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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १६६ ) माधवनिदान ।

( १६६ ) माधवनिदान ।
पेटमें गुडगुड़ाहट होय, उबकाइयोंका आना, दह, देह भारी, मन्दता, अफरा,
मुखसे कफका स्राव इन लक्षणोंसे तथा कफशूल लक्षणोंके समान ऐसे शूलको
आमशूल कहते हैं ॥
द्वन्द्वजशूलोंके लक्षण ।
बस्तौ हृत्कण्ठपार्श्वेषु स शूलः कफवातिकः । कुक्षौ हृन्नाभि-
पार्श्वेषु स शूलः कफपैत्तिकः ॥ १३ ॥ दाहज्वरकरो घोरो
विज्ञेयो वातपैत्तिकः । एकदोषोत्थितः साध्यः कृच्छ्रसाध्यो
द्विदोषजः ॥ सर्वदोषोत्थितो घोरस्त्वसाध्यो भूर्युपद्रवः ॥ १४ ॥
वस्ति ( मूत्रस्थान ), हृदय, कण्ठ, पसवाडे इन ठिकाने शूल होय वह ( कफ-
वातिक ) जानना. कूख हृदय नाभि और पसवाडे इनमें कफपित्तका शूल होय है,
दाहज्वर करनेवाला ऐसा भयंकर शूल होय वह वातपित्तका जानना । एक दोषका
शूलरोग साध्य है, दो दोषोंका कृच्छ्रसाध्य और तीनों दोषोंका भयंकर और बहुत
उपद्रवयुक्त होय वह शूल असाध्य जानना ॥
ग्रन्थांतरोक्तशूलके स्थान ।
वातात्मकं बस्तिगतं वदन्ति पित्तात्मकं चापि वदन्ति नाभ्याम् ।
हृत्पार्श्वकुक्षौ कफसन्निदिष्टं सर्वेषु देशेषु च सन्निपातात् ॥ १ ॥
वातका शूल बस्तिमें होता है, पित्तका नाभिमें, कफका हृदय पसवाडा कोखमें,
सन्निपातका सब जगह होता है ॥
शूलके उपद्रव ।
वेदना च तृषा मूर्च्छा आनाहो गौरवारुची ।
कासश्वासौ च हिक्का च शूलस्योपद्रवाः स्मृताः ॥ २ ॥
वेदना, तृषा, मूर्च्छा, अफरा, गुरुता, अरुचि, कास, श्वास और हिचकी ये
शूलके उपद्रव जानने ॥
परिणामशूलनिदान ।
स्वैर्निदानैः प्रकुपितो वायुः सन्निहितस्तथा। कफपित्ते समा-
वृत्य शूलकारी भवेद्वली ॥ १५ ॥ भुक्ते जीर्यति यच्छूलं
तदेव परिणामजम् । तस्य लक्षणमप्येतत्समासेनाभिधीयते १६॥
अपने रौक्ष आदि कारणोंसे वायु कुपित होकर कफपित्तके समीप जाय उसको
आवृत कर बली होकर शूलको उत्पन्न करे, आहार पचनेके समय जो शूल होय
उसको परिणामशूल कहते हैं; उसके लक्षण संक्षेपसे कहता हूँ ॥

भाषाटीकासमेत । ( १६७ )
वातिक परिणामशूलके लक्षण ।
आध्मानाटोपविण्मूत्रनिबन्धारतिवेपनैः ।
स्निग्धोष्णोपशमप्रायं वातिकं तद्वदेद्भिषक् ॥ १७ ॥
पेटका फूलना तथा पेटमें गुडगुडशब्द, मलमूत्रका अवरोध, अरति ( मनका
न लगना ), कम्प ये लक्षण हों और चिकना, गरम पदार्थसे शांत होय ऐसे
शूलको वातिक कहते हैं ॥
पैत्तिक परिणामशूलके लक्षण ।
तृष्णादाहारतिस्वेदकट्वम्ललवणोत्तरम् ।
शूलं शीतशमप्रायं पैत्तिकं लक्षयेद् बुधः ॥ १८ ॥
प्यास, दाह, चित्तका न लगना, पसीना ये लक्षण होयँ । तीखा, खट्टा, नोनका
ऐसे पदार्थ खानेसे बढनेवाला और शीतल पदार्थके सेवनसे शांत होय ऐसा शूल
पित्तका जानना ॥
श्लैष्मिक परिणामशूलके लक्षण ।
छर्दिहल्लाससंमोहस्वल्परुग्दीर्घसन्तति ।
कटुतिक्तोपशान्तं च तच्च ज्ञेयं कफात्मकम् ॥ १९ ॥
वमन, अफरा और संमोह ( इंद्रिय और मनको मोह ) ये लक्षण जिसमें बहुत
होयँ, पीडा थोडी होय, शूल बहुत दिन रहे, कडुवे और तीखे पदार्थसे शांत होय
उस शूलको कफात्मक जानना ॥
द्विदोषज और त्रिदोषजके लक्षण ।
संसृष्टलक्षणं यच्च द्विदोषं परिकल्पयेत् ।
त्रिदोषजमसाध्यं तु क्षीणमांसबलानलम् ॥ २० ॥
जिसमें दो दोषोंके लक्षण मिले हों उसको द्वंद्वज कहते हैं और तीन दोषोंके
लक्षणोंसे त्रिदोषज जानना । मांस बल और अग्नि ये जिसके क्षीण होगये हों ऐसा
शूलरोग असाध्य जानना ॥
अन्नके उपद्रवसे प्रगट शूलके लक्षण ।
जीर्णे जीर्यत्यजीर्णे वा यच्छूलमुपजायते ।
पथ्यापथ्यप्रयोगेन भोजनाभोजनेन च ॥
न शमं याति नियमात्सोऽन्नद्रव उदाहृतः ॥ २१ ॥
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