माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ११० ) माधवनिदान ।
( ११० ) माधवनिदान ।
विण्मूत्रयोस्तत्समगन्धवर्णं तृट्श्वासकासार्तियुतं प्रसक्तम् ।
प्रच्छर्दयेद्दुष्टमिहातिवेगात्तथार्दितश्चाशु विनाशमेति ॥ ११ ॥
जिस समय वह वायु पुरीष, पसीना मूत्र और जल इनके बहनेवाली नाड़ि-
योंके मार्गको रोककर ऊपर आवे तब ऊपर आनेवाला दोष (मलमूत्रादि) कोठेसे
बाहर निकाल वमन करावे उस वमनसे मलमूत्रकीसी दुर्गन्ध आवे, तथा वर्ण भी
मल मूत्रके सदृश हो, प्यास, श्वास, खांसी और शूल ये होयँ और यह वमन बारं-
बार बडे वेगसे होय है । इस वमनसे पीडित मनुष्य थोडे कालमें नाशको प्राप्त होते
हैं । कहते हैं कि, सब छर्दि प्रबल है परन्तु ऐसी छर्दि असाध्य है ॥
आगन्तुकछर्दिके लक्षण ।
बीभत्सजा दोहृदजाऽऽमजा च याऽसात्म्यजा वा कृमिजा च या हि ।
सा पञ्चमी तां च विभावयेत्तु दोषोच्छ्रयेणैव यथोक्तमादौ ॥१२ ॥
बीभत्स पदार्थ कहिये मल, राध, रुधिर आदि अपवित्र वस्तुओंके देखनेसे,
गन्धसे, स्वादसे, स्त्रीके गर्भ रहनेसे, आमसे, असात्म्य भोजनसे अथवा कृमिरोगसे
इन कारणोंसे प्रगट भई आगंतुक पांचवीं छर्दि होती है । उससे पूर्वोक्त लक्षणों-
मेंसे जिस दोषके अधिक लक्षण मिले उसी दोषको प्रबल जाने ॥
कृमिकी छर्दिके लक्षण ।
शूलहृल्लासबहुला कृमिजा च विशेषतः ।
कृमिहृद्रोगतुल्येन लक्षणेन च लक्षिता ॥ १३ ॥
कृमिकी छर्दिमें शूल, खाली रह ये विशेष होते हैं और बहुधा कृमि और हृदय-
रोग इनके लक्षणसदृश लक्षण जानना । जैसे पिछाडी कह आये हैं—“उत्क्लेशः
ष्ठीवनं तोदः शूलं हल्लासकस्तमः । अरुचिः श्यावनेत्रत्वं शोषश्च कृमिजे भवेत् ॥ ”
कृमिके साध्यासाध्य लक्षण ।
क्षीणस्य या छर्दिरतिप्रसक्ता सोपद्रवा शोणितपूययुक्ता ।
सचन्द्रिकां तां प्रवदेदसाध्यां साध्यां चिकित्सेन्निरुपद्रवां च ॥ १४ ॥
क्षीण पुरुषकी अथवा बारम्बार एकसी होनेवाली और कासादि उपद्रवयुक्त
और रुधिर राध मिली मोरचंद्रिकाके समान ऐसी छर्दि असाध्य है और जो उप-
द्रवरहित हो उसको साध्य समझकर उपाय करे ॥
कृमिके उपद्रव ।
कासश्वासौ ज्वरो हिक्का तृष्णा वैचित्त्यमेव च ।
हृद्रोगस्तमकश्चैव ज्ञेयाश्छर्देरुपद्रवाः ॥ १५ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( १११ )
खांसी, श्वास, ज्वर, हिचकी, प्यास, बेचेतपना, हृदयरोग, अँधेरा आना ये
छर्द्दिरोगके उपद्रव हैं ॥
मधुकोशं सुनिर्मथ्य सारमाकृष्य वै मया ।
व्रजभाषाकृता टीका माधवार्थप्रकाशिका ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
छर्द्दिनिदानं समाप्तम् ।
अथ तृष्णानिदानम् ।
तृष्णाकी सम्प्राप्ति ।
भयश्रमाभ्यां बलसंक्षयाद्वाप्यूर्ध्वं चितं पित्तविवर्धनैश्च ।
पित्तं सवातं कुपितं नराणां तालु प्रपन्नं जनयेत्पिपासाम् ॥ १ ॥
भयसे, श्रमसे, बलके क्षयसे और पित्तके बढानेवाले क्रोध उपवासादिकोंसे अपने
स्थानमें संचित हुआ जो पित्त और वात ये कुपित होकर ऊपर तालुए (पिपासा-
स्थान) में जाय तृष्णा (प्यास) को उत्पन्न करें। इस जगह तालुका तो उपल-
क्षणमात्र है तालुके कहनेसे क्लोमस्थान (हृदयमें जो प्यासका स्थान है) उसका भी
ग्रहण है, क्योंकि वह भी प्यासका स्थान है, सो चरकमें लिखा है ॥
अन्नजादि तृष्णाकी सम्प्राप्ति ।
स्रोतःस्वपां वाहिषु दूषितेषु दोषैश्च तृष्णा भवतीह जन्तोः ।
तिस्रः स्मृतास्ताः क्षतजा चतुर्थी क्षयात्तथा ह्यामसमुद्भवा च॥२
भक्तोद्भवा सप्तमिकेति तासां निबोध लिंगान्यनुपूर्वशश्च ॥
जलके बहनेवाली नसके दूषित होनेसे दोष (अन्न कफ और आम) इनसे
तृष्णा रोग होय हैं सो तीन हैं और चौथी (क्षतजतृष्णा जो व्रणवाले पुरुषके होती है)
पांचवी क्षयसे होती है छठी आमसे होती है, सातवी अन्नसे होय है। उन्होंके लक्षण
१ रसवाहिनी च धमनी जिह्वामूलगळतालुक्लोम्नः ।
संशोष्य नृणां देहे कुरुते तृष्णामतिप्रबलाम् ॥