माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ८४ ) माधवनिदान ।
( ८४ ) माधवनिदान ।
जो रक्तपित्त काढेके रंगसमान हो, काला, गौके मूत्र समान हो अथवा मोरकी
चन्द्रिकाके समान नीलवर्ण अर्थात् बैंगनी रंगके सदृश होय, घरके धूएँके सुर्माके
समान हो ये पैत्तिक रक्तपित्तके लक्षण हैं । शंका-क्यों जी ! केवल पैत्तिक रक्त-
पित्त नहीं हो सके है । कारण इसका यह है कि, जैसे कफके रक्तपित्तका मार्ग कहा है
इस प्रकार पैत्तिक रक्तपित्तका नहीं कहा ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु
यह मार्ग जो कहा है सो वातकफके लक्षण प्रति नहीं कहा है ॥
द्विदोषजादि रक्तपित्तके लक्षण ।
संसृष्टलिङ्गं संसर्गात्त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् ।
ऊर्ध्वगं कफसंसृष्टमधोगं मारुतान्वितम् ॥ ७ ॥
द्विमार्गं कफवाताभ्यामुभाभ्यामनुवर्त्तते ।
दो दोषके मिलनेसे जो रक्तपित्त होता है उसमें दोनों दोषोंके लक्षण मिलनेसे
द्विदोषज जानना और जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हों उसको सन्निपातका रक्त
पित्त जानना । ऊपरके मार्गसे कफका और नीचेके मार्ग होकर वातका और दोनों-
मार्गोंसे जो रक्तपित्त निकले सो वात और कफ इन दोषोंसे प्रगट भया जानना ॥
ऊर्ध्वगादिकोंका साध्यासाध्यविचार ।
ऊर्ध्वं साध्यमधो याप्यमसाध्यं युगपद्द्रुतम् ॥ ८ ॥
ऊपरके मार्गसे लोही निकले सो साध्य है (क्योंकि कफसे प्रगट है सो कफके
रक्तपित्तमें काथ तीखे रस कफपित्तके हरणकर्ता होते हैं ) और नीचेके मार्गसे
जिसमें रुधिर गिरे सो याप्य ( साध्यासाध्य ) है इसका कारण यह है कि, पित्तके
हरणमें विरेचन मुख्य है और इसपर वातपित्त शमन करनेवाला मधुररस प्रधान
वमन देनेसे विरुद्धमार्गी होते हैं अर्थात् ( वेगमात्रका अवरोधक है परन्तु पित्तका
हरण करनेवाला नहीं है ) और दोनों मार्गोंसे गिरनेवाला रक्तपित्त असाध्य है
कारण इसपर विरुद्ध चिकित्सा करनी पडती है ॥
साध्य होनेके कारण ।
एकमार्गं बलवतो नातिवेगं नवोत्थितम् ।
रक्तपित्तं सुखे काले साध्यं स्यान्निरुपद्रवम् ॥ ९ ॥
बलवान् पुरुषके एक मार्ग अर्थात् ऊपरके मार्गसे जाता हो, अतिवेग नहीं हो,
१-यदुक्तं चरके “ साध्यं लोहितपित्तं तद्यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते । विरेचनस्य योग्यत्वाद् बहुत्वाद्
भेषजस्य च । विरेचनं हि पित्तस्य जयाय परमौषधम् ॥ ” इत्यादि ।
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भाषाटीकासमेत । ( ८५ )
नवीन प्रगट भया हो और हेमन्त शिशिर कालमें प्रगट भया हो और दुर्बलता आदि
उपद्रवरहित हो ऐसा रक्तपित्त साध्य होता है ॥
दोषभेदसे साध्यासाध्य लक्षण ।
एकदोषानुगं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते ।
त्रिदोषजमसाध्यं स्यान्मन्दाग्नेरतिवेगितम् ॥ १० ॥
व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यानश्नतश्च यत् ॥ ११ ॥
एकदोषका रक्तपित्त साध्य है, द्विदोषका याप्य है और तीनों दोषोंका असाध्य
है। मन्दाग्नि अतिवेगसे हो, रोगसे क्षीण देहवालेका, बूढ़े मनुष्यका और जिसका
आहार थकगया हो ऐसे मनुष्योंका रक्तपित्त असाध्य होता है ॥
रक्तपित्तके उपद्रव ।
दौर्बल्यं श्वासकासज्वरवमथुमदाः पाण्डुता दाहमूर्च्छा
भुक्ते घोरो विदाहस्त्वधृतिरपि सदा हृद्यतुल्या च पीडा ।
तृष्णा कोष्ठस्य भेदः शिरसि च तपनं पूतिनिष्ठीवनत्वं
भक्तद्वेषाविपाकौ विकृतिरपि भवेद्रक्तपित्तोपसर्गाः ॥ १२ ॥
अशक्तता, श्वास, खांसी, ज्वर, वमन, धतूरेके फल खानेसे जैसी अवस्था हो
ऐसी अवस्था, शरीरका पीला वर्ण होजाय, मूर्च्छा, अन्न खानेसे अत्यन्त दाह हो,
अधीरपना, सर्वकाल हृदयमें विलक्षण पीडा, प्यास, कोष्ठभेद (अर्थात् मल पतला
हो), मस्तकमें पीडा, दुर्गन्धयुक्त थूकना, अन्नमें अरुचि, आहारका परिपाक न
होना ये रक्तपित्तके उपद्रव हैं और उसी प्रकार उस रक्तपित्तकी विकृति भी होय है
सो आगे-“ मांसप्रक्षालनाभम् ” इत्यादि श्लोककरके कहते हैं ॥
असाध्य लक्षण ।
मांसप्रक्षालनाभं क्वथितमिव च यत्कर्द्दमाम्भोनिभं वा
मेदःपूयास्रकल्पं यकृदिव यदि वा पक्वजम्बूफलाभम् ।
यत्कृष्णं यच्च नीलं भृशमतिकुणपं यत्र चोक्ता विकारा-
स्तद्वर्ज्यं रक्तपित्तं सुरपतिधनुषा यच्च तुल्यं विभाति॥१३॥
जो रक्तपित्त मांस धोये हुए जलके समान हो अथवा सडे पानीके समान अथवा
कीचके समान अथवा जलके समान; उसी प्रकार मेद, राध, रुधिर इनके समान
अथवा कलेजेके टुकडेके समान अथवा पकी जामुनके समान किंवा काले रंगका
किंवा नील कहिये पपैया पक्षीके पंखके समान जिसमें मुरदेकीसी बास आवे
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