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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १८० ) माधवनिदान ।

( १८० ) माधवनिदान ।
वातिक मूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
तीव्रार्तिरुग्वंक्षणबस्तिमेढ्रे स्वल्पं मुहुर्मूत्रयतीह वातात् ।
वातके मूत्रकृच्छ्रसे वंक्षण ( जंघा और ऊरु इनकी सन्धि ), मूत्राशय और इंद्रिय
इनमें पीडा और मूत्र बारम्बार थोडा २ उतरे ॥
पैत्तिकमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
पीतं सरक्तं सरुजं सदाहं कृच्छ्रं मुहुर्मूत्रयतीह पित्तात् ॥ ३ ॥
पैत्तिकमें पीला, कुछ लाल, पीडायुक्त, जलनके साथ बारम्बार कष्टसे मूत्र उतरे ॥
कफमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
बस्तेः सलिङ्गस्य गुरुत्वशोथौ मूत्रं सपिच्छं कफमूत्रकृच्छ्रे ।
कफके मूत्रकृच्छ्रमें लिंग और मूत्राशय भारी हो, सूजन और मूत्र चिकना होय ॥
सन्निपातमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
सर्वाणि रूपाणि तु सन्निपाताद्भवन्ति तत्कृच्छ्रतमं हि कृच्छ्रम् ॥ ४ ॥
सन्निपातके मूत्रकृच्छ्रमें सर्व लक्षण होते हैं। यह मूत्रकृच्छ्र कष्टसाध्य है ॥
शल्यजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
मूत्रवाहिषु शल्येन क्षतेष्वभिहतेषु च ।
मूत्रकृच्छ्रं तदाघाताज्जायते भृशदारुणम् ॥
वातकृच्छ्रेण तुल्यानि तस्य लिङ्गानि लक्षयेत् ॥ ५ ॥
मूत्र बहानेवाले स्रोत (मार्ग) शल्य (तीर आदि) से बिंधजायँ अथवा पीडित होयँ
तो उस घातसे भयंकर मूत्रकृच्छ्र होय है, इसके लक्षण वातमूत्रकृच्छ्रके समान होयँ ॥
मलके मूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
शकृतस्तु प्रतीघाताद्वायुर्विगुणतां गतः ।
आध्मानं वातसङ्गं च मूत्रसङ्गं करोति च ॥ ६ ॥
मल ( विष्ठा ) के अवरोध होनेसे वायु विगुण ( उलटा ) होकर अफरा वात-
शूल और मूत्रनाश करे तब मूत्रकृच्छ्र प्रगट होय ॥
अश्मरीजन्य मूत्रकृच्छ्र ।
अश्मरीहेतु तत्पूर्वं मूत्रकृच्छ्रमुदाहरेत् ॥ ७ ॥
पथरीके योगसे जो मूत्रकृच्छ्र होय उसको पथरीका मूत्रकृच्छ्र कहते हैं ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १८१ )
शुक्रजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
शुक्रे दोषैरुपहते मूत्रमार्गे विधारिते ।
सशुक्रं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्वस्तिमेहनशूलवान् ॥ ८ ॥
दोषोंके योगसे शुक्र ( वीर्य ) दुष्ट होकर मूत्रमार्गमें गमन करे, तब उस
मनुष्यके मूत्राशय और लिङ्ग इनमें शूल होय और मूतते समय मूत्रके सङ्ग वीर्य
पतन होय ॥
अश्मरी और शर्करा इनके साम्य और अवान्तरभेद ।
अश्मरी शर्करा चैव तुल्यसम्भवलक्षणे । विशेषणं शर्करायाः
शृणु कीर्त्तयतो मम ॥ ९ ॥ पच्यमानाऽश्मरी पित्ताच्छोष्यमाणा
च वायुना । विमुक्तकफसन्धाना क्षरन्ती शर्करा मता ॥ १० ॥
हृत्पीडा वेपथुः शूलं कुक्षावग्निश्च दुर्बलः। तया भवति मूर्च्छा च
मूत्रकृच्छ्रं च दारुणम् ॥ ११ ॥
अश्मरी ( पथरी ) और शर्करा इन दोनोंकी संप्राप्ति और लक्षण समान हैं परन्तु
इनमें थोडासा भेद है उसको कहता हूं सुनो, पित्तसे पकनेवाली और वायुसे शुष्क
होनेवाली ऐसी पथरी कफसंबन्धी न होय, तब मूत्रके मार्गसे रेतके समान झरने
लगे, उसको शर्करा कहते हैं । उस शर्करायोगसे हृदयमें पीडा, कम्प, कूखमें
शूल, मन्दाग्नि, मूर्च्छा और भयंकर मूत्रकृच्छ्र ये रोग होयें ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां
मूत्रकृच्छ्रनिदानं समाप्तम् ॥
अथ मूत्राघातनिदानम् ।
जायन्ते कुपितैर्दोषैर्मूत्राघातास्त्रयोदश ।
प्रायो मूत्रविघाताद्यैर्वातकुण्डलिकादयः ॥ १ ॥
मूत्रके वेग रोकनेसे ( आदिशब्दसे मल शुक्रादि वेग रोकना और रूक्ष
भोजन आदि जानना ) कुपित भये दोषोंसे वातकुण्डलिकादि तेरह प्रकारके मूत्रा-
घातरोगको करे ॥
वातकुण्डलिकाके लक्षण ।
रौक्ष्याद्वेगविघाताद्वा वायुर्बस्तौ सवेदनः ।