविश्यैव स मे गृहम्॥१४८॥
उपभुज्यैव तां स्वेच्छं मद्भार्यां क्ष्नुपो ययौ।
अहं च तदहर्देवाद् गृहादासं बहिः क्वचित्॥१४९॥
अन्येद्युश्च प्रविष्टेन दृष्टा सान्यादृशी मया।
पृष्टा भार्या यथावृत्तं साभिमानेव मेऽभ्यधात्॥१५०॥
तत्क्रमेणैव तां भार्यामशक्तस्य निषेधने।
नित्यमेवोपभुञ्जानः स ममोत्सम्प्रवाक्षुपः॥१५१॥
कुतो गम्यमगम्यं वा कुशीलोन्मादिनः प्रभोः।
वातोद्धतस्य दावान्नेः किं तृणं किं च काननम्॥१५२॥
ततो यावद्गतिर्मेऽस्ति न काचिन्निवारणे।
तावत्स्वल्पाशनक्षामो मान्द्यव्याजमशिश्रियम्॥१५३॥
तावद्युश्च गतोऽभूवं राजस्तस्याहमन्तिकम्।
स्वव्यापारोपसेवार्थं निश्वसन् क्षुधपाम्बरः॥१५४॥
तत्र मन्दमिवालोक्य साभिप्रायं स मां नृपः।
पप्रच्छ रे किमीदृक्त्वं सञ्जातं कथ्यतामिति॥१५५॥
निर्बन्धपृष्टस्तं चाहं विजने याचिताभयः।
प्रत्यवोचं नृपं देव भार्यास्ति मम डाकिनी॥१५६॥
सा च सुप्तस्य मेऽन्त्राणि गुदेनाकृष्य पूषति।
तथैव चान्तः क्षिपति तेनाहं क्षामतां गतः॥१५७॥
पोषणाय च मे नित्यं बृंहणं भोजनं कुरु।
इत्युक्तः स मया राजा जाताशङ्को व्यचिन्तयत्॥१५८॥
किं सत्यं डाकिनी सा स्यात्तेनाहं किं हृतस्तया।
किञ्चिवाहारपुष्टस्य चूषेवन्त्रं ममापि सा॥१५९॥
तदद्य तामहं भुक्त्वा जिज्ञासिष्ये स्वयं निशि।
इति सञ्चिन्त्य राजा मे सोऽन्नाहारमवापयत्॥१६०॥
ततो गत्वा गृहं तस्या भार्यायाः सन्निधावहम्।
वधूष्यमुच्चैं पृष्टश्च तया तामेवमब्रवम्॥१६१॥
प्रिये न वाच्यं कस्यापि त्वया गुह्यं ब्रवीमि ते।
अस्य राज्ञो गुदे जाता दन्ता व्याधिसक्ष्मिमा॥१६२॥

षष्ठ लम्बक ७३९

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षष्ठ लम्बक ७३९
उसने अपने सेवकों से यह जान लिया कि यह नापित की स्त्री है, 'नापित मेरा क्या
करेगा'—यह जानकर वह मेरे घर में घुस आया और स्वतन्त्रतापूर्वक मेरी स्त्री को भ्रष्ट
करके वह दुष्ट राजा चला गया। मैं दैवयोग से उस दिन घर से कहीं बाहर गया
हुआ था ॥१४८-१४९॥
दूसरे दिन घर आते ही मैंने उसे (अपनी स्त्री को) दूसरी स्थिति में देखा और पूछने पर
उसने अभिमान से सारा वृत्तान्त कह दिया ॥१५०॥
तब से मुझे रोकने में असमर्थ जानकर मेरी परवाह न कर, वह राजा नित्य ही
मेरी स्त्री का उपभोग करता रहा ॥१५१॥
दुश्चरित्राता के कारण पापक स्वामी (राजा) के लिए गम्य और अगम्य क्या है ? वाय
से फैलाई गई आग के लिए तिनका और जंगल समान है ॥१५२॥
जब मैंने देखा कि राजा को रोकने के लिए मेरी कोई गति नहीं है तब स्वल्पाहार सं
पूर्वक होकर मैंने माँदगी (रोग) का बहाना किया ॥१५३॥
इस प्रकार दुबला-पतला रोपी का-सा मुँह किये मैं दुख भरी लम्बी साँस लेता हुआ
क्षौर कर्म की सेवा के लिए राजा के पास गया ॥१५४॥
मुझे इस प्रकार माँदा (रोगी) देखकर राजा ने अभिप्राय से पूछा— क्यों रे ! बता तू
इतना दुर्बल क्यों हो गया है ? ॥१५५॥
उसके बार-बार आग्रहपूर्वक पूछने पर मैंने अभय-याचना करके उससे एकान्त में
कहा—'महाराज क्या कहूँ मेरी स्त्री डाकिनी है। वह सोये हुए में मेरी आँतों का मलद्वार से
बाहर खींचकर चूस लेती है और फिर उसी प्रकार रख देती है। इसी कारण मैं दुर्बल हो
गया हूँ ॥१५६-१५७॥
शरीर को पुष्ट रखने के लिए मेरे पास पौष्टिक भोजन कहाँ से आवे ? मेरे ऐसा कहने
पर राजा सोचने लगा—'क्या वह सचमुच डाकिनी है ? तभी उसने मुझे आकृष्ट कर रखा है।
तो अब उपाय से आज रात को उसका पता लगाऊँगा। क्या आहार से परिपुष्ट मेरी आँतों
को भी वह चूसेगी ? तब मैं राजा के द्वारा आहार प्राप्त कर अपने घर आकर आँसू बहाने लगा
और अपनी स्त्री द्वारा कारण पूछे जाने पर मैंने कहा—'प्यारी किसी से कहना मत।
सुनो, तुम्हें बताता हूँ। उस राजा के मलद्वार में वज्र के समान दाँत निकल
आये हैं ॥१५८-१६२॥

७४ कथासरित्सागर

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७४ कथासरित्सागर
तच्च भग्नोग्ऽद्य जातोऽपि क्षुरो मे कर्म कुर्वतः ।
एवं धात्र ममेदानीं क्षुरस्त्रुट्यत्पदे पदे ॥१६३॥
तच्च नवमानेष्य कुतो निरुपमहं क्षुरम्।
अतो रोदिमि नष्टा हि जीविकेयं गृहे मम ॥१६४॥
इत्युक्ता सा मया भार्या मतिमाधादुपाय्यतः ।
रात्री राज्ञोऽस्य सुप्तस्य गुददन्तावभूतेक्षण ॥१६५॥
आ ससारादङ्गुष्ट सदस्य म स्वयोषि सा।
विस्रब्धा अपि दृश्यन्ते विटचर्ममया स्त्रियः ॥१६६॥
अथैत्य तां निशि स्वैरं मद्भार्यामुपभुज्य सः।
राजा शय्यादावलीकं सुप्तस्वामावृवन् स्मरन् ॥१६७॥
मद्भार्याप्यथ तं सुप्तं मत्वा तस्य शनैः शनैः ।
हस्तं प्रसारयामास गुदे दन्तोपलब्धये ॥१६८॥
गुदप्राप्ते च तत्पाणावुत्थाय सहसैव सः।
डाकिनी डाकिनीत्युक्त्वा त्रस्तो राजा ततो ययौ ॥१६९॥
ततः प्रभृति सा तेन भीत्या त्यक्ता नृपेण मे।
भार्या गृहीतसन्तोषा मदेकायतनं गता ॥१७०॥
एवं पूर्वं नृपाद् बुद्ध्या गृहिणी मोचिता मया।
इति सां तापसीमुक्त्वा नापितः सोऽब्रवीत्पुनः ॥१७१॥
तदेतत्क्रमया कार्यमार्ये युष्माकमीप्सितम् ।
यया च क्रियते मातस्तन्दिं वच्मि ते शृणु ॥१७२॥
कोऽप्यन्तःपुरवृद्धोऽत्र स्वीकार्यो योऽब्रवीत्समुम् ।
[L23: जाया ते कदलीगर्भा डाकिनीति नृपं रहः ॥१७३॥
आरब्धवाया नाङ्गस्याः कश्चित्परिजनः स्वकः ।
सर्वं परो मेवसहो होतात्कुर्वीत किं न यत् ॥१७४॥
ततोऽस्मिन्त्रात्रि साधङ्के शवगान्निधि यत्नतः ।
हस्तपादादि कदलीगर्भाभामिनि निधीयते ॥१७५॥
तत्प्रभाते विनाक्यैव राजा सत्यमवेत्य तत् ।
शुद्धोक्तं कदलीगर्भा भीतस्तां त्यक्ष्यति स्वयम् ॥१७६॥
एवं सपत्नीविरहाद्देवी सुखमवाप्नुयात् ।
रक्षां च सा बहु मन्येत त्वाम् कपिश्चद् भवेच्च न ॥१७७॥

षष्ठ लम्बक ७४१

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षष्ठ लम्बक ७४१
इस कारण क्षौरकर्म करते समय सुवृत्त और अच्छे लोहे का बना हुआ मेरा
उस्तरा भी उन दाँतों से टकराकर टूट गया ॥१६३॥
इस प्रकार यदि मेरा उस्तरा पग-पग पर टूटता रहेगा तो मैं प्रतिदिन नया उस्तरा कहाँ
से लाऊँगा ? इसलिए अब राजा के घर से मेरी जीविका नष्ट हो गई—यही कारण मेरे रोने का
है ॥१६४॥
मेरे इस प्रकार कहने पर मेरी पत्नी ने रात को सोये हुए राजा के मुखद्वार में उगे हुए
दाँतों के आश्चर्य को देखने का विचार किया ॥१६५॥
किन्तु संसार के प्रारम्भ से ही निश्चित इस असत्य को मेरी पत्नी ने नहीं समझा। मूर्खों
की बातों से चतुर स्त्रियाँ भी ठगी जाती हैं ॥१६६॥
तदनन्तर राजा रात को आकर और मेरी पत्नी का निश्शंक उपभोग करके मेरी डाइन
वाली बात का स्मरण करता हुआ झूठे ही सो गया ॥१६७॥
तदनन्तर मेरी पत्नी ने उसे सोया हुआ जानकर, दाँतों को देखने के लिए धीरे-धीरे उसके
मुखद्वार की ओर हाथ बढ़ाया ॥१६८॥
उसका हाथ मुखद्वार पर पहुँचते ही सोने का बहाना करनेवाला राजा एकाएक उठकर
डाइन ! डाइन ! चिल्लाता हुआ भागा ॥१६९॥
तब से राजा ने डर से मेरी स्त्री को त्याग दिया और मेरी स्त्री एकमात्र मेरे अधीन होकर
सुखपूर्वक रहने लगी ॥१७०॥
इस प्रकार, पहले मैंने अपनी बुद्धि के बल पर अपनी स्त्री को राजा से छुड़ाया था। उस
कपट-तपस्विनी से ऐसा कहकर वह नापित फिर बोला —'इसलिए हे आर्य, यह तुम्हारा कार्य
बुद्धि से किये जाने योग्य है। इसे जिस प्रकार करना है, वह भी सुनो' ॥१७१-१७२॥
रनिवास के किसी वृद्ध नौकर को ठीक करना चाहिए जो राजा से एकान्त में यह कहे
कि तेरी यह पत्नी कदलीगर्भा डाइन है ॥१७३॥
यह जंगली स्त्री है, इसका अपना सगा-सम्बन्धी कोई नहीं है। इसी प्रकार अन्यान्य
नौकर सेवक आदि भी धन आदि के लोभ से फोड़े जा सकते हैं। कौन ऐसा काम है जो प्रलोभन
में फँसकर न किया जा सके ? ॥१७४॥
तदनन्तर जब राजा के मन में शंका उत्पन्न हो जाय तो रात के समय किसी शव के कटे
हाथ-पैर आदि कदलीगर्भा के शयनागार में रखवा दिये जायें, प्रातःकाल यह सब देखकर राजा
भय से स्वयं उसे छोड़ देगा ॥१७५-१७६॥
इस प्रकार सौत के न रहने से महारानी सुखी हो जायगी। मुझे बहुत मानने लगेगी
और हमें भी धन मिलेगा ॥१७७॥

४४२ कथासरित्सागर

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४४२ कथासरित्सागर
इत्युक्त्वा तापसी तेन नापितेन सहेति सा।
गत्वा राज्ञो महादेव्यै यथावस्तु न्यवेदयत् ॥१७८॥
देवी च तत्तथा चक्रे सा तद्युक्त्या नृपोऽपि ताम्।
प्रत्यक्षं वीक्ष्य कदलीगर्भा तुष्टेति तां जहौ ॥१७९॥
तुष्टया च ततो देव्या तया गुप्तमदायि यत्।
प्रव्राजिका तद्बुभुजे सा यथेष्टं सनापिता ॥१८०॥
स्वयसा च कदलीगर्भा सा तेन दृढवर्मणा।
राज्ञाभिशापसन्तप्ता निर्ययौ राजमन्दिरात् ॥१८१॥
येनाजगाम तेनैव प्रययौ पितुराश्रमम्।
पूर्वोपजातसिद्धार्थसाभिज्ञानेन सा पथा ॥१८२॥
तत्र सामागतां दृष्ट्वा सोऽकस्मात्तत्पिता मुनिः।
तस्या दुश्चरिताशङ्की तस्थौ मङ्कणकः क्षणम् ॥१८३॥
प्रणिधानाच्च सं कृत्स्नं तद्वृत्तान्तमवेत्य सः।
आश्वास्य च स्वयं स्नेहात्तामादाय ययौ ततः ॥१८४॥
एत्य तस्मै तथाचख्यौ स्वयं प्रह्वय भूपते।
देव्या सपत्नीदोषेण कृतं कपटनाटकम् ॥१८५॥
तत्कालं स्वयमभ्येत्य राज्ञे तस्मै स नापितः।
यथावृत्तं तथाचष्ट पुनरेवमुवाच च ॥१८६॥
इत्थं विशोध्य कदलीगर्भा राज्ञी मया प्रभो!
अभिचारवशाद्युक्त्या देवीं सन्तोष्य रक्षिता ॥१८७॥
तच्छ्रुत्वा निश्चय दृष्ट्वा मुनीन्द्रवचनस्य सः।
जग्राह कदलीगर्भा सम्जातप्रत्ययो नृपः ॥१८८॥
अनुगम्य मुनिं तं च संविभेजे स नापितम्।
भक्तो ममायमित्यर्थैर्धूर्तेर्भोज्या बतेश्वराः ॥१८९॥
ततस्तया समं तन्वी कदलीगर्भयैव सः।
राजा स्वदेवीविमुखो दृढवर्मा सुनिवृतः ॥१९०॥
एवं विधान्विदधते सुबहुन्सपत्न्यो
दोषा मुपाप्यनवमाङ्गि कलिङ्गसेने!
त्वं कन्यका च चिरभाविविवाहलग्ना
वाञ्छन्त्यचिन्त्यगतयश्च सुरा अपि त्वाम् ॥१९१॥

षष्ठ लम्बकः ७४५

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[Header]
षष्ठ लम्बकः ७४५

उस नाई के इस प्रकार कहने पर वह कपट-तपस्विनी उसकी बात को स्वीकार करके
चली गई और महारानी को सब ठीक-ठीक बता दिया ॥१७८॥

महारानी ने भी ऐसा ही किया और परिणाम-स्वरूप राजा ने भी वह सब कुछ आंखों
से देखकर कनकवर्मा को डाइन समझकर त्याग दिया ॥१७९॥

इससे प्रसन्न होकर महारानी ने उस दुष्ट भिक्षुणी को जो गुप्त धन दिया उस धन का
उपयोग उसने नाई से मिलकर किया ॥१८०॥

वह कनकवर्मा भी राजा के अभिशाप से सन्त्रस्त होकर राजमहल से निकल गई।
और जिस मार्ग से आई थी उसी मार्ग से पहले बोई हुई सरसों के क्षुपों की पहचान के सहारे
वह अपने पिता के आश्रम में चली गई ॥१८१ १८२॥

ऋषि मंकणक इस प्रकार आई हुई कन्या को देखकर उसकी दुश्चरित्रता पर सन्देह
करता हुआ कुछ समय के लिए ध्यानावस्थित हो गया ॥१८३॥

तदनन्तर समाधि में योगबल द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर स्नेहपूर्वक कन्या को स्वयं
लेकर आश्रम से राजमहल में आ गया। आकर उसने प्रणाम करते हुए राजा से कहा—
'राजन्, धौत के दोष से यह सारा कपट-नाटक रचा गया है ॥१८४ १८४॥

उसी समय उस नापित ने जो कुछ हुआ था सब स्वयं जाकर राजा को बता
दिया। और फिर बोला—'हे स्वामी मैंने इस प्रकार कनकवर्मा को आपसे पृथक् करके उसकी
रक्षा की और महारानी को सन्तुष्ट किया' ॥१८६ १८७॥

इस प्रकार, मुनिवर बातों की सत्यता से विश्वस्त राजा ने कनकवर्मा को स्वीकार कर
लिया। और ऋषि को कुछ दूर तक पहुँचाकर उन्हें बिदा करने के पश्चात् नापित को 'यह मेरा
भक्त है' यह सोचकर उसने (राजा ने) उसे पर्याप्त धन दिया। खेद है कि राजा भी धूर्तों के
धोप-भाजन होते हैं ॥१८८ १८९॥

तब से राजा दृढ़वर्मा अपनी महारानी से विमुख हो उस कनकवर्मा के साथ ही निश्चित
होकर रहने लगा ॥१९ ॥

हे सुन्दर अंगोंवाली कलिङ्गसेने धौतें इस प्रकार के अनेक उपद्रव और दोष उत्पन्न कर
देती हैं। तू बालिका है, तेरे विवाह का समय अभी दूर है और अतुलनीय प्रभाववाले देवता
भी तुझे चाहते हैं ॥१९१॥

७४४ कथासरित्सागर

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७४४ कथासरित्सागर
संरम्भतः साम्प्रतमात्मना त्व
मात्मानमेकं जगदेकरत्नम् !
वत्सेश्वरेकार्पितमन्तरङ्गे ।
वरं त्वदार्यं हि निजं प्रकर्य ॥१९२॥
अहं हि नेष्यामि सखि! त्वदन्तिक
स्थिताधुना स्वं पतिमन्दिरे यत् ।
सखीगृहे संप्र न यान्ति सत्स्त्रियः
सुगात्रि भर्त्राद्य निवारितास्मि च ॥१९३॥
न चाप्यगुप्तमिहागमं क्षमो मे त्वदतिस्नेहवशात्स दिव्यदृष्टिः ।
तद्वैत्ति हि मत्पतिः कथम्चित्तमनुज्ञाप्य किलागताहमद्य ॥१९४॥
इह नास्त्यधुना हि मामकीनं
सखि कार्यं तव यामि तद्गृहम् ।
यदि मामनुमन्यते च भर्त्ता
तदिहैष्यामि पुनर्बिलङ्घ्य लज्जाम् ॥१९५॥
इत्थं सबाष्पमभिधाय कलिङ्गसेनां
तामश्रुधौतवदनां मनुजेन्द्रपुत्रीम् ।
आश्वास्य चाङ्गि विगलत्सुरेन्द्रपुत्री
सोमप्रभा स्वभवनं नभसा जगाम ॥१९६॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
मदनमञ्चुकालम्बके षष्ठस्तरङ्गः

सप्तमस्तरङ्गः
वत्सराजस्य कलिङ्गसेनायाश्च कथा (पूर्वानुवृत्ता)
गतां सोमप्रभां यातां स्मरन्ती तां सखीं प्रियाम् ।
कलिङ्गसेना सन्त्यक्तनिजदेशस्वबान्धवा ॥१॥
सा विलम्बितवत्सेशपाणिग्रहमहोत्सवा ।
नरेन्द्रकन्या कौशाम्ब्यां मृगीवासीद् वनच्युता ॥२॥
कलिङ्गसेना वीवाहविलम्बनविषण्णधीः ।
गणकान् प्रति सासूय इव वत्सेश्वरोऽपि च ॥३॥

षष्ठ लम्बक ४४५

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षष्ठ लम्बक ४४५
इसलिए तू समस्त विश्व के रत्न-स्वरूप एकमात्र वत्सराज को समर्पित अपनी आत्मा
की रक्षा कर। यह तेरी निजी उन्नति है ॥१९२॥
हे सखि अब मैं तेरे पास नहीं आऊँगी क्योंकि अब तू पति के घर में आ गई है। अच्छी
स्त्रियाँ सहेलियों के पतियों के घरों में नहीं जातीं और मेरे पति ने आज मुझे रोक भी
दिया है ॥१९३॥
तेरे अत्यन्त स्नेह के कारण मेरा गुप्त रूप से आना भी सम्भव नहीं है क्योंकि मेरा
पति दिव्यदृष्टि है, इसलिए वह सब जान जायगा। आज तो मैं किसी प्रकार उसकी आज्ञा लेकर
आई हूँ ॥१९४॥
यदि मुझे पति की आज्ञा प्राप्त हुई तो फिर भी लज्जा का त्यागकर तुम्हारे पास
आऊँगी ॥१९५॥
असुरराज की पुत्री सोमप्रभा आँसुओं से धुंधले हुए मुँहवाली राजपुत्री कलिङ्गसेना को
रोती हुई इस प्रकार कहकर सायंकाल होने पर आकाश-मार्ग से अपने घर चली गई ॥१९६॥
छठा तरंग समाप्त
सातवाँ तरंग
वत्सराज उदयन और कलिङ्गसेना की कथा (चालू)
अपने वेश और बन्धु-बान्धव आदि को छोड़कर आई हुई कलिङ्गसेना गई हुई सखी
सोमप्रभा को स्मरण करती हुई उदास होकर बैठी रही ॥१॥
सुरेन्द्रकन्या कलिङ्गसेना कौशाम्बी में वत्सराज के पाणिग्रहण-महोत्सव में विलम्ब होने
के कारण जंगल से बाहर आकर व्याकुल हरिणी के समान हो रही थी ॥२॥
इधर कलिङ्गसेना के विवाह में विलम्ब करनेवाले वत्सराज भी ज्यातिषियों के प्रति क्रुद्ध
रहते रहे ॥३॥
९४

७४६ कथासरित्सागर

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७४६ कथासरित्सागर
औत्सुक्यविमनास्तस्मिन्दिने चेतो विनोदयन् ।
देव्या वासवदत्ताया निवासभवनं ययौ ॥४॥
तत्र सा तं पतिं देवी निर्विकारा विशंपतं ।
उपाचरत् स्वोपचारैः प्राङ्मन्त्रिवरशिक्षिता ॥५॥
कलिङ्गसेनात्तान्ते ख्यातेऽप्यविकृता कथम् ।
देवीयमिति स ध्यात्वा राजा जिज्ञासुरूह ताम् ॥६॥
कच्चिद्देवि त्वया ज्ञातं स्वयंवरकृतो मम।
कलिङ्गसेना नामैषा राजपुत्री यदागता ॥७॥
सन्सूर्त्यैवाविभिन्नेन मुखरागेण साऽब्रवीत् ।
ज्ञातं मयातिहर्षो मे लक्ष्मी सा ह्यागतेह न ॥८॥
वशगे हि महाराजे तत्प्राप्त्या तत्पितर्यपि ।
कलिङ्गदत्ते पृथ्वी ते सुतरां वर्तते वशे ॥९॥
अहं च त्वद्विभूत्यैव सुखिता त्वत्सुखेन च ।
आर्यपुत्र ! सर्वैतच्च विदितं प्रागपि स्थितम् ॥१०॥
तन्न धन्यास्मि किं यस्या मम भर्ता त्वमीदृशः ।
यं राजकन्या वाञ्छन्ति वाञ्छ्यमाना नृपान्तरैः ॥११॥
एवं वत्सेश्वरः प्रोक्तो देव्या वासवदत्तया।
यौगन्धरायणप्रसशिक्षयान्तस्तुतोष सः ॥१२॥
तयैव च सहासेव्य पानं सद्धासके निशि ।
तस्यां सुष्वाप मध्ये च प्रबुद्धः समचिन्तयत् ॥१३॥
किन्त्विमहानुभावैत्थं देवी मामनुवर्तते ।
कलिङ्गसेनापि यत्सपत्नीमनुमन्यते ॥१४॥
कथं वा शक्नुयादेतां सोढुं सैषा तपस्विनी ।
पद्मावती विवाहेऽपि या दैवान्न जहावसून् ॥१५॥
तदस्याश्चेदनिष्टं स्यात्प्रार्थनाद्यन्ततो भवेत् ।
एतदासम्यना पुत्रश्वशूर्यद्वयगुरादष मे ॥१६॥
पद्मावती च राज्यं च किमप्यधिकमुच्यते ।
अतः कलिङ्गसेनेषा परिणेया कथं मया ॥१७॥
एवमालोच्य वत्सेशो निद्रान्ते निर्जगामतः ।
अपराह्ने ययौ देव्या पद्मावत्या स मन्दिरम् ॥ १८॥

षष्ठ लम्बक ७४७

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षष्ठ लम्बक ७४७
उस दिन उत्सुकता से व्याकुल राजा उदयन मनोविनोद के लिए महारानी वासवदत्ता
के महल में गया ॥४॥
वहाँ पर मन्त्री यौगन्धरायण द्वारा शिक्षित महारानी ने किसी भी प्रकार का
विकार न प्रकट करते हुए, सदा की भाँति उचित उपचारा से राजा का स्वागत
सत्कार किया ॥५॥
'कलिंगसेना का वृत्तान्त प्रसिद्ध हो जाने पर भी महारानी पूर्व की ही भाँति कैसे प्रकृतिस्थ
है ? - ऐसा सोचते हुए राजा ने जानने के लिए रानी से कहा—'देवि मेरे स्वयंवर के विषय
में तुम्हें कुछ ज्ञात है। जिसलिए कि राजकुमारी कलिङ्गसेना यहाँ आई हुई है ? ॥६-७॥
यह सुनकर मुँह के भाव को तनिक भी विकृत किये बिना रानी बोली—'मुझे ज्ञात है,
यह अत्यन्त प्रसन्नता का विषय है। वह तो हमारे यहाँ साक्षात् लक्ष्मी आई है ॥८॥
उसकी प्राप्ति से उसके पिता महाराज कलिङ्गदत्त के भी वश में आ जाने पर, सारी पृथ्वी
तुम्हारे वश में है। क्या मैं भी धन्य नहीं हूँ कि जिसके पति तुम समान हों जिसे अन्य राजाओं
से चाही जाती हुई राजकन्याएँ स्वयं चाहती हैं' ॥९-११॥
यौगन्धरायण से शिक्षित महारानी द्वारा इस प्रकार कहा गया राजा मन-ही-मन अत्यन्त
प्रसन्न हुआ ॥१२॥
और वहीं वासवदत्ता के साथ भोजन आसव-पान आदि करके सो गया। किन्तु बीच
में ही उठकर सोचने लगा— ॥१३॥
क्या सचमुच महारानी इतनी उदार है कि वह मेरी बात का और सपत्नी (सौन)
कलिङ्गसेना का भी उतना समर्थन करती है। यह बेचारी उस कलिङ्गसेना को कैसे सहन कर सकती
है, जिसने पद्मावती के विवाह पर दैवयोग से प्राणों का ही त्याग नहीं किया ? ॥१४-१५॥
यदि इसका कुछ भी अनिष्ट हुआ तो अनर्थ हो जायगा क्योंकि मेरे पुत्र, श्वशुर, मामे
आदि सब इसी के सहारे हैं ॥१६॥
साथ ही पद्मावती और सारा राज्य इसी के सहारे हैं। अधिक क्या कहूँ। इसलिए,
मैं कलिङ्गसेना से विवाह करूँ तो कैसे ? ॥१७॥
ऐसा सोचकर वत्सराज प्रातःकाल वासवदत्ता के भवन से निकला और उसी दिन
अपराह्न में रानी पद्मावती के महल में गया ॥१८॥

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साप्येनमागतं दत्तशिक्षा वासवदत्तया।
तथैवोपाचरत्तृण्वत्पुष्टावोजसतमेव च॥११९॥
ततोऽन्यद्युस्तयोर्देव्योरेक चित्तमवेक्ष्य तत्।
यौगन्धरायणायासीत् सद्यस विमुह्यधूपः॥१२०॥
सोऽपि तं वीक्ष्य राजानं विचारपतितं शनैः।
कारुवेदी जगादेव मन्त्री यौगन्धरायणः॥१२१॥
जानेऽहं नैतदतावदभिप्रायोऽत्र दारुणः।
देवीभ्यां जीवितत्यागदार्ययुक्तं हि चेतसा॥१२२॥
अन्यासक्ते गते भर्त्त्रा स्त्रियो मरणनिश्चिताः।
भवन्त्यदैन्यगम्भीराः साध्व्यः सर्वत्र निःस्पृहाः॥१२३॥
असह्यं हि पुरन्ध्रीणां प्रेम्णो गाढस्य खण्डनम्।
तथा च राजंस्तत्रैतां श्रुतसेनकथां शृणु॥१२४॥
श्रुतसेनभूपतेः कथा
अभूद्दक्षिणभूमी प्राग्गोकर्णाख्ये पुरे नृपः।
श्रुतसेन इति ख्यातः कुम्भभूषानुभाञ्चितः॥१२५॥
तस्य चैकाऽभवच्चिन्ता राज्ञः सम्पूर्णसम्पदः।
आत्मामुरूपां भार्यां यत्स न तावदवाप्तवान्॥१२६॥
एकदा च नृपः कुर्व्वंश्चिन्तां तां तत्क्षपान्तरे।
अग्निधर्म्माभिधानेन जगदे सोऽग्रजन्मना॥१२७॥
आश्चर्य्ये द्वे मया दृष्टे ते राजन्वर्णये शृणु।
तीर्थयात्रागतः पञ्चतीर्थी तामहमाप्तवान्॥१२८॥
यस्यामप्सरसः पञ्च ग्राहत्वमुषिशापतः।
प्राप्ताः सतीश्वरस्तीर्थेमाभागताऽर्जुनम्॥१२९॥
तत्र तीर्थवरे स्नात्वा पञ्चरात्रोपवासिनाम्।
नारायणाचरतादायिनि स्नायिनां नृणाम्॥१३०॥
कर्पूरकथा
यावद् व्रजामि तावच्च लाङ्गलोल्लिखितावनिम्।
गायन्तं कश्चिदद्राक्षं शापित्रं क्षेत्रमध्यगम्॥१३१॥
स पृष्टः शापिरो मार्गं मार्य्यायातेन केनचित्।
प्रमादवेन तद्वाक्यं मामुणोत् गीततत्परः॥१३२॥

षष्ठ लम्बक ७४१

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षष्ठ लम्बक ७४१
वासवदत्ता से पूर्वशिक्षित रानी पद्मावती ने भी उसी प्रकार बिना कोई विकार प्रकट
किये राजा का स्वागत किया और पूछने पर उसी प्रकार का उत्तर दिया ॥१९॥
तब बाष्पामी विन दोनों रानियों के एक समान व्यवहार, एक समान हृदय और वचनों
पर विचार करते हुए राजाने सब कुछ मन्त्री यौगन्धरायण से कहा ॥२० ॥
यौगन्धरायण ने भी राजा को धीरे-धीरे विचार में पड़े हुए देखकर और अवसर समझ
कर इस प्रकार कहा—॥२१॥
'मैं समझता हूँ कि यह इतना ही नहीं है। दोनों रानियों ने जो इस प्रकार कहा है, उसका
आधार प्राणत्याग की दृढ़ भावना है ॥२२॥
सच्चरित्र स्त्रियाँ पति के दूसरी स्त्री पर आसक्त हो जाने पर या उसके स्वर्ग चले जाने
पर, मरने का निश्चय करके धैर्यसहित एवं स्पृहाहीन हो जाती हैं ॥२३॥
सती स्त्रियों को गहरे प्रेम का टूटना असह्य हो जाता है। हे राजन् इस सम्बन्ध में एक
कथा सुनाता हूँ सुनो ॥२४॥
राजा श्रुतसेन की कथा
प्राचीनकाल में दक्षिण भूमि के मोकर्क नामक नगर में कुल का भूषण और विद्वान् श्रुतसेन
नामक राजा था ॥२५॥
सभी प्रकार के वैभवों से परिपूर्ण उस राजा को बस एक ही चिन्ता थी कि उसे अपने
अनुकूल भार्या नहीं मिली थी ॥२६॥
एकबार राजा किसी विषय की चर्चा कर रहा था कि उसी समय अग्निधर्मा नामक
ब्राह्मण ने उससे कहा—॥२७॥
'महाराज मैंने अपने जीवन में जो आश्चर्य देखे उनका वर्णन करता हूँ सुनो—मैं तीर्थ
यात्रा के प्रसंग में उस पंचतीर्थों में गया जिसमें पाँच अप्सराएँ ऋषि के शाप से ग्राह (मगर)
बनकर रहती थीं वहीं पर तीर्थयात्रा के प्रसंग से आये हुए अर्जुन (पांडव) ने उन अप्सराओं
का उद्धार किया था ॥२८-२९॥
उस तीर्थ में स्नान करके पांच रातों तक उपवास करनेवाले मनुष्य नारायण के पार्षद
(अनुचर) बन जाते हैं ॥३० ॥
किसान की कथा
जब मैं उस तीर्थ की ओर गया तब मैंने हल से जोती हुई भूमि को देखा और एक खेत
के बीच में बैठे हुए किसान को गाते हुए देखा ॥३१॥
उस मार्ग से चलते हुए किसी संन्यासी ने उससे मार्ग पूछा किन्तु गाने में तल्लीन
कृषक ने उसे सुना नहीं ॥३२॥

७५ कथासरित्सागर

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७५ कथासरित्सागर
ततः स तस्मै चुक्रोध परिव्राड्विधुरो ब्रुवन्।
सोऽपि गीतं विमुच्याथ कार्पटिकस्तमभाषत ॥३३॥
अहो प्रव्राजकोऽसि त्वं धर्मस्वार्थं न वेत्स्यसि।
मूर्खेणापि मया ज्ञातं सारं धर्मस्य यत्पुनः ॥३४॥
तच्छ्रुत्वा किं त्वया ज्ञातमिति तेन च कौतुकात्।
प्रव्राजकेन पृष्टः सन्कार्पटिकः स जगाद तम् ॥३५॥
इहोपविश प्रच्छाये शृणु यावद् वदामि ते।
अस्मिन्प्रदेशे विद्यन्ते ब्राह्मणा भ्रातरस्त्रयः ॥३६॥
ब्रह्मदत्तः सोमदत्तो विष्णुदत्तश्च पुण्यकृत्।
येषां ज्येष्ठौ दारवन्तौ कनिष्ठस्त्वपरिग्रहः ॥३७॥
स तयोर्ज्येष्ठयोराज्ञां कुर्वन् कर्मकरो यथा।
मया सहासीदुच्छिन्नग्रहः तेषां हि कार्पिकः ॥३८॥
तौ च ज्येष्ठौ व्यबुध्येतां मृदु सं धृतिवर्जितम्।
साधुमप्यत्यन्तसं मार्गमृजुमायासवज्जितम् ॥३९॥
एकदा भ्रातृजायाभ्यां सकामाभ्यां रहोऽथितः।
कनिष्ठो विश्वदत्तोऽथ मातृत्वत्ते निराकरोत् ॥४० ॥
ततस्ते निजयोर्भर्त्रोरग्रे गत्वा मृषोचतुः।
वाञ्छत्यावां रहस्येष कनीयान्युवयोरिति ॥४१॥
तेनं त प्रति तौ ज्येष्ठौ सान्तःकोपौ बभूवतुः।
सदसद् वा न विद्मस्तु कुस्त्रीवचनमोहितौ ॥४२॥
अथतौ भ्रातरौ जातु विश्वदत्तं तमूचतुः।
गच्छ त्वं क्षेत्रमध्यस्थं वल्मीकं त समीकुरु ॥४३॥
तथेत्यागत्य वल्मीक कुद्दालेनाखनत् स तम्।
मा मैवं कृष्णसर्पोऽत्र वसतीत्युदितो मया ॥४४॥
तच्छ्रुत्वापि स वल्मीकमखनद्दृढभवत्त्विति।
पापैषिणोरप्यादेशं ज्येष्ठभ्रात्रोरलङ्घयन् ॥४५॥
खन्यमानात्तत प्राप कलश हेमपूरितम्।
न कृष्णसर्पं धर्मो हि सान्निध्यं कुरुते सताम् ॥४६॥
तं च नीत्वा स कलशं भ्रातृभ्यां सर्वमर्पयत्।
निवार्यमाणोऽपि मया ज्येष्ठाभ्यां दृढभक्तितः ॥४७॥

षष्ठ लम्बक ७५१

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षष्ठ लम्बक ७५१
तब व्यर्थ अपशब्द का प्रयोग करते हुए उस साधु ने उस किसान पर शाप किया। यह
देखकर वह किसान गाना बन्द करके संन्यासी से कहने लगा ॥३३॥
'आश्चर्य है कि तुम संन्यासी हो धर्म को नहीं जानते और मूर्ख होकर भी मैंने धर्म का सार
जान लिया है' ॥३४॥
यह सुनकर साधु कौतुक से बोला—'तुमने क्या जाना ?' उत्तर देते हुए किसान
ने कहा—'यहाँ छाया में बैठो और सुनो। मैं तुम्हें बताता हूँ इस प्रदेश में तीन ब्राह्मण भाई
थे।—ब्रह्मदत्त सोमदत्त और पुण्यात्मा विष्णुदत्त। उनमें दो बड़े विवाहित थे और तीसरा
अविवाहित था ॥३५-३७॥
वह तीसरा छोटा भाई राजाओं के समान दोनों बड़े भाइयों का काम नौकरों के समान
करता था। मैं उन्हीं ग्रामों का किसान हूँ ॥३८॥
अत्यन्त मृदु, सीधे-सादे सन्मार्गगामी सरल-हृदय और दम्भ-रहित उस छोटे भाई को वे
दोनों बड़े भाई मूर्ख और बुद्धिहीन समझते थे ॥३९॥
एक बार, उसकी दोनों बड़ी भाभियां उस पर आसक्त हो गईं और उन्होंने उससे प्रार्थना
की किन्तु छोटे भाई विष्णुदत्त ने उन्हें माता के समान समझते हुए छोड़ दिया ॥४० ॥
तब उन दोनों ने अपने पतियों के पास जाकर मिथ्या भाषण करते हुए कहा कि 'तुम दोनों
का छोटा भाई हमलोगों को एकान्त में चाहता है' ॥४१॥
यह सुनकर वे दोनों बड़े भाई, छोटे भाई के प्रति मन-ही-मन जल-भुन गये। सच है
दुष्ट स्त्री के वचन से मोहित व्यक्ति सच और झूठ पर विचार नहीं करते ॥४२॥
एक बार वे दोनों भाई विष्णुदत्त से बोले—'तुम जाओ। खेत के बीच वल्मीक (बाँबी)
को खोदकर बराबर करो' ॥४३॥
'अच्छा' कहकर वह जाकर हथियार से मिट्टी के ढेर को बराबर करने लगा तो मैंने
उसे रोका कि 'इसमें काला साँप है' ॥४४॥
यह सुनकर भी वह काटने से न हटा क्योंकि वह उन पापी बड़े भाइयों की आज्ञा का
उल्लंघन नहीं करना चाहता था ॥४५॥
खोदे जाते हुए वल्मीक से उसने सोने के मुक्ताहारों से भरा हुआ घड़ा प्राप्त किया।
किन्तु काला साँप नहीं मिला क्योंकि धर्म सद्व्यक्तियों का साथ देता है ॥४६॥
मेरे रोकने पर भी उसने गहरी भक्ति (प्रेम) के कारण उस घड़े को ले जाकर बड़े भाइयों
को सौंप दिया ॥४७॥

७५२ कथासरित्सागर

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७५२ कथासरित्सागर
तौ पुनस्तत एवांशं दत्त्वा प्रेर्य च घातकान्।
तस्याच्छेद्यतां पाणिपादं धनजिहीर्षया ॥४८॥
तथापि न स चुक्रोध निर्मत्सयुर्भ्रातरौ प्रति।
तेन सत्येन तस्याथ हस्तपादमजायत ॥४९॥
तदा प्रभृति तद्वुद्ध्वा त्यक्तः क्रोधोऽखिलो मया।
त्वया तु तापसेनापि क्रोधोऽद्यापि न मुच्यते ॥५०॥
अक्रोधेन जितं स्वर्गं पश्यैतदधुनैव भोः।
इत्युक्त्वैव तनुं त्यक्त्वा क्षापिकः स दिवं गतः ॥५१॥
इदमाश्चर्यं मया दृष्टं द्वितीयं शृणु भूपते।
इत्युक्त्वा श्रुतसेनं स नृपं विप्रोऽब्रवीत्पुनः ॥५२॥
विद्युद्द्योतायाः श्रुतसेननृपतेश्च कथा
ततोऽपि तीर्थयात्रार्थं पर्यटन्नम्बुधेस्तटे।
अह वसन्तसेनस्य राज्ञो राष्ट्रमवाप्तवान् ॥५३॥
सत्रं भोक्तुं प्रविष्टं मां राजसत्रेऽब्रुवन् द्विजाः।
ब्रह्मन् पथामुना मा गाः स्थिता ह्यत्र नृपात्मजा ॥५४॥
विद्युद्द्योताभिधाना तां पश्येदपि मुनिर्यदि।
स कामशरनिर्भिन्नः प्राप्योन्मादं न जीवति ॥५५॥
ततोऽहं प्रत्यवोचं तान्नैतच्चित्रं सदा ह्यहम्।
पश्याम्यपरकन्दर्पं श्रुतसेनमहीपतिम् ॥५६॥
यात्रादौ निर्गते यस्मिन्नरक्षिभिर्दृष्टिगोचरात्।
उत्सार्यन्ते सतीवृत्तमङ्गीकृत्या कुलाङ्गनाः ॥५७॥
इत्युक्तवन्तं विज्ञाय भावकं भोजनाय माम्।
नृपान्तिकं नीतवन्तौ सत्राधिपपुरोहितौ ॥५८॥
तत्र सा राजतनया विद्युद्द्योता मयेक्षिता।
कामस्येव जगन्मोहम प्रविद्या शरीरिणी ॥५९॥
चिरात्तद्दर्शनक्षोभं नियम्याहमचिन्तयम्।
अस्मत्प्रभावेनेद् भार्यैयं भवेद्राज्यं स विस्मरेत् ॥६०॥
तथापि कथनीयोऽयमुदन्तः स्वामिने मया।
उन्मादिनीभ्येसेनवृत्तान्तो ह्यन्यथा भवेत् ॥६१॥

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उन दोनों ने उस धन को लेकर और कुछ भाग उसे देकर, कुछ गुंडों को उभाड़ा और उस
धन को भी लेने की इच्छा से उसके हाथ-पैर कटवा दिये ॥४८॥
इतने अत्याचार करने पर भी वह अपने बड़े भाइयों पर क्रुद्ध नहीं हुआ। फलतः इस सत्य
वाक्य के प्रभाव से उसके हाथ-पैर ठीक हो गये ॥४९॥
उसे देखकर तब से मैंने सारा क्रोध छोड़ दिया। पर तुमने तपस्वी होकर भी अभी
तक क्रोध नहीं छोड़ा ॥५०॥
इस प्रभाव के कारण ही मैंने स्वयं पर विजय पाई है। अभी देखो'—ऐसा कहकर वह
विप्र अपना चोला (शरीर) त्यागकर उसी समय स्वर्ग को चला गया ॥५१॥
एक आश्चर्य तो मैंने यह देखा—'हे राजन् अब दूसरा सुनो—ऐसा कहकर वह
ब्राह्मण राजा श्रुतसेन से यह कहने लगा ॥५२॥
वहाँ से मैं तीर्थयात्रा के लिए समुद्र-तट पर भ्रमण करते हुए राजा बसन्तसेन के राज्य
में गया ॥५३॥

विद्युत्प्रभा और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू)

वहाँ पर राजा के भोजन-क्षेत्र में प्रवेश करने पर ब्राह्मण लोग मुझसे कहने लगे— 'ब्राह्मण
इस मार्ग से न जाओ। आगे मार्ग में राजा की कन्या बैठी है ॥५४॥
उसका नाम विद्युत्प्रभा है। उसे यदि कोई संयमी मुनि भी देख ले तो वह कामबाण
से आहत होकर बच नहीं सकता' ॥५५॥
तब मैंने उन्हें कहा 'कि यह कोई आश्चर्य नहीं है। मैं दूसरे कामदेव के समान श्रुतसेन राजा
को प्रतिदिन देखता हूँ। जिस राजा के बाहर निकलने पर सैनिक गण कुलस्त्रियों का उनका
सती चरित्र भंग होने के भय से मार्ग से हटा देते हैं' ॥५६-५७॥
ऐसा कहते हुए मुझे आपका कृपापात्र समझकर सत्र के व्यवस्थापक और पुरोहित राजा
के समीप ले गये ॥५८॥
वहाँ मैंने राजपुत्री विद्युत्प्रभा को देखा है। वह मानों काम की शरीरधारिणी जग मोहिनी
पराविद्या है। उसके दर्शन से होनेवाले क्षोभ को बहुत विलम्ब के पश्चात् नियन्त्रित करके
मैंने यह सोचा—'यदि यह हमारे स्वामी की पत्नी हो जाय तो वह सारा राज्यकार्य भूल
जाय' ॥५९-६०॥
फिर भी मुझे यह समाचार तो प्रभु (आप) से कहना ही चाहिए अन्यथा देवसेन और
उन्मादिनी की-सी गति हो जायगी ॥६१॥
९५

७५४ कथासरित्सागर

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७५४ कथासरित्सागर
उन्मादिन्याः देवसेननृपतेश्च कथा
देवसेनस्य नृपते पुरा राष्ट्रे वणिक्सुता।
उन्मादिनीतमभूत्कन्या जगदुन्मादकारिणी ॥६२॥
आवेदितापि सा पित्रा न तेनात्ता महीभृता।
विप्रैः कुलक्षणैरयुक्ता तस्य व्यसनरक्षिभिः ॥६३॥
परिणीता तदीयेन मन्त्रिमूर्येन सा ततः।
वातायनात्प्रादारत्मानं राज्ञेऽस्मै आत्मवर्शयत ॥६४॥
तया मुनरुया राजेन्द्रो दूराद्दृष्टिविपाहतः।
मुहुर्मुमूच्छे न रतिं लेभे नाहारमाहरत् ॥६५॥
प्राषितोऽपि च सद्मन्तं प्रमुखे सोऽथ मन्त्रिभिः।
धार्मिकस्तां न जग्राह तत्सक्तश्च जहावसूनू ॥६६॥
तदीवृक्षे प्रमादेऽत्र कृते द्रोहः कृतो भवेत्।
इत्यालोच्य मयोक्तं ते चित्रमेत्य ततोऽद्य तत् ॥६७॥
श्रुत्वैतत्स द्विजात्तस्मान्मदनाज्ञानिभ वचः।
विद्युद्द्योताहृतमनाः श्रुतसेननृपोऽभवत् ॥६८॥
छद्माणं च विसृज्यैव तत्र विप्रं तमेव सः।
तश्चाकरोद्यथानीयं शीघ्रं तां परिणीतवान् ॥६९॥
ततः सा नृपतेस्तस्य विद्युद्द्योता नृपात्मजा।
शरीराभ्यतिरिक्तासीद् भास्करस्य प्रभा यथा ॥७०॥
अथ स्वयंवरोपागात् नृपं रूपगर्विता।
कन्यका मानुदत्ताख्या महाधनवणिक्कता ॥७१॥
अधर्मभीत्या जग्राह स गजा तां वणिक्सुताम्।
विद्युद्द्योताम तद्बुद्धया हृत्स्फोटम् व्यपद्यत ॥७२॥
राजाप्यागत्य तां कान्तां पश्यन्नेव तथागताम्।
अङ्क कृत्वा रु विरपन् राज्ञ प्राणवियुज्यत ॥७३॥
ततो वणिक्सुता वह्निं भानुदत्ता विवेश सा।
इत्थं प्रणष्टे गर्वं तन्पि राष्ट्रं सराजकम् ॥७४॥
अतो गजन् पृष्टस्य भङ्ग प्रेम्ण भूत्सद्द।
वियोगेन मनस्विन्या दम्या पागवन्तपा ॥७५॥

षष्ठ लम्बक ४५५

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षष्ठ लम्बक ४५५
उन्मादिनी और राजा देवसेन की कथा
प्राचीन काल में राजा देवसेन के राष्ट्र में समस्त संसार को उन्मत्त बनाने
वाली उन्मादिनी नाम की एक वैश्य-कन्या थी ॥६२॥
उसके पिता की प्रार्थना पर भी राजा ने ब्राह्मणों के उसे कुलक्षणा बताने के कारण ग्रहण
नहीं किया ॥६३॥
उस कन्या को राजा के प्रधान मन्त्री ने ब्याह लिया। किसी समय उन्मादिनी ने खिड़की
से अपना स्वरूप राजा को दिखा दिया। उसकी दृष्टि के विष से राजा बार-बार मूर्च्छित होने
लगा और उसका मन भोजन पान तथा शयन आदि किसी कार्य में नहीं लगा ॥६४-६५॥
तदनन्तर उन्मादिनी के पति प्रधान-मन्त्री द्वारा राजा से उसे ग्रहण करने की प्रार्थना
किए जाने पर भी राजा ने धार्मिक प्रवृत्ति के कारण उसे स्वीकार न किया और उसकी आसक्ति में
अपने प्राण दे दिये ॥६६॥
इस प्रकार के प्रमाद के यहाँ होने पर स्वामी-द्रोह हो सकता है, यही सोचकर यह
आश्चर्य मैंने आपसे कह दिया ॥६७॥
वह राजा श्रुतसेन कामदेव की आज्ञा के समान उस ब्राह्मण से यह वृत्तान्त सुनकर
विद्युत्प्रभा पर हृदय से आसक्त हो गया ॥६८॥
तदनन्तर उस राजा ने उसी क्षण ब्राह्मण को विदा करके ऐसा प्रबन्ध किया कि विद्युत्प्रभा
से उसका विवाह हो गया। विवाह हो जाने पर वह राजपुत्री विद्युत्प्रभा राजा श्रुतसेन से उसी
प्रकार अभिन्न थी जैसे सूर्य की प्रभा सूर्य से अभिन्न होती है ॥६९-७०॥
कुछ समय के पश्चात् राजा श्रुतसेन के पास किसी महाधनी वैश्य की रूपगर्विता कन्या
भानुदत्ता स्वयंवर के लिए आई ॥७१॥
अधर्म के भय से राजा ने वैश्यकन्या को ग्रहण कर लिया। यह जानकर राजा की पहली
रानी विद्युत्प्रभा का हृदय विदीर्ण हो गया और वह मर गई ॥७२॥
राजा ने आकर जब अपनी पहली रानी को मरा हुआ देखा तब उसने उसे अपनी गोद में
रख लिया और शोक में रीता हुआ वह भी उसी क्षण मर गया। उसके बाद वैश्य कन्या भानुदत्ता
भी आग में कूद कर जल मरी। इस प्रकार, सारे राज्य का ही सत्यानाश हो गया ॥७३-७४॥
इसलिए महाराज उच्चकोटि के गहरे प्रेम जानकर मानिनी रानी वासवदत्ता के प्रेम
का भंग अत्यन्त कष्टप्रद है ॥७५॥

४५६ कथासरित्सागर

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४५६ कथासरित्सागर
महामन्त्रिणो यौगन्धरायणस्य राजनैतिकः प्रपञ्चः (पूर्वानुवर्ती)
तस्मात्कलिङ्गसेनेयं परिणीता यदि त्वया।
देवी वासवदत्ता तत्तत्प्राणाञ्जह्यान्न संशयः ॥७६॥
देवी पद्मावती तद्वत्तयोरेकं हि जीवितम्।
नरवाहनदत्तश्च पुत्रस्ते स्यात्कथं ततः ॥७७॥
तच्च देवस्य हृदयं सोढुं ज्ञाने न शक्नुयात्।
एवमेकपदे सर्वमिदं नश्येन्महीपते ॥७८॥
देव्योर्यच्छोक्तिगाम्भीर्यं तदेव कथयत्यलम्।
हृदयं जीवितत्यागगाढनिश्चितनिःस्पृहम् ॥७९॥
तत्स्वार्थो रक्षणीयस्ते तिर्यञ्चोऽपि हि जानते।
स्वरक्षां किं पुनर्देव बुद्धिमन्तो भवादृशाः ॥८०॥
इति मन्त्रिवराच्छ्रुत्वा स्वैरं यौगन्धरायणात्।
सम्यग्विवेकपदवीं प्राप्य वत्सेश्वरोऽब्रवीत् ॥८१॥
एवमेतन्न सन्देहो नश्येत्सर्वमिदं मम।
तस्मात्कलिङ्गसेनायाः शोच्यं परिणयेन मे ॥८२॥
उक्तो सम्बन्ध दूरे यसद्युक्तं गणकै इतम्।
स्वयंवरागतान्यागाद्धर्मो वा कियान्भवेत् ॥८३॥
इत्युक्तो वत्सराजेन हृष्टो यौगन्धरायणः।
चिन्तयामास कार्यं न सिद्धप्रायं यथेप्सितम् ॥८४॥
उपायसरससिक्ता देशकालोपबृंहिता।
सेयं नीतिमहावल्ली किं नाम न फलेत्फलम् ॥८५॥
इति सञ्चिन्त्य स ध्यायन् देशकालौ प्रणम्य तम्।
राजानं प्रययौ मन्त्री गृहं यौगन्धरायणः ॥८६॥
राजापि रचितातिथ्यगताकारामुपेत्य सः।
देवी वासवदत्तां तां सान्त्वयन्नेवमब्रवीत् ॥८७॥
किमर्थं वच्मि जानासि त्वमत्र हरिणाक्षि यत्।
वारि वारिरुहस्येव त्वत्प्रेम मम जीवितम् ॥८८॥
मामापि हि किमन्यस्या ग्रहीतुमहमुत्सहे।
कलिङ्गसेना तु हठादुपायाता गृहं मम ॥८९॥