माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९४ ) माधवनिदान ।
( १९४ ) माधवनिदान ।
मधुमेहशब्दकी प्रवृत्ति विषय निमित्त ।
मधुरं यच्च मेहेषु प्रायो मध्विव मेहति ।
सर्वेऽपि मधुमेहाख्या माधुर्याच्च तनोरतः ॥ २६ ॥
प्रमेहोंमें रोगी प्रायशः मधु ( शहद ) के समान मीठा मूते और सब शरीरको
मीठा करदे इसीसे सर्व प्रमेहको मधुमेह संज्ञा दीनी है और अमृतसागरमें जो छः
प्रमेह आत्रेयके मतसे लिखे हैं वे प्रमाणरहित हैं और प्रसिद्धमें भी प्रमेह बीस प्रका-
रके हैं इसीसे हमने छोडदीने हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां
प्रमेहनिदानं समाप्तम् ॥
अथ प्रमेहपिडिकानिदानम् ।
शराविका कच्छपिका जालनी विनताऽलजी । मसूरिका
सर्षपिका पुत्रिणी सविदारिका ॥ १ ॥ विद्रधिश्चेति पिडिकाः
प्रमेहोपेक्षया दश । सन्धिमर्मसु जायन्ते मांसलेषु च धामसु ॥२॥
प्रमेहकी उपेक्षा करनेसे शराविकादि दश पिडिका सन्धि मर्म और मांसल
ठिकानोंमें होती हैं ॥
सबके लक्षण ।
अन्तोन्नता च तद्रूपा निम्नमध्या शराविका । सदाहा कूर्मसं-
स्थाना ज्ञेया कच्छपिका बुधैः ॥ ३ ॥ जालनी तीव्रदाहा तु
मांसजालसमावृता । अवगाढरुजोत्क्लेदा पृष्ठे वाप्युदरेऽपि वा
॥ ४ ॥ महती पिडिका नीला सा बुधैर्विनता स्मृता । रक्ता
सिता स्फोटवती दारुणा त्वलजी भवेत् ॥ ५ ॥ मसूरदल-
संस्थाना विज्ञेया तु मसूरिका । गौरसर्षपसंस्थाना तत्प्रमाणा
च सर्षपी ॥६॥ महत्यल्पचिता ज्ञेया पिडिका चापि पुत्रिणी ।
विदारीकन्दवद्वृत्ता कठिना च विदारिका ॥ विद्रधेर्लक्षणैर्युक्ता
ज्ञेया विद्रधिका तु सा ॥ ७ ॥
१ शराविका-यही पिटिका ऊपरके भागमें ऊंची और मध्यमें बैठीसी होय
जैसा मिट्टीका शराव होय है ऐसी होय है । २ कच्छपिका-ये कछुएके पीठके समान
भाषाटीकासमेत । ( १९५ )
कुछ दाहयुक्त ऐसी होय है । ३ जालनी-ये तीव्र दाहकरके संयुक्त और मांसके
जालसे व्याप्त होय है । ४ विनता-ये फुन्सी पीठमें अथवा पेटमें होय है इसकी
पीडा बहुत होय, ठंडी होय तथा बडी और नीले रंगकी होय है । ५ अलजी-लाल
काली बारीक फोडोंकरके व्याप्त भयंकर होय है। ६ मसूरिका-मसूरकी दालके
समान बडी होय है। ७ सर्षपिका-सफेद सरसोंके समान बडी होय है। ८ पुत्रिणी-ये
बीचमें एक बडी फुन्सी होय उसके चारों ओर छोटी २ फुन्सी और होय उसको
पुत्रिणी कहते हैं । ९ विदारिका-यह विदारीकंदके समान गोल और करडी होय
है । १० विद्रधिका-यह विद्रधिके लक्षण करके युक्त होय है । भोज और सुश्रुतके
मतसे नौ पिडिका हैं और चरकके मतसे सात ही हैं ॥
पिटिकाकी उत्पत्ति ।
ये यन्मयाः स्मृता मेहास्तेषामेतास्तु तन्मयाः ॥ ८ ॥
विना प्रमेहमप्येता जायन्ते दुष्टमेदसः ।
तावच्चैता न लक्ष्यन्ते यावद्वास्तुपरिग्रहः ॥ ९ ॥
जो प्रमेह जिस दोषकरके उल्बण होय है तिसकरके तिसी दोषके उल्बणकरके
पिटिका होती है। ये पिटिका प्रमेहके विना दुष्ट मेदके होनेसे भी प्रगट होती है। जब-
तक इनकी गांठ नहीं बन्धे तबतक नहीं दीखें । 'ये यन्मयाः स्मृता मेहाः' इस पदके
ऊपर मधुकोशवालेने शास्त्रार्थ लिखा है, ग्रन्थ बढनेके भयसे हमने नहीं लिखा ॥
असाध्यपिटिकाके लक्षण ।
गुदे हृदि शिरस्यंसे पृष्ठे मर्मसु चोत्थिताः ।
सोपद्रवा दुर्बलाग्नेः पिडिकाः परिवर्जयेत् ॥ १० ॥
गुदामें हृदयमें शिरमें कन्धेमें पीठमें और मर्मस्थानमें उठी पिटिका और उप-
द्रवयुक्त हो तथा दुर्बलाग्नि पुरुषकी पिटिका त्याज्य है । पिटिकाके उपद्रव चरकने
कहे हैं सो इस प्रकार-"तृट्कासमांससंकोचमोहहिक्कामदज्वराः । विसर्पमर्मसंरोधाः
पिटिकानामुपद्रवाः ॥" इसका अर्थ सुगम है इसीसे नहीं लिखा । शंका-क्यों
जी ! स्त्रियोंको प्रमेह क्यों नहीं होय ? उत्तर-इसका कारण और ग्रन्थोंमें इस प्रकार
लिखा है-" रजःप्रसेकान्नारीणां मासि मासि विशुध्यति । कृत्स्नं शरीरं दोषाश्च न
प्रमेहन्त्यत स्त्रियः ॥ " स्त्रियोंके महीनेके महीने रज बहा करै है इसीसे सर्व देह और
दोष शुद्ध होते हैं इसीसे स्त्रियोंको प्रमेह होना कहीं नहीं देखा, यह भी एक बलवान्
कारण है और सोमादिक रोग होते हैं। कदाचित कोई कहे कि और रोगका होना
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