माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २२४) माधवनिदान ।
( २२४) माधवनिदान ।
रक्तजविद्रधिके लक्षण ।
कृष्णस्फोटावृतः श्यावस्तीव्रदाहरुजाकरः ।
पित्तविद्रधिलिङ्गस्तु रक्तविद्रधिरुच्यते ॥ १० ॥
काले फोडोंसे व्याप्त, श्यामवर्ण, पीडा और ज्वर ये उसमें तीव्र होयँ तथा
पित्तकी विद्रधिके लक्षणों करके युक्त होंय, उसको रक्तविद्रधि जानना ॥
अन्तर्विद्रधिके लक्षण ।
पृथक् संभूय वा दोषाः कुपिता गुल्मरूपिणम् ।
वल्मीकवत्समुन्नद्धमंतः कुर्वन्ति विद्रधिम् ॥ ११ ॥
कुपित भये पृथक् २ अथवा मिलेहुये दोष शरीरमें गोलेके और बांबीके समान
बडी विद्रधि उत्पन्न करे हैं ॥
विद्रधिके स्थान ।
गुदे बस्तिमुखे नाभ्यां कुक्षौ वंक्षणयोस्तथा ।
वृक्कयोः प्लीह्नि यकृति हृदये क्लोम्नि चाप्यथ ॥ १२ ॥
एषामुक्तानि लिङ्गानि बाह्यविद्रधिलक्षणैः ।
गुदे वातनिरोधस्तु बस्तौ कृच्छ्राल्पमूत्रता ॥ १३ ॥
नाभ्यां हिक्का तथाऽऽटोपः कुक्षौ मारुतकोपनम् ।
कटिपृष्ठग्रहस्तीव्रो वंक्षणोत्थे च विद्रधौ ॥ १४ ॥
वृक्कयोः पार्श्वसंकोचः प्लीह्रयुच्छ्वासावरोधनम् ।
सर्वाङ्गप्रग्रहस्तीव्रो हृदि कम्पश्च जायते ।
श्वासो यकृति हिक्का च क्लोम्नि पेपीयते पयः॥ १५ ॥
गुद, बस्ति, मुख, नाभि, कूख, वंक्षण, वृक्क, (कूख पिंडी प्लीह) यकृत् (कलेजा),
हृदय, क्लोम (प्यासका स्थान ) इन ठिकानोंपर विद्रधि होती है, इनके लक्षण
बाह्यविद्रधिके समान जानने । गुदामें विद्रधि होनेसे अधोवायुका रोध होय । वस्तिमें-
अर्थात् मूत्राशयमें होनेसे कठिनतासे थोडा २ मूते, नाभिमें होनेसे हिचकी तथा
गुडगुड शब्द होता है । कूखमें-होनेसे पवनका कोप होय । वंक्षणमें-होनेसे कमर
और पीठका बलपूर्वक जकड जाना होय । कूखके पिंडमें होनेसे पसवाडोंका संकोच
होय । प्लीहामें होनेसे श्वास रुकजाय । हृदयमें-होनेसे सब अंग जकडजाय और
कम्प होय । कलेजेमें होनेसे श्वास और हिचकी होय । क्लोममें-अर्थात् पिपासा-
स्थानमें विद्रधि होनेसे बारंबार पानी पीनेकी इच्छा होय है ॥
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भाषाटीकासमेत । (२२५)
स्रावनिर्गम ।
नाभेरुपरिजाः पक्वा यान्त्यूर्ध्वमितरे त्वधः ।
अधः स्रुतेषु जीवेत्तु स्रुतेषूर्ध्वं न जीवति ॥ १६ ॥
नाभिके ऊपर जो विद्रधि होय उनके पकनेसे जो स्राव कहिये राध आदिका
बहना होय वह मुखके रास्ते होय है और नाभिके नीचे होनेसे जो स्राव होय वह
गुदाके मार्गसे होय है और नाभिके समीप होनेवाली विद्रधियोंका स्राव दोनों मार्गोंसे
होय । जिनका स्राव नीचेके मार्ग हो वह रोगी जीवे और ऊपरके मार्ग जिसका
स्राव होय वह रोगी बचे नहीं ॥
विद्रधिमें साध्यासाध्य ।
हृन्नाभिवस्तिवर्ज्या ये तेषु भिन्नेषु बाह्यतः ।
जीवेत्कदाचित्पुरुषो नेतरेषु कथंचन ॥ १७ ॥
साध्या विद्रधयः पञ्च विवर्ज्यः सान्निपातिकः ।
आमपक्वविदग्धत्वं तेषां शोथवदादिशेत् ॥ १८ ॥
हृदय, नाभि और वस्ति इन ठिकानोंको छोडकर प्रगट जो विद्रधि अर्थात्
प्लीहा क्लोम इत्यादि ठिकाने बाहर फूटनेसे कदाचित् पुरुष बचजाय और ठिका-
नेपर फूटनेसे नहीं बचे । पहली पांच विद्रधि साध्य हैं, सन्निपातकी विद्रधि असाध्य
है, इन विद्रधियोंको आम, पक्व और विदग्ध ये तीन अवस्था शोथरोगके समान
जाननी चाहिये ॥
असाध्य लक्षण ।
आध्मातं बद्धनिष्यन्दं छर्दिहिक्कातृषान्वितम् ।
रुजाश्वाससमायुक्तं विद्रधिर्नाशयेन्नरम् ॥ १९॥
अफरायुक्त, मूत्र रुकगया होय, हिचकी, वमन और प्यास इनसे पीडित शूल,
श्वास इन करके युक्त ऐसे मनुष्यके विद्रधिरोग असाध्य होय है ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
विद्रधिनिदानं समाप्तम् ॥
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