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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( ३७० ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।

( ३७० ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
नारीणामनभिज्ञत्वात्पंचकर्मापचारतः ॥ ७ ॥ बीजोपघातो
भवति पाण्डुवर्णः सुदुर्बलः । अल्पप्रजोऽल्पहर्षश्च प्रमदासु
भवेन्नरः॥ ८॥ हृत्पांडुरोगतमककामलाश्रमपीडितः । बीजो-
पघातजं क्लीब्यं ध्वजभंगकृतं शृणु ॥ ९ ॥
प्रथम जो कहे वे नपुंसकके सामान्य लक्षण हैं, अब उनको विस्तारसे कहता
हूं-शीतल, रूक्ष, थोडा खटाई मिलाहुआ तथा विषम असात्म्य ( अहितकारी )
अन्न इत्यादि पदार्थोंके भोजन करनेसे, आदिशब्दसे खट्टा, चरपरा, कसैला पदार्थ
खानेसे, शोक ( सोच ), चिन्ता, भय और त्रास तथा अत्यन्त स्त्रीरमण करनेसे,
किसी शत्रु‌का अभिचार ( जादू टोना ) से तथा किसीका विश्वास न करनेसे रसादि
धातुओंके क्षीण होनेसे, वातादि दोषोंके बढनेसे, उसी प्रकार विरुद्ध ( क्षीर
मत्स्यादि ) भोजन, उपवास ( व्रतादि ) और श्रम करनेसे स्त्रीसुखके न जाननेसे,
पञ्चकर्म ( वमन विरेचनादि ) के अपचारसे, बीजोपघात अर्थात् बीजमें किसी
प्रकारका विकार होता है उसके होनेसे, बीजका वर्ण पीला होता है तथा देह दुर्बल
होजाय, उस पुरुषके सन्तान थोडी हो तथा स्त्रीगमनमें इच्छा न होना, हृदयरोग
और पांडुरोग होय, तमक श्वास कामला अनायास श्रम इनसे पीडित होय ये लक्षण
बीजोपघात क्लीबके हैं ॥
ध्वजभंगक्लीबकी उत्पत्ति ।
अत्यम्ललवणक्षारविरुद्धाजीर्णभोजनात् । अत्यम्बुपानाद्वि-
षमपिष्टान्नगुरुभोजनात् ॥ १० ॥ दधिक्षीरानूपमांससेवना-
दतिकर्शनात् । कन्यानां चैव गमनादयोनिगमनादपि ॥ ११ ॥
दीर्घरोग्रीं चिरोत्सृष्टां तथैव च रजस्वलाम् । दुर्गन्धां दुष्ट-
योनिं च तथैव च परिश्रुताम् ॥ १२ ॥ नरस्य प्रमदां मोहा-
दतिहर्षात्प्रगच्छतः । चतुष्पदाभिगमनाच्छेफसश्चाभिघा-
ततः ॥ १३ ॥ अधावनाद्वा मेद्रस्य शस्त्रदंतनखक्षतात् ।
काष्ठप्रहारनिश्शेषशूकानां चातिसेवनात् ॥ रेतसश्च प्रती-
घाताद्ध्वजभङ्गः प्रवर्त्तते ॥ १४ ॥
अत्यन्त खट्टा, नोनका खार, विरुद्ध ( क्षीरमत्स्यादि ), अपक्क अन्न भोजन कर-
नेसे तथा बहुत जल पीनेसे, विषमान्न और भारी ऐसे पदार्थोंके खानेसे, दही, दूध,
जलसमीप रहनेवाले पक्षीका मांस खानेसे, व्याधिकरके कृश होनेसे, कन्याके
साथ गमन करनेसे, जिसके योनि नहीं ऐसी स्त्रीके साथ गमन करनेसे अथवा

भाषाटीकासमेत । ( ३७१ )
अयोनिकहिये गुदाभंजन करनेसे तथा जिसकी योनिपर बडे बाल हों और जिस
स्त्रीने बहुत दिनोंसे मैथुन करना छोड़दिया हो तथा रजस्वला और जिसकी योनिमें
दुर्गंधि आती हो तथा दुष्टयोनि और जिसकी सोमादिरोगोंसे योनि चुचाती हो ऐसी
स्त्रियोंसे मैथुन करनेसे तथा उन्मत्त होकर गमन करनेसे और अतिहर्षसे गमन
करनेसे तथा चतुष्पाद ( बकरी कुतिया आदि ) से गमन करनेसे तथा लिंगमें
किसी प्रकारकी चोट लगनेसे तथा लिंगके न धोनेसे तथा शस्त्र, दांत, नख इन
करके घाव होनेसे, लकडी आदिकी चोट लगनेसे, लिंगके पिसजानेसे तथा लिंगके
मोटे करनेके निमित्त शूकादि प्रयोग करनेसे अर्थात् इनका अत्यन्त सेवन करनेसे
तथा वीर्यके बिगडनेसे मनुष्यके ध्वजभंग अर्थात् लिंग खडा होकर तुरंत मुरझाय
यह रोग होता है ॥ इसके लक्षण आगे कहते हैं—
ध्वजभंगके लक्षण ।
श्वयथुर्वेदना मेढ्रे रागश्चैवोपलक्ष्यते ॥ १५ ॥ स्फोटाश्च तीव्रा
जायन्ते लिङ्गपाको भवत्यपि ॥ मांसवृद्धिर्भवेच्चापि व्रणाः
क्षिप्रं भवन्त्यपि ॥ १६ ॥ पुलाकोदकसंकाशः स्रावः श्यावा-
रुणप्रभः । वलयीकुरुते चापि कठिनं च परिग्रहम ॥ १७ ॥
ज्वरस्तृष्णा भ्रमो मूर्च्छा च्छर्दिश्चास्योपजायते । रक्तं कृष्णं
स्रवेच्चापि नीलमाविललोहितम् ॥ १८ ॥ अग्निनेव च दग्धस्य
तीव्रो दाहः सवेदनः । बस्तौ वृषणयोर्वाऽपि सेवन्यां वंक्षणेषु
च ॥ १९ ॥ कदाचित्पिच्छिलो वापि पाण्डुस्रावश्च जायते ।
श्वयथुश्च भवेन्मंदस्तिमितोऽल्पपरिस्रवः ॥ २० ॥ चिरात्स
पाकं व्रजति शीघ्रं वाथ प्रपद्यते । जायन्ते कृमयश्चापि क्लियते
पूतिगंधि च ॥ २१ ॥ प्रशीर्यते मणिश्चास्य मेढ्रं मुष्कावथा-
पि च । ध्वजभंगकृतं क्लैव्यमित्येतत्समुदाहृतम् । एवं पंच-
विधं केचिद् ध्वजभंगं वदंत्यपि ॥ २२ ॥
ध्वजभंगवाले मनुष्यके लिंगपर सूजन हो और लिंगमें पीडा हो तथा लाल हो,
उसके ऊपर घोर फोडे होते हैं, तथा लिंगमें पाक हो, मांसकी वृद्धि हो लाल होय
तथा लिंगमें फोडे होंय उसमें चावलके मांडके समान और काला लाल स्राव होय
कंकणके समान गोल लपेटा होय और उसकी जड कठिन होय, तथा उस पुरुषको
ज्वर, प्यास, भ्रम, मूर्च्छा, वमन ये रोग हों तथा लिंगमेंसे काला नीला लोहित और