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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( २४ ) माधवनिदान ।

( २४ ) माधवनिदान ।
प्रलापीसन्निपातसे ग्रसित मनुष्यके पसीना भ्रम सब शरीरमें दर्द कंप दाह वमन
कण्ठमें पीडा और शरीरमें भारीपन ये लक्षण होते हैं ॥
अन्तर्दाह ४ ।
अन्तर्दाहः शैत्यं बहिः श्वयथुररतिरपि तथा श्वासः ।
अङ्गमपि दग्धकल्पं सोऽन्तर्दाहार्दितः कथितः ॥ ४ ॥
भीतर दाह और बाहर शरीर ठंडा शरीरमें सूजन पीडा श्वास शरीरभी जले हुएके
सदृश ये लक्षण जिसमें हों उसको अन्तर्दाह सन्निपातसे पीडित कहा है ॥
दण्डपात ५ ।
नक्तं दिवा न निद्रामुपैति गृह्णाति मूढधीर्नभसः ।
उत्थाय दण्डपाते भ्रमातुरः सर्वतो भ्रमति ॥ ५ ॥
दण्डपात सन्निपातमें मनुष्य रात्रिमें और दिनमें कभी सोता नहीं है और बेव-
कूफ हुआ आकाशसे कोई चीज लेनेके लिये हाथ फैलाता है । भ्रमसे पीडित हुआ
उठकर सब जगह भ्रमता है ॥
अन्तक ६ ।
संपूर्यते शरीरं ग्रन्थिभिरभितस्तथोदरं मरुता ।
श्वासातुरस्य सततं विचेतनस्यान्तकार्तस्य ॥ ६ ॥
निरन्तर श्वासोंसे पीडित चेतणारहित अन्तक सन्निपातसे पीडित मनुष्यको शरीर
गांठोंसे भर जाता है और वायुसे उदर चारों तरफसे भरजाता है ॥
एणीदाह ७ ।
परिधावतीव गात्रे रुक्पात्रे भुजगपतंगहरिणगणः ।
वेपथुमतः सदाहस्यैणीदाहज्वरार्त्तस्य ॥ ७ ॥
कम्पयुक्त दाहयुक्त एणीदाह सन्निपातसे पीडित मनुष्यको अपने शरीरमें सर्प
पतंग मृगोंका समुदाय दौडताहुआ मालम होता है ॥
हारिद्र ८ ।
यस्यातिपीतमङ्गं नयने सुतरां मलं ततोऽप्यधिकम् ।
दाहोऽतिशीतता बहिरस्य स हारिद्रको ज्ञेयः ॥ ८ ॥
जिस पुरुषका शरीर अत्यन्त पीला और नेत्र भी पीले और विष्ठा मूत्र सबसे
भी अधिक पीले हों, भीतर दाह और बाहिरसे शरीर ठंडा हो तो उस पुरुषको हारिद्र-
सन्निपातसे पीडित जानना ॥

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( २६ )
अजघोष ९ ।
छगलकशरीरगन्धः स्कन्धरुजावान्निरुद्धगलरन्ध्रः ।
अजघोषसन्निपातादाताम्राक्षः पुमान्भवति ॥ ९ ॥
अजजोष सन्निपातसे बकरेकी गंधके समान शरीरमें गंध आती है, कन्धेमें पीडा
और गलेका छिद्र रुक जाता है लाल नेत्र हो जाते हैं इन लक्षणोंयुक्त पुरुष होता है ॥
भूतहास १० ।
शब्दादीनधिगच्छति न स्वान्विषयान् यदिन्द्रियग्रामैः ।
हसति प्रलपति परुषं स ज्ञेयो भूतहासार्त्तः ॥ १० ॥
जो इन्द्रियसमुदायसे अपने शब्दादि विषयोंको न समझता हो अर्थात् श्रोत्रे-
न्द्रियसे शब्द न सुनता हो, त्वगिन्द्रियसे स्पर्श न जानता हो इत्यादि, हँसता
होवे कठोर बडबडाता हो उसको भूतहासार्त सन्निपातसे पीडित जानना ॥
यंत्रापीड ११ ।
येन मुहुर्ज्वरवेगाद्यन्त्रेणेवावपीड्यते गात्रम् ।
रक्तं पीतं च वमेद्यन्त्रापीडः स विज्ञेयः ॥ ११ ॥
बारम्बार ज्वरके वेगसे यंत्रके सदृश जिसका शरीर पीडित किया जाय और
लाल पीला वमन करे उस मनुष्यको यन्त्रापीडसे पीडित जानना चाहिये ॥
संन्यास १२ ।
अतिसरति वमति कूजति गात्राण्यभिताश्चिरं नरः क्षिपति ।
संन्याससन्निपाते प्रलपति भुग्नाक्षिमण्डलो भवति ॥ १२ ॥
संन्याससन्निपातमें मनुष्यके दस्त होते हैं, वमन करता है, कुन २ शब्द . करता
है, चारों तरफ बहुत कालतक शरीरको फेंकता है, प्रलाप करता है और उस पुरु-
षकी आंखोंकी पुतली टेढी हो जाती है ॥
संशोषी १३ ।
मेचकवपुरतिमेचकलोचनयुगलो मलोत्सर्गात् ।
संशोषिणि सितपिटकामण्डलयुक्तो ज्वरो भवति ॥ १३ ॥
संशोषी सन्निपातमें मलके त्याग होनेसे काला शरीर और अत्यन्त काले दोनों
नेत्र हो जाते हैं और सफेद फुनसियोंके मण्डलसे युक्त पुरुष होता है ॥
इति कुम्भीपाकादीनां त्रयोदशानां लक्षणानि ।