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सर्वकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 404 में से

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पृष्ठ 199

भाषाटीकासमेत । ( १८१ )
शुक्रजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ।
शुक्रे दोषैरुपहते मूत्रमार्गे विधारिते ।
सशुक्रं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्वस्तिमेहनशूलवान् ॥ ८ ॥
दोषोंके योगसे शुक्र ( वीर्य ) दुष्ट होकर मूत्रमार्गमें गमन करे, तब उस
मनुष्यके मूत्राशय और लिङ्ग इनमें शूल होय और मूतते समय मूत्रके सङ्ग वीर्य
पतन होय ॥
अश्मरी और शर्करा इनके साम्य और अवान्तरभेद ।
अश्मरी शर्करा चैव तुल्यसम्भवलक्षणे । विशेषणं शर्करायाः
शृणु कीर्त्तयतो मम ॥ ९ ॥ पच्यमानाऽश्मरी पित्ताच्छोष्यमाणा
च वायुना । विमुक्तकफसन्धाना क्षरन्ती शर्करा मता ॥ १० ॥
हृत्पीडा वेपथुः शूलं कुक्षावग्निश्च दुर्बलः। तया भवति मूर्च्छा च
मूत्रकृच्छ्रं च दारुणम् ॥ ११ ॥
अश्मरी ( पथरी ) और शर्करा इन दोनोंकी संप्राप्ति और लक्षण समान हैं परन्तु
इनमें थोडासा भेद है उसको कहता हूं सुनो, पित्तसे पकनेवाली और वायुसे शुष्क
होनेवाली ऐसी पथरी कफसंबन्धी न होय, तब मूत्रके मार्गसे रेतके समान झरने
लगे, उसको शर्करा कहते हैं । उस शर्करायोगसे हृदयमें पीडा, कम्प, कूखमें
शूल, मन्दाग्नि, मूर्च्छा और भयंकर मूत्रकृच्छ्र ये रोग होयें ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां
मूत्रकृच्छ्रनिदानं समाप्तम् ॥
अथ मूत्राघातनिदानम् ।
जायन्ते कुपितैर्दोषैर्मूत्राघातास्त्रयोदश ।
प्रायो मूत्रविघाताद्यैर्वातकुण्डलिकादयः ॥ १ ॥
मूत्रके वेग रोकनेसे ( आदिशब्दसे मल शुक्रादि वेग रोकना और रूक्ष
भोजन आदि जानना ) कुपित भये दोषोंसे वातकुण्डलिकादि तेरह प्रकारके मूत्रा-
घातरोगको करे ॥
वातकुण्डलिकाके लक्षण ।
रौक्ष्याद्वेगविघाताद्वा वायुर्बस्तौ सवेदनः ।