माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १७८ ) माधवनिदान ।
( १७८ ) माधवनिदान ।
वातहृद्रोगके लक्षण ।
आयम्यते मारुतजे हृदयं तुद्यते तथा ।
निर्मथ्यते दीर्यते च स्फोट्यते पाट्यतेऽपि च ॥ ३ ॥
वातज हृदयरोगमें हृदय ईंचासरीखा, सुईसे टोनेसरीखा, फोडनेसरीखा, दो टुकडा
करनेके समान, मथनेके समान, कुल्हाडीसे फोडनेके समान करे है ॥
पित्तके हृद्रोगके लक्षण ।
तृष्णोष्णदाहमोहाः स्युः पैत्तिके हृदयक्लमः ।
धूमायनं च मूर्च्छा च स्वेदः शोषो मुखस्य च ॥ ४ ॥
पित्तके हृदयरोगमें प्यास, किंचित् दाह, मोह और हृदयकी ग्लानि, धूआं निक-
लतासा मालूम होय, मूर्च्छा, पसीना और मुखका सूखना ये लक्षण होते हैं ॥
कफके हृदयरोगके लक्षण ।
गौरवं कफसंस्त्रावोऽरुचिः स्तम्भोऽग्निमार्दवम् ।
माधुर्यमपि चास्यस्य बलासो वर्तते हृदि ॥ ५ ॥
कफसे हृदय व्याप्त होनेसे भारीपना, कफका गिरना, अरुचि, हृदय जकडजाय,
मन्दाग्नि, मुखमें मिठास ये लक्षण होते हैं ॥
त्रिदोषजहृद्रोगके लक्षण ।
विद्यात्त्रिदोषं त्वपि सर्वलिङ्गं-
जिसमें सब लक्षण मिलते होंयँ वह त्रिदोषका हृद्रोग जानना इसमें कुछ भी अपथ्य
होनेसे गांठ उत्पन्न होती है, उस गांठसे कृमि पैदा होती हैं, ऐसे चरकमें कहा है ॥
कृमिज हृद्रोगके लक्षण ।
-तीव्रार्तितोदं कृमिजं सकण्डु ।
उत्क्लेदः ष्ठीवनं तोदः शूलं हृल्लासकस्तमः ।
अरुचिः श्यावनेत्रत्वं शोषश्च कृमिजे भवेत् ॥ ६ ॥
तीव्र पीडा करके तथा नोचनेकीसी पीडा करके तथा खुजली करके युक्त ऐसा
हृद्रोग कृमिजन्य जानना । उत्क्लेद ( ओकारी आनेके समान मालूम हो ), थूकना,
तोद ( सुई चुभानेकीसी पीडा ), शूल, हृल्लास, अँधेरा आवे, अरुचि, नेत्र काले
पडजायँ और मुखशोष ये लक्षण कृमिज हृदयरोगमें होते हैं । जैज्जटका यह मत
१ त्रिदोषजे तु हृद्रोगे यो दुरात्मा निषेवते । तिलक्षीरगुडादींश्चेद्ग्रन्थिस्तस्योपजायते ॥
मर्मैकदेशे संक्लेदं रसश्चाप्युपगच्छति । संक्लेदात् कृमयश्चान्ये भवंत्युपहतात्मनः ॥ *
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १७९ )
है कि, उत्क्लेशसे लेकर तमपर्यन्त त्रिदोषके लक्षण कहे हैं। जैसे तोद, शूल ये वादीसे
होयँ । उत्क्लेश, हल्लास और ष्ठीवन ये कफसे और तम यह पित्तसे लक्षण होता
है और अरुचिसे लेकर शोषपर्यन्त कृमिज हृद्रोगके लक्षण जानने । इस विषयमें
प्रत्येक आचार्योंके भिन्न २ मत हैं ॥
सर्वोके उपद्रव ।
क्लोम्नः सादो भ्रमः शोषो ज्ञेयास्तेषामुपद्रवाः ।
कृमिजे कृमिजातीनां श्लैष्मिकाणां च ये मताः ॥ ७ ॥
क्लोम कहिये पिपासा ( प्यास ) के स्थान उसमें ग्लानि होय, भ्रम, शोष ये सब
उन हृद्रोगोंके उपद्रव जानने और कफकी कृमिरोगके जो पिछाडी कह आये हैं
सोई कृमिज हृद्रोगोंके लक्षण होते हैं । तथा “ हल्लासमास्यस्रवणमविपाकमरोच-
कम् ।” इत्यादि ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
हृद्रोगनिदानं समाप्तम् ॥
अथ मूत्रकृच्छ्रनिदानम् ।
व्यायामतीक्ष्णौषधरूक्षमद्यप्रसंगनित्यद्रुतपृष्ठयानात् ।
आनूपमांसाध्यशनादजीर्णात्स्युर्मूत्रकृच्छ्राणि नृणामिहाष्टौ ॥ १॥
व्यायाम ( दण्डकसरत आदि ), तीक्ष्णौषध ( राई आदि ) रूखा पदार्थ और
नित्यप्रति मद्यपान करना इनसे और निरन्तर घोडेपर चढनेसे और जलसमीप रह-
नेवाली पक्षी ( हंस, सारस, चकवां, आदि) का मांस खानेसे, भोजनके ऊपर भोजन
करनेसे और कच्चे पदार्थ इत्यादिकोंके खानेसे मनुष्योंके आठ प्रकारका मूत्रकृच्छ्र
रोग होता है। पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १, चोट लगनेका १, मल रोकनेका १,
वीर्य रोकनेका १ और पथरीका १ ये सब मिलकरके आठ भये ॥
मूत्रकृच्छ्रकी सम्प्राप्ति ।
पृथङ्मलाः स्वैः कुपिता निदानैः सर्वेऽथवा कोपमुपेत्य बस्तौ ।
मूत्रस्य मार्गं परिपीडयन्ति यदा तदा मूत्रयतीह कृच्छ्रात् ॥ २ ॥
अपने अपने कारणोंसे कुपित भये जो वातादिक सब अलग दोष बस्तीमें कुपित
होकर मूत्रके मार्गको पीडित करें, तब मनुष्यके बडे कष्टसे मूत्र उतरे ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA