माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २७८ ) . माधवनिदान ।
( २७८ ) . माधवनिदान ।
विवृतापिडिकाके लक्षण ।
विवृतास्यां महादाहां पक्वोदुम्बरसन्निभाम् ।
परिमंडलां पित्तकृतां विवृतां नाम तां विदुः ॥ ४ ॥
पित्तके योगसे फटे मुखकी, अत्यन्त दाहयुक्त, पके गूलरके समान, चारों ओर
वल पडी हुई जो पिडिका होय उसको विवृता कहते हैं ॥
कच्छपिकाके लक्षण ।
ग्रथिता पञ्च वा षड् वा दारुणाः कच्छपोन्नताः ।
कफानिलाभ्यां पिडिका ज्ञेया कच्छपिका बुधैः ॥ ५ ॥
कफ वायुसे प्रगट गांठ बन्धी, पांच अथवा छः, कठिन कछुओके पीठके समान
ऊंची जो पिडिका होयँ उनको कच्छपिका कहते हैं ॥
वल्मीकपिडिकाके लक्षण ।
ग्रीवांसकक्षकरपाददेशे संधौ गले वा त्रिभिरेव दोषैः ।
ग्रन्थिः सवल्मीकवदक्रियाणां जातः क्रमेणैव गतः प्रवृद्धिम् ॥ ६ ॥
मुखैरनेकैः स्रुतितोदवद्भिर्विसर्पवत्स्र्पति चोन्नताग्रैः ।
वल्मीकमाहुर्भिषजो विकारं निष्प्रत्यनीकं चिरजं विशेषात् ॥७॥
नाड, कन्धा, कूंख, हाथ, पैर, सन्धि, गला इन ठिकाने तीनों दोषोंसे सर्पकी
बांबीके समान गांठ होय, उसका उपाय न करे तब वह धीरे धीरे बढे, उसमें
अनेक मुख हो जायँ, उसमेंसे स्राव होय, नोचनेकीसी पीडा होय तथा वह मुखक
ऊपर कुछ ऊंची होकर विसर्पके समान फैल जाय, इस रोगको वैद्य वल्मीक
कहते हैं । इसके ऊपर औषध उपचार नहीं चले और पुराने होनेसे विशेष
असाध्य जाननी ॥
इन्द्रवृद्धाके लक्षण ।
पद्मकर्णिकवन्मध्ये पिडिकाभिः समाचिताम् ।
इन्द्रवृद्धां तु तां विद्याद्वातपित्तोत्थितां भिषक् ॥ ८ ॥
कमलकार्णिकाके समान बीचमें एक पिडिका होय, उसके चारोंओर छोटी छोटी
फुन्सी होयँ, उसको इन्द्रवृद्धा कहते हैं, यह वात पित्तसे उत्पन्न होय है ॥
गर्दभिकाके लक्षण ।
मंडलं वृत्तमुत्सन्नं सरक्तं पिडिकाचितम् ।
रुजाकरीं गर्दभिकां तां विद्याद्वातपित्तजाम् ॥ ९ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २७९ )
वातपित्तसे प्रगट एक गोल ऊंचा तथा लाल और फोडोंसे व्याप्त ऐसा मंडल
होय वह बहुत दूखे उसको गर्दभिका कहते हैं ॥
पाषाणगर्दभके लक्षण ।
वातश्लेष्मसमुद्भूतः श्वयथुर्हनुसंधिजः ।
स्थिरो मन्दरुजः स्निग्धो ज्ञेयः पाषाणगर्दभः ॥ १० ॥
वातकफसे ठोडीकी सन्धिमें कठिन, मन्द पीडा करनेवाली चिकनी ऐसा सूजन
होथ उसको पाषाणगर्दभ कहते हैं ॥
पनसिके लक्षण ।
कर्णस्याभ्यन्तरे जातां पिडिकामग्रवेदनाम् ।
स्थिरां पनसिकां तां तु विद्याद्वातकफोत्थिताम् ॥ ११ ॥
कानके भीतर वात पित्त कफसे जो फुन्सी उग्रवेदना सहित प्रगट होय और
वह स्थिर होय, उसको पैनसिका कहते हैं ॥
जालगर्दभके लक्षण ।
विसर्पवत्सर्पति यः शोथस्तनुरपाकवान् ।
दाहज्वरकरः पित्तोत्स ज्ञेयो जालगर्दभः ॥ १२ ॥
पित्तसे विसर्पके समान इधर उधरको फैलनेवाली पतली तथा कुछ पकनेवाली
ऐसी सूजन होय, उसमें दाह होय और ज्वर होय, इसको जालगर्दभ कहते हैं, कोई
आचार्य कहते हैं कि, इसमें पकना नहीं होय ॥
इरिबेल्लिकाके लक्षण ।
पिडिकामुत्तमांगस्थां वृत्तामुग्ररुजाज्वराम् ।
सर्वात्मिकां सर्वलिंगां जानीयादिरिवेल्लिकां ॥ १३ ॥
त्रिदोषसे प्रगट मस्तकमें गोल अत्यन्त पीडा और ज्वर करनेवाली त्रिदोषके
लक्षण संयुक्त ऐसी पिडिका होय उसको इरिबेल्लिका कहते हैं ॥
कक्षा (कखलाई) के लक्षण ।
बाहुकक्षांसपार्श्वे तु कृष्णस्फोटां सवेदनाम् ।
पित्तकोपसमुद्भूतां कक्षामित्यभिनिर्दिशेत् ॥ १४ ॥
१ कफवातौ प्रकुपितौ मांसमाश्रित्य कर्णयोः । समन्ततः परिस्तब्धां कुरुतः पिडिकां
स्थिराम् ॥ विषमां दाहसंयुक्तां विद्यात्पनसिकां तु ताम् ॥ २ पित्तोत्कटास्त्रयो दोषा जन-
यंति त्वगाश्रिताः । श्यावं रक्तं तनुं शोथमपाकं बहुवेदनम् ॥ विसर्पिणं सदाहं च तृष्णाज्वर-
समन्वितम् । विसर्पमाहुस्तं व्याधिमपरे जालगर्दभम् ॥