माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३७६ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
( ३७६ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
गर्भमें नपुंसक कौन कारणसे होता है ऐसे कोई प्रश्न करे उसके निमित्त कहते
हैं-माता पिताके बीजदोषसे, पूर्वजन्मके पापोंसे, गर्भमें रेत ( वीर्य ) के बहनेवाली
नाड़ियोंमें दोष प्राप्त होकर उन नाड़ियोंको सुखाय देवे, जब रेतके बहनेवाली नाडी
सूख जावें तब वीर्यका क्षय हो इससे बालक जो प्रगट होय उसके सर्व अंग यथाय
होयँ, परन्तु लिंग नहीं होवे, सन्निपातके बढनेसे ये असाध्य हैं ॥
शुक्रार्तवदोषनिदान ।
शुक्रं पौरुषमित्युक्तं तस्माद्वक्ष्यामि तच्छृणु । यथा हि बीजं
कालाम्बुकृमिकीटाग्निदूषितम् ॥ १ ॥ न विरोहति सन्दुष्टं
तथा शुक्रं शरीरिणाम् । अतिव्यवायाद्व्यायामादसात्म्यानां
च सेवनात् ॥ २ ॥ अकाले चाप्ययोनौ वा मैथुनं चैव
गच्छतः । रूक्षतिक्तकषायातिलवणाम्लोष्णसेवनात् ॥ ३ ॥
मधुरस्निग्धगुर्वन्नसेवनाज्जरया तथा । चिन्ताशोकादिविस्त्र-
म्भाच्छस्त्रक्षाराग्निभिस्तथा ॥ ४ ॥ भयात्क्रोधादभीचारा-
द्व्याधिभिः कर्शितस्य च । वेगाघातात्क्षयाच्चापि धातूनां
सप्तदूषणात् ॥ ५ ॥ दोषाः पृथक्समस्ता वा प्राप्य रेतोवहाः
शिराः । शुक्रं संदूषयन्त्याशु तद्वक्ष्यामि विभागशः ॥ ६ ॥
पूर्व नपुंसकके निदानमें यह कह आये हैं कि, मनुष्यमें पुरुषार्थ केवल वीर्यका
ही है इसी कारण अब मैं वीर्यका वर्णन करता हूं, उसको सुन-जैसे काल ( समय )
जल, कृमि, कीट, अग्निसे दूषित बीज नहीं हरा होवे उसी प्रकार मनुष्यका दूषित
वीर्य गर्भप्रद नहीं होता है। अत्यन्त मैथुन करनेसे, दण्ड कसरत करनेसे, अपनी
प्रकृतिके विरुद्ध भोजन करनेसे, कुसमय और दुष्टयोनि ( गर्मी रोग आदिसे
दूषित ) में विषय ( गमन ) करनेसे, बैठे रहनेसे, मधुर, रूक्ष, कडुवा, कसैला, अति-
नोनफा, खट्टा, गरम ऐसे पदार्थके सेवन करनेसे मधुर, चिकने, भारी अन्नके भोजन
करनेसे, वृद्ध अवस्थाके होनेसे, चिन्ता, शोक, अविश्वास, शस्त्र, खार और अग्निके
प्रयोगसे, भय, क्रोध, क्षयी तथा धातुओंके दूषित होनेसे पृथक् २ दोष अथवा
सर्व दोष ( वीर्य ) के बहनेवाली नाडीमें प्रवेश होकर शुक्रको दूषित करते हैं । उस
दूषितशुक्रके लक्षण क्रमसे न्यारे २ कहता हूं ॥
दूषितशुक्रके भेद ।
फेनिलं तनु रूक्षं च विवर्णं पूति पिच्छिलम् ।
अन्यधातूपसंसृष्टमवसादि तथाष्टमम् ॥ ७ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३७७ )
दुष्ट शुक्र आठ प्रकारका है-फेनिल अर्थात् झागवाला, पतला, रूखा, विवर्ण,
( खोटे रंगका ) पूति ( सडा ), पिच्छिल ( गाढा ) और धातुके साथ मिला भया
तथा अवसादि ये आठ भेद हुए ॥
वातदूषित शुक्रके लक्षण ।
वातेन फेनिलं शुष्कं कृच्छ्रेण पिच्छिलं तनु ।
भवत्युपहतं शुक्रं न तद्गर्भाय कल्पते ॥ ८ ॥
बादीसे शुक्र झागवाला, सूखा, कुछ गाढा और थोडा तथा क्षीण हो । यह गर्भके
अर्थका नहीं है ॥
पित्तदूषित शुक्रके लक्षण ।
सनीलमथवा पीतमत्युष्णं पूतिगंधि च ।
दहेल्लिङ्गं विनिर्याति शुक्रं पित्तैश्च दूषितम् ॥ ९ ॥
पित्तसे दूषित शुक्र नीला, अत्यन्त गरम होता है उसमें बुरी वास आवे और
जब निकले तब लिंगमें दाह होवे ॥
कफदूषित शुक्रके लक्षण ।
श्लेष्मणा रुद्धमार्गं तु भवत्यत्यर्थपिच्छिलम् ।
कफसे शुक्र शुक्रवहा नाडियोंके मार्ग रुकनेसे अत्यन्त गाढा होजाता है ॥
स्त्रियमत्यर्थगमनादभिघातात्क्षयादपि ।
शुक्रं प्रवर्तते जन्तोः प्रायेण रुधिरान्वयम् ॥ १० ॥
अत्यन्त स्त्रीगमन करनेसे, चोट लगनेसे, मनुष्यके रुधिरसंयुक्त वीर्य निकलता है॥
कृच्छ्रेण याति ग्रथितमवसादि तथाष्टमम् ।
इति दोषाः समाख्याताः शुक्रस्याष्टौ सलक्षणाः ॥ ११ ॥
अष्टम जो अवसादि शुक्र है सो बडी कठिनतासे गांठके समान निकलता है,
शुक्रके आठ दोष कहे हैं ॥
शुद्धशुक्रके लक्षण ।
स्निग्धं घनं पिच्छिलं च मधुरं चाविदाहि च ।
रेतः शुद्धं विजानीयात्स्निग्धं स्फटिकसन्निभम् ॥ १२ ॥
सचिक्कण, गाढा, पिच्छिल ( मलाईके समान ), मीठा, दाहरहित और जो
स्निग्ध स्फटिक मणिके समान होय ये शुद्धवीर्यके लक्षण हैं ॥
सुश्रुतसे-शुक्रदोषनिदान ।
वातपित्तश्लेष्मशोणितकुणपगन्ध्यनलपग्रंथिपूतिपूयक्षीणरेतसः