माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३६ ) माधवनिदान ।
( ३६ ) माधवनिदान ।
वातका स्थान है उसके स्थानमें कफ पित्त दूसरेके स्थानमें पहुँचनेसे निर्बल हो जाते
हैं इससे तीसरे दिन ज्वर करते हैं । यदि कफ पित्त स्वस्थानपर स्थित होय तो
सन्ततज्वरको करते हैं यह जैज्जटका मत है। ऐसेही मस्तक कफका स्थान है और
पीठ पित्तका स्थान है इनमें दूसरे दोषोंके पहुँचनेसे दुर्बल होकर तृतीयक ज्वर करते हैं।
शंका-यदि त्रिक वातका स्थान है तो फिर आप पित्त कफका उस स्थानमें
गमन कैसे कहते हो ? उत्तर-यह स्थानका नियम प्रकृतिस्थित दोषोंका कहा है
कुपित दोषोंका नहीं कहा है क्योंकि कुपित दोषोंका सर्वत्र गमन होता है यह सुश्रु-
तका मत है। ऐसेही दोषोंका अन्यस्थानगतत्व होनेसे तथा दोषोंका निर्बलत्व होनेसे
चातुर्थिक ज्वरमें भी जानना । चातुर्थिक ज्वर दो प्रकारकी शक्ति दिखाता है सो
ऐसे-कफ अधिक जिसमें होवे वह प्रथम जंघाओंमें व्याप्त होकर पश्चात् सर्व देहमें
व्याप्त होता है और वात अधिक जिसमें होवे वह पहले मस्तकमें व्याप्त होकर पीछे
सर्व देहमें व्याप्त होता है । पांच प्रकारके विषमज्वर प्रायशः सन्निपातसे प्रगट होते
हैं यह चरकका मत है । हारीत ऋषि कहते हैं कि चातुर्थिकज्वरमें पित्त प्रधान है।
इन विषम ज्वरोंका उत्पत्तिक्रम वृद्धसुश्रुतमें इस प्रकारका लिखा है कि, कफके पांच
स्थान हैं। उनमें जिस जिस स्थानमें दोष प्राप्त होते हैं वहां उसी २ विषमज्वरकों
प्रगट करते हैं । उन पांच स्थानोंके नाम-आमाशय १, हृदय २, कण्ठ ३, शिर ४
और सन्धि ५ । तहां आमाशयमें दोष पहुँचनेसे सन्ततकज्वर दो समय आता है,
हृदय स्थित दोष आमाशयमें आनेसे एकान्तरा एक समय आता है, कण्ठमें स्थित
दोष एक दिनमें हृदयमें आता है, दूसरे दिन आमाशयमें प्राप्त हो ज्वर करे उसै
तृतीयक (तिजारी) कहते हैं, शिरमें स्थित जो दोष सो क्रमसे कण्ठ हृदय और
आमाशयमें तीन दिनमें प्राप्त हो चतुर्थ दिवस चातुर्थिक ज्वर प्रगट करते हैं और
उन दोषोंको उलटकर पुनः स्वस्थानमें पहुँचना उसी दिन होता है क्योंकि, दोष
वेगवान् होते हैं और दोष सन्धिस्थित होते हैं तब प्रलेपक ज्वर प्रगट करते हैं,'
ये विषमज्वरके समान ज्वर हैं. कारण इसका यह है कि, सन्धि आमाशयमें स्थित है
और सुश्रुतने कहा है कि प्रलेपक यह विषम ज्वर है धातुशोष रोगियोंकों
क्लेशका देनेवाला है ॥
विषमज्वरके भेद ।
विषमज्वर एवान्यश्चातुर्थिकविपर्ययः ।
स मध्येऽह्नि ज्वरयति ह्याद्यन्ते विमुञ्चति ॥ ३५ ॥
१ कुपितानां हि दोषाणां शरीरं परिधावताम् । यत्र संगः खवैगुण्याद्व्याधिस्तत्रोपजायते ॥
२ प्रायशः सन्निपातेन दृष्टः पञ्चविधो ज्वरः । सन्निपाते तु यो भूयात् स दोषः परिकीर्तितः॥
भाषाटीकासमेत । ( ३७ )
चातुर्थिक ज्वरका उलटा यह दूसरा विषमज्वर है, यह प्रथम और अंतका दिन
छोड़कर बीचके दो दिन आता है जैसे यह चातुर्थिकका विपर्यय है तैसे ही तृती-
यक आदिका भी विपर्यय होता है, उनको कहते हैं-जैसे बीचके एक दिन ज्वर
आवे और आदि अन्तके दिन नहीं आवे यह तृतीयकका विपरीत और जो एक
काल छोड़कर सब दिन रात्रि ज्वर रहे वह अन्येद्युष्क इकन्तरेका विपरीत जानना ।
इनके विषयमें ग्रन्थकारोंके भिन्न भिन्न मत हैं, विस्तारके भयसे इस जगह नहीं लिखे हैं ॥
वातबलासकज्वर ।
नित्यं मन्दज्वरो रूक्षः शूनकस्तेन सीदति ।
स्तब्धाङ्गः श्लेष्मभूयिष्ठो नरो वातबलासकी ॥ ३६ ॥
वातबलासक नामक ज्वर जिस मनुष्यके हो वह उस ज्वरकरके शोथयुक्त अर्थात्
सूजन हो और मन्दज्वर सदैव बना रहे, देह रूखी हो, अंग जकड जावे, कफ विशेष
होय यह ज्वर वात और कफसे होता है इसको वातबलासकज्वर कहते हैं ॥
प्रलेपकज्वर ।
प्रलिम्पन्निव गात्राणि घर्मेण गौरवेण च ।
मन्दज्वरविलेपी च स शीतः स्यात्प्रलेपकः ॥ ३७ ॥
जिस ज्वरमें पसीनासे तथा सूर्यके घामसे अथवा देहके गौरवसे मानो देहको
लिप्त करदियासा मालूम हो इसी हेतुसे मन्दज्वर हो, शीत लगे, यह ज्वर कफपित्तसे
प्रगट होता है और राजयक्ष्मारोगमें यह होता है, कोई इसको त्रिदोषजनित कहते
हैं, इसको प्रलेपकज्वर कहते हैं ॥
विषमज्वरविशेषभेद ।
विदग्धेऽन्नरसे देहे श्लेष्मपित्ते व्यवस्थिते ।
तेनार्धं शीतलं देहमर्धमुष्णं प्रजायते ॥ ३८ ॥
अन्नका रस दुष्ट होनेसे और देहमें कफ पित्त दुष्ट होकर स्थित होनेसे ( अर्ध-
नारीश्वररूप अथवा नरसिंहरूप ) अर्धांगज्वर प्रगट करे हैं अर्थात् अर्धदेह कफसे
शीतल और अर्धदेह पित्तसे गरम होता है ॥
१ वातबलासल्लक्षणं ग्रन्थान्तरे-"बलासो वायुना युक्तः शीतादि षडहो ज्वरम् । जनये-
न्नयनस्रावं हृत्पीडां मधुरास्यताम् ॥" २ प्रलेपकस्त्वत्रविषमः प्रायः क्लेशाय शोषिणाम् । अन्ये
रात्रिञ्चरादयोऽपि विषमज्वरा बोद्धव्याः, यथोक्तम्-समौ वातकफौ यस्य क्षीणपित्तस्य
देहिनः । रात्रौ प्रायो ज्वरस्तस्य दिवा हीनकफस्य तु ॥
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