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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( ५६ ) माधवनिदान ।

( ५६ ) माधवनिदान ।
सशब्दं मन्दवेदनम् । पक्षान्मासादशाहाद्वा नित्यं वाप्यथ
मुञ्चति ॥ २ ॥ दिवा प्रकोपो भवति रात्रौ शान्तिं व्रजेच्च
सा । दुर्विज्ञेया दुश्चिकित्स्या चिरकालानुबन्धिनी ॥ सा भवे-
दामवातेन संग्रहग्रहणी मता ॥ ३ ॥
आंतोंमें शब्द होना, आलसक, दुर्बलता, शरीरमें पीडा तथा पतला ठण्डा कुछ
गाढा चिकना दस्त होवे दस्त होते समय कमरमें दर्द होवे । पन्द्रह दिन अथवा
एक महीना अथवा दस दिन बाद हमेशा बहुत आम रेसादार शब्दसहित मन्द २
पीडासे निकले वह भी आम दिनमें अधिक निकले और रातमें शांतिको प्राप्त हो ।
दुःखसे जानने योग्य दुःखसे चिकित्सा करने योग्य बहुत समयतक रहनेवाली
होवे । ऋषियोंने आम और वातसे संगृहीतको संग्रहणी कहा है ॥
स्वपतः पार्श्वयोः शूलं गलज्जलघटीध्वनिः ।
तं वदन्ति घटीयन्त्रमसाध्यं ग्रहणीगदम् ॥ ४ ॥
सोतेहुए मनुष्यके दोनों पसवाडोंमें शूल तथा निगलते हुए जलकी चेष्टाके समान
शब्द हो उस ग्रहणी रोगको घटीयन्त्र कहते हैं और वह असाध्य है ॥ )
दोषं सामं निरामं च विद्यादत्रातिसारवत् ॥ १८ ॥
जैसे अतिसारमें मलका जलमें डूबने आदि लक्षणोंसे आम और उसके विप-
रीत होनेसे निरामता ( यकृत् ) जानी जाती है उसी प्रकार ग्रहणीरोगमें भी
जाननी चाहिये ॥
लिङ्गैरैसाध्यो ग्रहणीविकारो यैस्तैरतीसारगदो न सिध्येत् ।
वृद्धस्य नूनं ग्रहणीविकारो हत्वा तनूमेव निवर्तते च ॥ १९ ॥
जिन " पक्वं जाम्बवसंकाशम् " इत्यादि लक्षणोंसे अतिसाररोग असाध्य होजाता
है उन्हीं लक्षणोंसे ग्रहणीरोग भी असाध्य होजाता है अर्थात् जो अतिसारके असाध्य
लक्षण हैं वे ही ग्रहणीरोगके असाध्य लक्षण समझने चाहिये । और वृद्ध मनुष्यका
ग्रहणीरोग तो शरीरको नाश करके ही दूर होता है ॥
बालके ग्रहणी साध्या यूनि कृच्छ्रा समीरिता ।
वृद्घे त्वसाध्या विज्ञेया मतं धन्वन्तरेरिदम् ॥ २० ॥
बच्चेके हुआ ग्रहणीरोग साध्य होता है और जवान पुरुषके ग्रहणीरोग कृच्छ्रसाध्य
होता है और वृद्धके असाध्य जानना चाहिये, यह धन्वन्तरिजीका मत है ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (५७)
डाक्टरीमतके अनुसार परीक्षा व कारण ।
आमसे मिला मल उतरे, दस्त होते समय गुदा शब्द करे ऐसे एक महीना
अथवा अधिक दिवस पर्यंत पीडा हो ॥ कारण-भारी द्रव्यके खानेसे अथवा देहके
दुर्बल होनेसे मनुष्यके संग्रहणीरोग होता है ॥
इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां
ग्रहणीरोगः समाप्तः ॥

अर्शोरोगनिदानम् ।
अतिसार ग्रहणी और अर्शका परस्पर सम्बन्ध है इससे ग्रहणीरोगके पीछे अर्शोरोग कहते हैं-
संख्या रूप सम्प्राप्ति ।
पृथग्दोषैः समस्तैश्च शोणितात् सहजानि च ।
अर्शांसि षट्प्रकाराणि विद्याद्गुदवलित्रये ॥ १ ॥
पृथक् पृथक् दोषोंसे ३, समस्त दोष मिलकर १, रुधिरसे १ और सहज १ ऐसे
छः प्रकारका अर्श ( बवासीर ) रोग है यह रोग गुदाकी तीन वलीके भीतर हो ।
गुदामें प्रवाहिणी विसर्जनी संवरणी यह तीन वली ( आँटे ) हैं ॥
सम्प्राप्तिपूर्वके अर्शका रूप ।
दोषास्त्वङ्मांसमेदांसि संदूष्य विविधाकृतीन् ।
मांसाङ्कुरानपानादौ कुर्वन्त्यर्शांसि तान् जगुः ॥ २ ॥
वातादि दोष त्वचा, मांस और मेदा इनको और उस ठिकानेके रुधिरको दूषित
कर अपान (गुदा) में अनेक प्रकारकी आकृतिके मांसके अंकुर उत्पन्न करे
अर्थात् मस्से प्रगट करे उसको बवासीर कहते हैं। आदिशब्दसे नाक, नेत्र, नाभिमें
भी जानना, यह मत सुश्रुतका है। कायचिकित्सक तो गुदामें जो होय उसे बवासीर
१ मनुष्यकी गुदामें तीन आंटे हैं एक ऊपर, एक नीचे क बीचमें। ऊपरके आंटेका नाम
प्रवाहिणी है सो मल पवन आदिको बाहर काढे, बीचका आंटा मल पवनको बाहर पटक
दे इसका नाम विसर्जनी है, तीसरा नीचेका आँटा मल पवन निकले पीछे ज्योंका त्यों
गुदाको करदे तिसका नाम संवरणी है॥ २ गुदा साढे चार अंगुलकी होती है और गुदाके
अवयवभूत तीन वली शंखके आवर्त समान प्रवाहिणी, विसर्जनी, संवरणीनामवाली ऊपर २
ही स्थित हैं। उसमें गुदाका ओष्ठ आधा अंगुलका होता है गुदोष्ठसे ऊपर प्रवाहिणी एक
अंगुलकी और विसर्जनी डेढ अंगुलकी और संवरणीभी डेढ अंगुलकी होती है, इसी प्रकारसे
गुदाका प्रमाण साढे चार अंगुलका होता है ।