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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( ३२ ) माधवनिदान ।

( ३२ ) माधवनिदान ।
जबसे त्रिदोष प्रगट हो उस दिनसे लेकर ७ किंवा १४ और ९ किंवा १८ तथा
११ किंवा २२ दिनतक त्रिदोषज्वरोंकी मर्यादा है इस अवधिमें ज्वर जाता रहे अथवा,
मृत्यु होय । सात नौ और ग्यारह दिनमें मर्यादा वाताधिक पित्ताधिक और कफा-
धिक सन्निपातोंकी क्रमसे जाननी । पित्त, कफ और वात इनकी वृद्धि क्रम करकेँ
दस दिनकी बारह दिनकी और सात दिनकी है, इसमें त्रिदोषज्वर धातुपाक होनेसे
मार डाले और मलपाक होनेसे रोगी रोगमुक्त होजाय ॥
धातुपाकलक्षण ।
निद्राबलौजोरुचिवीर्यनाशो हृद्वेदना गौरवताल्पचेष्टा ।
विष्टंभता यस्य किलारतिः स्यात्स धातुपाकी मुनिभिः प्रदिष्टः॥१९
निद्रा बल तेज रुचि वीर्य इनका नाश, हृदयमें पीडा, देह भारी, हीनचेष्टा,
अफरा, मनका न लगना ये लक्षण जिसके हों उसको धातुपाकी मुनीश्वरोंने कहा है।
धातुपाक कहिये उत्तरोत्तर रोगकी वृद्धि और बलकी हानि होकर शुक्रादि धातुसहित
मूत्रादिकोंका जो पाक होय उसे धातुपाक कहते हैं ॥
मलपाकलक्षण ।
दोषप्रकृतिवत्कृत्य लघुता ज्वरदेहयोः ।
इन्द्रियाणां च वैमल्यं दोषाणां पाकलक्षणम् ॥ २० ॥
दोषोंका स्वभाव पलटजाय, ज्वरका हलका होना, देह हलकी हो, इन्द्रियोंका
निर्मल होना ये मलपाकके लक्षण जानने । धातुपाक और मलपाक होना केवल
ईश्वरपर है, इसमें दूसरा कोई हेतु नहीं है ॥
आगंतुकज्वर ।
अभिघाताभिचाराभ्यामभिषङ्गाभिशापतः ।
आगन्तुर्जायते दोषैर्यथास्वं तं विभावयेत् ॥ २१ ॥
तलवार छुरा मुक्का लकडी इत्यादि शस्त्र आदिके लगनेसे प्रगट ज्वरको अभि-
घातज कहते हैं और विपरीत मंत्रके जपनेसे लोहके छुवासे मारणार्थ सर्षपादिक
होम अथवा कृत्याका प्रयोग करनेसे उत्पन्न ज्वरको अभिषंगज कहते हैं, काम शोक
भय क्रोध भूतादिकोंके आवेशसे उत्पन्न ज्वरको अभिशापज कहते हैं ब्राह्मण गुरु
वृद्ध सिद्ध इनके शाप देनेसे प्रगट ज्वरको अभिशापज कहते हैं. ये चार प्रकारसें
आङ्गंतुकज्वर उत्पन्न होय हैं। इस ज्वरके आरम्भसे पूर्व कोई दोषका प्रकाश नहीं
हो पीछे जैसे दोष कुपित होवें तिनको उन्हीं २ दोषोंके लक्षण करके जाने, जैसें
“कामशोकभयाद्वायुः” अर्थात् काम शोक भयसे वात कुपित होती है ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ३३ )
विषजन्य आगंतुकज्वर ।
श्यावास्यता विषकृते दाहोऽतीसार एव च ।
भक्तारुचिः पिपासा च तोदश्च सह मूर्च्छया ॥ २२ ॥
अब आगंतुकज्वरोंके हेतुभेद करके लक्षण कहते हैं—स्थावर जङ्गम विष भक्षण
करनेसे जो ज्वर होय उससे मुख श्यामवर्ण और दाह तथा दस्तोंका होना, अन्नमें
अरुचि, प्यास, सुई चुभनेकीसी पीडा और मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं ॥
औषधगन्धजनित ज्वर ।
औषधीगन्धजे मूर्च्छा शिरोरुग्वमथुः क्षवः ।
तीक्ष्ण औषधके सूंघनेसे जो ज्वर होय उसमें मूर्च्छा, शिरमें पीडा, वमन, छींक
ये लक्षण होते हैं ॥
कामज्वरके लक्षण ।
कामजे चित्तविभ्रंशस्तन्द्रालऽस्यमभोजनम् ॥ २३ ॥
हृदये वेदना चास्य गात्रं च परिशुष्यति ।
सुन्दर स्त्रीके देखनेसे मनुष्यके मनमें घोर कामबाधाकी उत्पत्ति हो, उससे
प्रगट ज्वरके ये लक्षण हैं—चित्तकी अस्थिरता, तन्द्रा, आलस्य, भोजनमें अरुचि,
हृदयमें पीडा और शरीर सूख जावे ॥
भय शोक और कोपज्वरके लक्षण ।
भयात्प्रलापः शोकाच्च भवेत्कोपाच्च वेपथुः ॥ २४ ॥
भयसे और शोकसे उत्पन्न ज्वरमें अनर्थ बके, कोपसे प्रगट ज्वरमें कम्प हो ॥
अभिचार और अभिघातज्वरके लक्षण ।
अभिचाराभिघाताभ्यां मोहस्तृष्णा च जायते ।
अभिचार और अभिघातसे प्रगट ज्वरमें मोह और तृष्णा होवे ॥
भूताभिषंगज्वरके लक्षण ।
भूताभिषङ्गादुद्वेगो हास्यरोदनकम्पनम् ॥ २५ ॥
भूतबाधासे उत्पन्न ज्वरसे चित्तमें उद्वेग हो, हँसे रोवे और कम्प ये लक्षण होते हैं ॥
कामशोकभयाद्वायुः क्रोधात्पित्तं त्रयो मलाः ।
भूताभिषङ्गात्कुप्यन्ति भूतसामान्यलक्षणाः ॥ २६ ॥
काम शोक और भय इनसे वातकुपित होता है, क्रोधसे पित्त कुपित होता है और
भूताभिषंगसे तीनों दोष कुपित होते हैं इनमें और भी लक्षण होते हैं अर्थात् उन्माद,
निदानमें जिस जिस देवग्रहोंके लक्षण हास्य रोदन कम्पादिक कहे हैं वे लक्षण होतेहैं ॥
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