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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( ११८ ) माधवनिदान ।

( ११८ ) माधवनिदान ।
रुधिरका यही स्वभाव है कि, जिसकी गन्धसे ही मनुष्य मूर्छित होता है । अब
स्वभावको और भी दृढ करते हैं-“ दृष्ट्वा यदभिमुह्यति ” अर्थात् रक्तके देखनेसे भी
मूर्च्छित होय सो लिखा भी है ॥
विष और मद्यसे उत्पन्न मूर्च्छाको कहते हैं—
गुणास्तीव्रतरत्वेन स्थितास्तु विषमद्ययोः ।
त एव तस्मादाभ्यां तु मोहौ स्यातां यथेरितौ ॥ १५ ॥
तैलादिकोंमें जो दश गुण हैं वे ही गुण विष और मद्यमें अत्यंत तीव्रतासे रहते
हैं । इसी विष और मद्यके सेवन करनेसे मोह होता है इसमें भी मद्यमें तीव्र रहै
और विषमें तीव्रतर रहै इसीसे विषको मोह स्वयं शांत नहीं होता, क्योंकि, विष
अपाकी है और मद्यका मोह मद्यके नशा उतरेपर शांत हो जाता है । यह भेद विष
और मद्यमें रहता है ॥
रक्तादि तीन मूर्च्छाओंके लक्षण ।
स्तब्धाङ्गदृष्टिस्त्वसृजा मूढोच्छ्वासश्च मूर्च्छितः ॥ १६ ॥
मद्येन विलपञ्छेते नष्टविभ्रान्तमानसः ।
गात्राणि विक्षिपन्भूमौ जरां यावन्न याति तत् ॥ १७ ॥
वेपथुस्वप्नतृष्णाः स्युस्तमश्च विषमूर्च्छिते ।
वेदितव्यं तीव्रतरं यथास्वं विषलक्षणैः ॥ १८ ॥
रुधिरकी मूर्च्छामें अंग और नेत्र निश्चल हो जायं और श्वास अच्छे प्रकार
आवे नहीं । बहुत मद्यके पीनेसे जो मूर्च्छा हो उसके ये लक्षण हैं । बहुत बकता
हुआ सोय जाय, संज्ञा जाती रहै, भ्रमयुक्त होय और जबतक मद्य न पचे तबतक
पृथ्वीमें हाथ पैर पटके । विषजन्य मूर्च्छामें कांपे, सोवे, प्यास लगे और अँधेरा
आवे, एवं विष वृक्षके मूल, पत्र, दूध इनके भेदकर जो विषभक्षणसे लक्षण होते हैं,
सो सब लक्षण होते हैं ॥
मूर्च्छा, भ्रम, तन्द्रा और निद्रा इनके भेद ।
मूर्च्छा पित्ततमःप्राया रजःपित्तानिलाद्भ्रमः³ ।
तमोवातकफात्तन्द्रा निद्रा श्लेष्मतमोभवा ॥ १९ ॥
१ यदुक्तं दृढबलेन—लघु रूक्षमाशु विशदं व्यवायि तीक्ष्णं विकाशि च । उष्णमनिर्देश्यरसं
दशगुणमुक्तं विषं तज्ज्ञैः ॥ इति । २ ये विषस्य गुणाः प्रोक्ताः सन्निपातप्रकोपिनः । त एव
मद्ये दृश्यन्ते विषे तु बलवत्तराः ॥ इति । ३ तत्र भ्रमः स्थाणौ पुरुषज्ञानं पुरुषे विपरीतसत्त्व-
ज्ञानादिकम् । अन्ये चक्रस्थितस्येव संभ्रमवस्तुदर्शनमिति ॥

भाषाटीकासमेत । ( ११९ )
मूर्च्छामें पित्त और तमोगुण अधिक रहे । रजोगुण पित्त और वायु इनसे भ्रम
होय है । तमोगुण, वायु और कफ इनसे तन्द्रा और कफ तथा तमोगुण इनसे निद्रा
उत्पन्न होती है ॥
तन्द्राके लक्षण ।
इन्द्रियार्थेष्वसंप्राप्तिर्गौरवं जृम्भणं क्लमः ।
निद्रार्त्तस्येव यस्यैते तस्य तन्द्रां विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥
इन्द्रियें अपने अपने विषयको ग्रहण न करें, देह भारी हो जाय अर्थात् सुस्त हो
जाय, जम्भाई और क्लम होय ये लक्षण निद्रार्त्त पुरुषके सदृश जिसके होयं उसको
तन्द्रा कहते हैं । इसमें आधे नेत्र खुले रहते हैं । निद्रामें इन्द्रिय और मनको मोह
होय है, तन्द्रामें केवल इंद्रियोंको ही मोह होता है । निद्रा और भ्रम ये दोनों अति-
प्रसिद्ध होनेसे माधवाचार्यने नहीं कहे, परन्तु चरकमें कहे हैं सो इस प्रकारकी-
जिस समय मन और इन्द्रिय खेदको प्राप्त होयं और अपने अपने विषय ( शब्द,
स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ) को त्याग देयं, तब यह मनुष्यको निद्रा आती है ॥
संन्यासके भेदको कहते हैं-
दोषेषु मदमूर्च्छाद्या गतवेगेषु देहिनाम् ।
स्वयमेवोपशाम्यन्ति संन्यासो नौषधैर्विना ॥ २१ ॥
दोषोंके वेग होनेसे मदमूर्च्छादि अपने आप शान्त हो जाते हैं परन्तु यह संन्यास
औषधके बिना शान्त नहीं होता है ॥
संन्यासके लक्षण ।
वाग्देहमनसां चेष्टा आक्षिप्यातिबला मलाः ।
संन्यस्यन्त्यबलं जन्तुं प्राणायतनमाश्रिताः ॥ २२ ॥
स ना संन्याससंन्यस्तः काष्ठीभूतो मृतोपमः ।
प्राणैर्विमुच्यते शीघ्रं मुक्त्वा सद्यःफलां क्रियाम् ॥ २३ ॥
अत्यन्त बलिष्ठ भये जो दोष सो वाणी देह और मन इनके व्यापारको बन्दकर
हृदयमें प्राप्त हो निर्बलमनुष्यको मूर्च्छा करे वह संन्याससे पीडित मनुष्य काष्ठकी
भांति पृथ्वीपर गिरे, उसकी सद्यःफल चिकित्सा अर्थात् सुईसे छेदना, तीखा
१ यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः । विषयेभ्योनिर्वर्त्तन्ते तदा स्वपिति मानवः॥
२ चक्रवद्‌भ्रमतो गात्रं भूमौ पतति सर्वदा । भ्रमरोग इति ज्ञेयो रजःपित्तानिलात्मकः ॥