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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १५८ ) माधवनिदान ।

( १५८ ) माधवनिदान ।
कफाधिकके लक्षण ।
कफे स्तैमित्यगुरुतासुप्तिस्निग्धत्वशीतताः ।
कण्डूर्मन्दा च रुग्द्वन्द्वे सर्वलिङ्गं च सङ्करात् ॥ १३ ॥
कफाधिक वातरक्तमें स्तैमित्य (गीले कपड़ेसे आच्छादित समान), भारीपणा,
शून्यता, चिकनापना, शीतलता, खुजली और मन्द पीड़ा ये लक्षण होते हैं । दो
दोषोंके वातरक्तमें दो दोषोंके लक्षण और तीनों दोषोंके वातरक्तमें तीनों दोषोंके
लक्षण होते हैं ॥
पैरोंमें वातरक्त हुआ होय उसकी उपेक्षा करनेसे हाथोंमें होय है,
उसको कहते हैं—
पादयोर्मूलमास्थाय कदाचिद्धस्तयोरपि ।
आखोर्विषमिव क्रुद्धं तद्देहमनुसर्पति ॥ १४ ॥
वह वातरक्त पैरोंके मूलमें होकर कदाचित् हाथोंमें भी होय है । सो आखु
(मूसे) के विष सदृश सर्व देहमें मन्द मन्द फैल जाय, यह वातरक्त चरकने दो
प्रकारका कहा है एक उत्तान दूसरा गम्भीर, त्वचा और मांस इनमें होय सो उत्तान
और गम्भीर इसकी अपेक्षा भीतरी होय है ॥
असाध्य लक्षण ।
आजानुस्फुटितं यच्च प्रभिन्नं प्रस्रुतं च यत् ।
उपद्रवैर्यच्च जुष्टं प्राणमांसक्षयादिभिः ।
वातरक्तमसाध्यं स्याद्याप्यं संवत्सरोत्थितम् ॥ १५ ॥
आजानु (जंघाके नीचेको भाग) पर्यन्त गया भया वातरक्त असाध्य है,
जिसकी त्वचा फटगई होय, चिरगया होय और जो स्रावयुक्त होय ऐसा वातरक्त
प्राणमांसक्षयादिक उपद्रवयुक्त होय, आदिशब्दसे जो आगे (श्रम अरोचक श्वास)
इत्यादिक कहेंगे वे भी लक्षण होयँ सो भी असाध्य है। वातरक्त प्रगट भये वर्ष
दिन व्यतीत होगया होय सो याप्य होय है, वर्ष दिनके पहिले साध्य होय है, परंतु
उसमें स्फुटितादि लक्षण न होय तो साध्य है ॥
उपद्रव ।
अस्वप्नारोचकश्वासमांसकोथशिरोग्रहाः ।
मूर्च्छातिमदरुक्कृष्णाज्वरमोहप्रवेपकाः ॥ १६ ॥
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भाषाटीकासमेत। ( १५९ )
हिक्कापाङ्गुल्यवीसर्पपाकतोदभ्रमक्लमाः ॥ १७ ॥
अङ्गुलीवक्रतास्फोटदाहमर्मग्रहार्बुदाः ।
एतैरुपद्रवैर्वर्ज्यं मोहेनैकेन चापि यत् ॥ १८ ॥
निद्रानाश, अरुचि, श्वास, मांसका सडना, मस्तकका जकडना, मूर्च्छा, अत्यन्त
पीडा, प्यास, ज्वर, मोह, कम्प, हिचकी, पांगुलापना, विसर्परोग, पकना, नोचने-
कीसी पीडा, भ्रम, अनायास श्रम, उंगली टेढी होजाय, फोडा, दाह, मर्मस्थानोंमें
पीडा, अर्बुद (गांठ) हो इन उपद्रवयुक्त वातरक्तवाला रोगी असाध्य है अथवा
एक मोहयुक्तही होय तो भी असाध्य जानना ॥
साध्यासाध्यविचार ।
"अकृत्स्नोपद्रवं याप्यं साध्यं स्यान्निरुपद्रवम् ।
एकदोषानुगं साध्यं नवं याप्यं द्विदोषजम् ॥
त्रिदोषजमसाध्यं स्याद्यस्य च स्युरुपद्रवाः ॥
जिस वातरक्तमें सब उपद्रव होवे नहीं वह याप्य है और निरुपद्रव साध्य, जो
एक दोषका होय वह साध्य है और द्विदोषज याप्य और त्रिदोषज तथा उपद्रव-
युक्त होय तो वातरक्त असाध्य है। यह श्लोक क्षेपक है माधवका नहीं है ॥"
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
वातरक्तनिदानं समाप्तम् ॥
अथोरुस्तंभनिदानम् ।
--०००--
शीतोष्णद्रवसंशुष्कगुरुस्निग्धैर्निषेवितैः । जीर्णाजीर्णे तथा-
याससंक्रोधस्वप्नजागरैः ॥१॥ संश्लेष्ममेदःपवनः साममत्यर्थ-
संचितम् । अभिभूयेतरं दोषमूरू चेत्प्रतिपद्यते ॥ २ ॥
सक्थ्यस्थीनि प्रपूर्यान्तः श्लेष्मणा स्तिमितेन च । तदा
स्तम्भाति तेनोरू स्तब्धौ शीतावचेतनौ ॥ ३॥ परकीयाविव
गुरू स्यातामतिभृशव्यथौ । ध्यानाङ्गमर्दस्तैमित्यतंद्राच्छ-
र्द्यरुचिज्वरैः ॥ ४ ॥ संयुक्तौ पादसदनकृच्छ्रोद्धरणसुप्तिभिः ।
तमूरुस्तंभमित्याहुराढ्यवातमथापरे ॥ ५ ॥
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