माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २२ ) माधवनिदान ।
( २२ ) माधवनिदान ।
पित्तोल्वणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति ॥ २३ ॥
तस्य दाहज्वरो घोरो बहिरन्तश्च वर्धते । शीतं च सेवमानस्य
कुप्यतः कफमारुतौ ॥ २४ ॥ ततश्चैनं प्रधावन्ते हिक्काश्वास-
प्रमीलकाः । विसूचिका पर्वभेदः प्रलापो गौरवं क्लमः ॥२५॥
नाभिपाश्र्वरुजा तस्य स्विन्नस्याशु विवर्द्धते । स्विद्यमानस्य
रक्तं च स्रोतोभ्यः संप्रपद्यते ॥ २६ ॥ शूलेन पीड्यमानस्य
तृष्णा दाहश्च वर्द्धते । असाध्यसन्निपातोऽयं [ शीघ्रकारीति]
कथ्यते । नहि जीवत्यहोरात्रमेतेनाविष्टविग्रहः ॥ २७ ॥
पित्त अधिक है जिसमें ऐसा सन्निपात जिसके कुपित हुआ है ॥ २३ ॥
उस पुरुषके घोर दाह और ज्वर भीतर और बाहर बढता है उस समय शीतका
सेवन करनेसे पुरुषके कफ और वायु कुपित होते हैं, तदनन्तर हिचकी, सांस और
आंखोंका मिचना बाधा करते हैं । विसूचिका ( दस्त और उलटी ), पर्वोंमें फूटन,
बडबडाना, शरीरका भारी होना, खेद होना, नाडी और पसवाडेमें दर्द, स्वेदन
देनेसे शीघ्र बढना और उस स्विन्न पुरुषके स्रोतोंसे रक्त झरने लगना और शूलसे
पीडित पुरुषके प्यास और दाहका बढना यह असाध्य सन्निपात होता है, उसको
( शीघ्रकारी ) नामसे बोलते हैं । इस सन्निपातसे ग्रसित शरीरवाला पुरुष एक
दिन रात भी नहीं जीता ॥ २४-२७॥
कफोल्वणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति ॥२८॥ तस्य
शीतज्वरस्वप्नगौरवालस्यतन्द्रिकाः । छर्दिमूर्च्छाकृषादाह-
तृणारोचकहृद्ग्रहाः ॥ २९ ॥ ष्ठीवनं मुखमाधुर्यं श्रोत्रवाग्-
दृष्टिनिग्रहः । श्लेष्मणो निग्रहं चास्य यदा प्रकुरुते भिषक्
॥३०॥ तदा तस्य भृशं पित्तं कुर्यात्सोपद्रवं ज्वरम् । निगृहीते
तु पित्ते च भृशं वायुः प्रकुप्यति ॥३१॥ निराहारस्य सोऽत्यर्थं
मेदो मज्जास्थि बाधते । तथाऽत्र स्नाति भुंक्ते वा त्रिरात्रं नहि
जीवति । मेदोगतः सन्निपातः [ कप्फणः ] स उदाहृतः ॥३२ ॥
कफ अधिक है जिसमें ऐसा सन्निपात जिसके कुपित हो उस पुरुषके शीतज्वर,
स्वप्न, शरीरका भारीपन, आलस्य, तन्द्रा, वमन, मूर्च्छा, दाह, प्यास, अरुचि,
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भाषाटीकासमेत । ( २३ )
हृदयका जकडना, थूकना, मुखमें मीठापन, कानोंसे सुनना वाणीसे बोलना
दृष्टिसे देखना बन्द होजाय, यदि इस पुरुषके कफको वैद्य रोके तो अत्यंत कुपित
हुआ पित्त उपद्रव सहित ज्वरको पैदा करे और यदि पित्तको रोकाजाय तो वात
अत्यन्त कुपित होता है और कुपित हुआ वात निराहार पुरुषकी मेदा मज्जा और
हड्डियोंको पीडित करता है। इसमें स्नान करता है और खाता भी है लेकिन तीन
रात नहीं जीता है अर्थात् तीन रातके अन्दर ही मर जाता है यह मेदोगत सन्निपात
(कफण) नामसे कहा है ॥ २८-३२ ॥
मतान्तरभेद ।
कुम्भीपाकः प्रौर्णुनावः प्रलापी ह्यन्तर्दाहो दण्डपातोऽन्तकश्च ।
एणीदाहश्चाथ हारिद्रसंज्ञो भेदा एते सन्निपातज्वरस्य ॥ १ ॥
अजघोषभूतहासौ यन्त्रापीडश्च संन्यासः ।
संशोषी च विशेषास्तस्यैवोक्तास्त्रयोदशान्यत्र ॥ २ ॥
१ कुम्भीपाक, २ प्रौर्णुनाव, ३ प्रलापी, ४ अन्तर्दाह, ५ दण्डपात, ६ अन्तक,
७ एणीदाह, ८ हारिद्रसंज्ञक, ९ अजघोष, १० भूतहास, ११ यन्त्रापीड, १२ संन्यास,
१३ संशोषी ये तेरह प्रकारके संनिपात हैं ॥
इन तेरहोंके क्रमसे लक्षण लिखते हैं-
कुम्भीपाक १ ।
घोणाविवरगलद्बहुशोणासितलोहितं सार्त्ति ।
विलुठनमस्तकमभितः कुम्भीपाकेन पीडितं विद्यात् ॥ १ ॥
जिस पुरुषके नासिकाके छिद्रसे पीला काला लाल गाढा जल बहुत झरता हो
और शिरको चारों तरफ पटकता हो उस पुरुषको कुम्भीपाकसे पीडित जानना चाहिये॥
प्रौर्णुनाव २ ।
उत्क्षिप्य यः स्वमङ्गं क्षिपत्यधस्तान्नितान्तमुच्छ्वसिति ।
तं प्रौर्णुनावजुष्टं विचित्रकष्टं विजानीयात् ॥ २ ॥
जो पुरुष अपने अंगको उठाकर नीचे पटकता है और बहुत जल्दी २ श्वास लेता
है, अनेक प्रकारसे दुःखी उस पुरुषको प्रौर्णुनाव सन्निपातसे ग्रसित जानना चाहिये॥
प्रलापी ३ ।
स्वेदभ्रमाङ्गमर्दाः कम्पो दवथुर्वमिर्व्यथा कण्ठे ।
गात्रं च गुर्वतीव प्रलापिजुष्टस्य जायते लिङ्गम् ॥ ३ ॥
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