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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 404 में से

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पृष्ठ 198

( १८० ) माधवनिदान ।
वातिक मूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
तीव्रार्तिरुग्वंक्षणबस्तिमेढ्रे स्वल्पं मुहुर्मूत्रयतीह वातात् ।
वातके मूत्रकृच्छ्रसे वंक्षण ( जंघा और ऊरु इनकी सन्धि ), मूत्राशय और इंद्रिय
इनमें पीडा और मूत्र बारम्बार थोडा २ उतरे ॥
पैत्तिकमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
पीतं सरक्तं सरुजं सदाहं कृच्छ्रं मुहुर्मूत्रयतीह पित्तात् ॥ ३ ॥
पैत्तिकमें पीला, कुछ लाल, पीडायुक्त, जलनके साथ बारम्बार कष्टसे मूत्र उतरे ॥
कफमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
बस्तेः सलिङ्गस्य गुरुत्वशोथौ मूत्रं सपिच्छं कफमूत्रकृच्छ्रे ।
कफके मूत्रकृच्छ्रमें लिंग और मूत्राशय भारी हो, सूजन और मूत्र चिकना होय ॥
सन्निपातमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
सर्वाणि रूपाणि तु सन्निपाताद्भवन्ति तत्कृच्छ्रतमं हि कृच्छ्रम् ॥ ४ ॥
सन्निपातके मूत्रकृच्छ्रमें सर्व लक्षण होते हैं। यह मूत्रकृच्छ्र कष्टसाध्य है ॥
शल्यजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
मूत्रवाहिषु शल्येन क्षतेष्वभिहतेषु च ।
मूत्रकृच्छ्रं तदाघाताज्जायते भृशदारुणम् ॥
वातकृच्छ्रेण तुल्यानि तस्य लिङ्गानि लक्षयेत् ॥ ५ ॥
मूत्र बहानेवाले स्रोत (मार्ग) शल्य (तीर आदि) से बिंधजायँ अथवा पीडित होयँ
तो उस घातसे भयंकर मूत्रकृच्छ्र होय है, इसके लक्षण वातमूत्रकृच्छ्रके समान होयँ ॥
मलके मूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
शकृतस्तु प्रतीघाताद्वायुर्विगुणतां गतः ।
आध्मानं वातसङ्गं च मूत्रसङ्गं करोति च ॥ ६ ॥
मल ( विष्ठा ) के अवरोध होनेसे वायु विगुण ( उलटा ) होकर अफरा वात-
शूल और मूत्रनाश करे तब मूत्रकृच्छ्र प्रगट होय ॥
अश्मरीजन्य मूत्रकृच्छ्र ।
अश्मरीहेतु तत्पूर्वं मूत्रकृच्छ्रमुदाहरेत् ॥ ७ ॥
पथरीके योगसे जो मूत्रकृच्छ्र होय उसको पथरीका मूत्रकृच्छ्र कहते हैं ॥
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