माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १२८ ) माधवनिदान ।
( १२८ ) माधवनिदान ।
अथोन्मादनिदानम् ।
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मदयन्त्युद्गता दोषा यस्मादुन्मार्गमाश्रिताः ।
मानसोऽयमतो व्याधिरुन्माद इति कीर्त्यते ॥ १ ॥
दोष ( वात पित्त कफ ) बढकर अपने २ मार्गको छोड अन्यमार्ग अर्थात्
मनोवह धमनियोंमें प्राप्त होकर मनको उन्मत्त करें और यह व्याधि मानसी है
अतएव इसको उन्माद ऐसे कहते हैं ॥
एकैकशः सर्वशश्च दोषैरत्यर्थमूर्च्छितैः । मानसेन च दुःखेन
स पञ्चविध उच्यते ॥ २ ॥ विषाद्भवति षष्ठश्च यथास्वं तत्र
भेषजम् । स चाप्रवृद्धस्तरुणो मदसंज्ञां बिभर्ति च ॥ ३ ॥
अत्यन्त कुपित भये पृथक् पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपात ४ और ५ मानसिक
दुःखसे यह रोग पांच प्रकारका और ६ विषखानेसे छठा, इनमें यथादोषानुसार
औषध देनी चाहिये, जबतक यह रोग बढे नहीं और जबतक तरुण रहे तबतक इस
रोगको मद ऐसे कहते हैं ॥
उन्मादके सामान्य कारण और सम्प्राप्ति ।
विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि प्रधर्षणं देवगुरुद्विजानाम् ।
उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वो मनोऽभिघातो विषमाश्च चेष्टाः ॥ ४ ॥
तैरल्पसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा बुद्धेर्निवासं हृदयं प्रदूष्य ।
स्रोतांस्यधिष्ठाय मनोवहानि प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः ॥ ५ ॥
विरुद्ध दुष्ट कहिये जहर मिला अन्न आदि, अशुचि चाण्डालादिसे स्पर्श करा
ऐसा भोजन, देवता, गुरु, ब्राह्मण इसका तिरस्कार करनेसे, भय और हर्षके होनेसे
मनको बिगाड सब चेष्टा विपरीत करे अर्थात् टेढा तिरछा चले, बलवान्से वैर
करे, बकने लगे । इस श्लोकमें पूर्वशब्द कारणका है और चकारसे काम क्रोध
लोभादिक भी उन्माद रोगके कारण हैं यह जैज्जटका मत है । इनमें कहे जो कार-
णोंसे अल्प सत्त्वगुणवाले पुरुषके वातादिक दोष कुपित होकर बुद्धिका निवासस्थान
( रहनेका ठिकाना ) जो हृदय उसको बिगाड मनके बहनेवाले स्रोतोंमें प्राप्त हो
मनुष्यके अन्तःकरणको मोहित करें ॥
१ उत् ऊर्ध्वं हृदयं गता दोषा मदयन्ति मनोविभ्रमं कुर्वन्तीत्युन्मादः ॥
भाषाटीकासमेत । ( १२९ )
उन्मादका स्वरूप ।
धीविभ्रमः सत्त्वपरिप्लवश्च पर्याकुला दृष्टिरधीरता च ।
अबद्धवाक्यं हृदयं च शून्यं सामान्यमुन्मादगदस्य चिह्नम् ॥ ६ ॥
बुद्धिमें भ्रम, मनका चञ्चल होना, दृष्टिका सर्वत्र चलना, अधीरजपना ( डर-
पना ); कुछका कुछ बोलना, हृदय शून्य हो जाय ( अर्थात् विचार शक्तिका नाश
होना ) ये उन्मादरोगके सामान्य लक्षण हैं ॥
विशेष लक्षण ।
रूक्षाल्पशीतान्नविरेकधातुक्षयोपवासैरनिलोऽतिवृद्धः ।
चिन्तादिदुष्टं हृदयं प्रदूष्य बुद्धिं स्मृतिं चापि निहन्ति शीघ्रम् ॥७॥
अस्थानहासस्मितनृत्यगीतवागङ्गविक्षेपणरोदनानि ।
पारुष्यकाश्यर्यारुणवर्णता च जीर्णे बलं चानिलजस्वरूपम् ॥ ८ ॥
रूखा, थोडा और शीतल ऐसा 'अन्नविरेक' इस शब्दसे इस जगह दस्त और
वमन जानना, धातुक्षय और उपवास इन कारणोंसे अत्यन्त बढी जो वायु सो
चिन्ता शोकादिकरके युक्त होकर हृदयको अत्यन्त दुष्टकर बुद्धि और स्मरण इनका
शीघ्र नाश करे और हँसनेके कारण विना हँसे ( मन्दमुसकान करे ) नाचे, बिना
प्रसंगके गीत और बोलना करे, हाथोंको सर्वत्र चलावे, रोवे और शरीर रूखा तथा
कृश और लाल हो जाय और आहारका परिपाक भयंकर ज्यादा जोर होय ये
वातज उन्मादके लक्षण हैं ॥
पित्तज उन्मादके कारण और लक्षण ।
अजीर्णकट्वम्लविदाह्यशीतैर्भोज्यैश्चितं पित्तमुदीर्णवेगम् ।
उन्मादमत्युग्रमनात्मकस्य हृदि स्थितं पूर्ववदाशु कुर्यात् ॥ ९ ॥
अमर्षसंरंभविनग्नभावाः सन्तर्जनाभिद्रवणौष्ण्यरोषाः ।
प्रच्छायशीतान्नजलाभिलाषः पीतास्यता पित्तकृतस्य लिङ्गम्॥१०॥
अधकच्ची, कडवी, खट्टी, दाह करनेवाली और गरम ऐसी २ वस्तु भोजन कर-
नेसे संचित भया जो पित्त सो तीव्रवेग होकर अजितेन्द्रिय पुरुषके हृदयमें प्रवेश कर
पूर्ववत् अति उग्र उन्माद तत्काल उत्पन्न करे । इस उन्मादसे असहनशील, हाथ
पैरोंको पटकनेवाला, नग्न हो जाय, डरपे, भाजने लगे, देह गरम होजाय, क्रोध करे,
छायामें रहे, शीतल अन्न और शीतल जल इनकी इच्छा, पीला मुख होजाय ये
लक्षण पित्तज उन्मादके हैं ॥
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