माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १८ ) माधवनिदान ।
( १८ ) माधवनिदान ।
अकस्मात् क्षणमें दाह, क्षणभरमें शीत लगे, हाड, संधि, मस्तक इनमें शूल,
अश्रुपातयुक्त काले और लाल तथा फटेसे नेत्र होजावें ( अथवा टेढ़े नेत्र हों, यह
जय्यटका मत है ) कानोंमें शब्द और पीडा हो, कण्ठमें कांटे पड़जायें, तन्द्रा, बेहोशी
हो, अनर्थ बोले, खांसी, श्वास, अरुचि, भ्रम ये हो; जीभ परिदग्धवत् ( काली )
और खर्दरी गोजीभके समान तथा शिथिल ( लठर ) हो पित्त रुधिर मिला कफ
थूके, शिरको इधर उधर पटके, तृषा बहुत लगे, निद्राका नाश हो, हृदयमें पीडा,
पसीना मूत्र मल इनका बहुत कालमें थोडा उतरना, दोषोंके पूर्ण होनेसे देहका कृश
न होना, कण्ठमें कफका निरन्तर बोलना, रुधिरसे काले लाल कोठे और चकत्तोंका
होना, शब्द बहुत मन्द निकले, कान नाक मुख आदि छिद्रोंका पकना, पेटका
भारी होना, वात पित्त कफ इनका देरमें पाक हो “उदरस्य च” इस पदमें जो
चकार है इससे वाग्भटने जो लिखे हैं कौन, शीतका लगना, दिनमें घोर निद्राका
आना, नित्य रात्रिमें जागना अथवा निद्रा कभी आवेही नहीं, पसीना बहुत
आवे और नहीं आवे, कभी गान करे, कभी नाचे, हंसे, रोवे और चेष्टा पलट जाय
इत्यादि जानने ये सन्निपातज्वरके लक्षण जानने ॥
शंका-क्योंजी ! वातादिक दोषोंके परस्पर विरुद्ध गुण हैं फिर उनका एकत्र
मिलकर एकही कार्यका करना कहीं घट सके हैं, क्योंकि परस्पर विरुद्ध गुण होनेसे
जैसे अग्नि और जलके विरुद्ध गुण होनेसे एकही कार्य नहीं हो सके ऐसेही वात पित्त
कफके विरुद्ध गुण हैं फिर ये कैसे सन्निपातरूपी विकारको प्रगट करते हैं ? उत्तर-
इसका समाधान दृढबल आचार्यने इस प्रकार कहा है कि, गुण विरुद्ध भी वात
पित्त कफ दोष हैं तथा एक संग उत्पन्न होनेसे तथा परस्पर समानगुण होनेसे एक
दूसरे दोषको शांत नहीं कर सकता, जैसे-सर्पका विष सर्पको बाधक नहीं। गदाधर
आचार्य इसमें और हेतु कहते हैं जैसे दैवकी इच्छासे और दोषोंके स्वभावसे
तथा विरुद्ध गुण होनेसे सन्निपातमें एक दोष दूसरे दोषका नाशक नहीं है. शंका-
क्योंजी ! वात पित्त कफका अलग अलग कालमें संचय होता है और अलग अलग
कोप होता है इनका एक ही कालमें प्रगट होना असम्भव है तो कहिये तीनों
दोष मिलकर कैसे सन्निपातज्वरको प्रगट करते हैं ? उत्तर-ये त्रिदोष प्रगट कारक
कारण औषध अन्न विहारके बल करके एक ही कालमें इन तीनों दोषोंका प्रकोप
होता है यह सिद्धान्त है ॥
१ कोठके ७ लक्षण भालुकिने कहे हैं यथा-“वरटीदंशसंकाशः कण्डूमान् लोहितोऽस्र-
कफपित्तक्षणिकोत्पत्तिविनाशः कोठ इत्यभिधीयते सद्भिः” इति । २ विरुद्धैरपि नत्वेते
गुणैर्घ्नन्ति परस्परम् । दोषास्तु सहसाम्यात्त्वाद्विषं घोरमहीनिव । ३ दैवा दोषस्वभावाद्वा दोषाणां
सान्निपातिके । विरुद्धैश्च गुणैस्तैश्च नोपघातः परस्परम् ॥
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भाषाटीकासमेत । (१९)
सन्निपातोंके भेद ।
सुश्रुत और वाग्भटके मतसे सन्निपात एक ही प्रकारका है परन्तु और आचार्योंके
मतसे उल्बणादि भेदों करके ५२ प्रकारका है, यथा-
भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् । वातपित्तोल्बणे
विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ॥ १ ॥ शैत्यं कासोऽरुचिस्तन्द्रा
पिपासा दाहहृद्व्यथाः । वातश्लेष्मोल्बणे व्याधौ लिङ्गं पित्ता-
नुगे विदुः ॥२॥ छर्दिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना ।
मन्दवाते व्यवस्यन्ति लिङ्गं पित्तकफोल्बणे ॥ ३ ॥
जिस सन्निपातज्वरमें वातपित्तकी अधिकता और कफकी मन्दता हो उसमें
भ्रम प्यास दाह और शरीरका भारीपन शिरमें अत्यन्त पीडा ये लक्षण जानने
चाहिये ॥ १ ॥ वातकफकी अधिकता और कफकी मन्दतामें शीत लगना खांसी
अरुचि तन्द्रा प्यास दाह हृदयमें दर्द होता है ॥ २ ॥ पित्त कफकी अधिकता
और वातकी मन्दतामें वमन जाडा लगना बारम्बार दाह प्यास मोह हड्डियोंमें
पीडा होती है ॥ ३ ॥
सन्ध्यस्थिशिरसः शूलं प्रलापो गौरवं भ्रमः । वातोल्बणे स्याद्
द्वयनुगे तृष्णा कण्ठास्यशुष्कता ॥ ४ ॥ रक्तविण्मूत्रता दाहः
स्वेदस्तृष्णा बलक्षयः । मूर्च्छा चेति त्रिदोषे स्याल्लिङ्गं पित्ते
गरीयसि ॥ ५ ॥ आलस्यारुचिहल्लासदाहवम्यरतिभ्रमैः । कफो-
ल्वणं सन्निपातं तन्द्राकासेन चादिशेत् ॥ ६ ॥
वातकी अधिकता और पित्त कफकी न्यूनतामें सन्धिस्यान और हड्डी और
शिरमें शूल, बड़बडाना, शरीरका भारीपन, भ्रम प्यास कण्ठ और मुखका सूखना
होता है ॥ ४ ॥ पित्तकी अधिकता और वात कफकी मन्दतावाले सन्निपातमें लाल
पुरीष और लाल मूत्र दाह पसीना प्यास बलका नाश मूर्च्छा ये लक्षण होते
हैं ॥ ५ ॥ कफकी अधिकता पित्तवातकी न्यूनतामें आलस्य अरुचि (में) उवकाई
जलन वमन पीडा भ्रम तन्द्रा और खांसी होती है ॥ ६ ॥
प्रतिश्यायश्छर्दिरास्यं तन्द्रारुच्यग्निमार्दवम् । हीनवाते पित्त-
मध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके मतम् ॥ ७ ॥ हारिद्रमूत्रनेत्रत्वं दाह-
स्तृष्णा भ्रमोऽरुचिः । हीनवाते मध्यकफे लिङ्गं पित्ताधिके