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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( २१८ ) माधवनिदान ।

( २१८ ) माधवनिदान ।
निर्बलपुरुष शरीरको परिश्रमकारक कर्म करे तब वायु कुपित होकर शिराके
जालको संकुचित कर एकत्रकर और सुखायकर ऊंची गांठको शीघ्र प्रगट करै है ॥
साध्यासाध्यके लक्षण ।
ग्रन्थिः शिराजः स च कृच्छ्रसाध्यो भवेद्यदि स्यात्सरुजश्चलश्च ।
अरुक्स एवाप्यचलो महांश्च मर्मोत्थितश्चापि विवर्जनीयः ॥ ७ ॥
वह शिरा (कहिये नस) की गांठ कृच्छ्रसाध्य है, यदि वह पीडायुक्त तथा चञ्चल
होय तो वह गांठ साध्य है, और पीडारहित तथा निश्चल बडी और मर्मस्थानमें
प्रगट भई होय तो वह असाध्य है, उसको वैद्य त्याग दे ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां
ग्रन्थिनिदानं समाप्तम् ॥
अथार्बुदनिदानम् ।
अर्बुदकी सम्प्राप्ति ।
गात्रप्रदेशे काचिदेव दोषाः समुच्छ्रिता मांसमसृक्प्रदूष्य ।
वृत्तं स्थिरं मन्दरुजं महान्तमनल्पमूलं चिरवृद्ध्यपाकम् ॥
कुर्वन्ति मांसोच्छ्रयमत्यगाधं तदर्बुदं शास्त्रविदो वदन्ति ॥ १ ॥
शरीरके किसी भागमें दुष्ट भये जो दोष सो मांस रुधिरको दुष्ट कर गोल, स्थिर,
मन्दपीडायुक्त, यह ग्रन्थिरोगसे बडी होय है, बडी जिसकी जड होय, बहुत
कालमें बढनेवाली तथा पकनेवाली न होय ऐसी मांसकी गांठ उठे उसको वैद्य
अर्बुद कहते हैं ॥
वातेन पित्तेन कफेन चापि रक्तेन मांसेन च मेदसा च ।
उज्जायते तस्य च लक्षणानि ग्रन्थेः समानानि सदा भवन्ति ॥ २ ॥
वह अर्बुदरोग बादीसे, पित्तसे, कफसे, रुधिरसे, मांससे और मेदसे ऐसे छः
प्रकारका है । उसके लक्षण सर्वदा ग्रंथिके सदृश होते हैं ॥
रक्तार्बुदके लक्षण ।
दोषः प्रदुष्टो रुधिरं शिराश्च संकुच्य संपीड्य ततस्त्वपाकम् ।
सास्रावमुन्नह्यति मांसपिण्डं मांसांकुरैराचितमाशु वृद्धम् ॥ ३ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २१३ )
करोत्यजस्रं रुधिरप्रवृत्तिमसाध्यमेतद्रुधिरात्मकं तु ।
रक्तक्षयोपद्रवपीडितत्वात्पाण्डुर्भवेत्सोऽर्बुदपीडितस्तु ॥ ४ ॥
दुष्ट भये दोष रुधिरको तथा नसोंको संकोच कर तथा पीडित कर मांसके गोलेको
प्रगट करे वह यत्किंचित् पकनेवाला तथा कुछ स्रावयुक्त हो, मांसपिंडको ऊंचा
करता हो और मांसांकुरसे व्याप्त और शीघ्र बढनेवाला होता है. उसमें रुधिर निर-
न्तर बहा करें, यह रक्तार्बुद असाध्य है। वह रक्तार्बुदपीडितरोगी रक्तक्षयके उप-
द्रवोंकरके पीडित होनेसे उसका वर्ण पीला हो जाय । ये रक्तार्बुदके लक्षण हैं ॥
मांसार्बुदकी संप्राप्ति ।
मुष्टिप्रहारादिभिरर्दितेऽङ्गे मांसं प्रदुष्टं जनयेद्धि शोथम् ॥ ५ ॥
अवेदनं स्निग्धमनन्यवर्णमपाकमश्मोपममप्रचाल्यम् ।
प्रदुष्टमांसस्य नरस्य गाढमेतद्भवेन्मांसपरायणस्य ॥ ६ ॥
मांसार्बुदं त्वेतदसाध्यमुक्तं-
मुक्काआदिका लगनेसे अंगमें पीडा होय, उस पीडासे दुष्ट भया मांस सो सूजन
उत्पन्न करे, उस सूजनमें पीडा नहीं होय और वह चिकनी देहके वर्ण होय पके
नहीं, पत्थरके समान कठिन, हले नहीं ऐसा होय है । जिस मनुष्यका मांस बिगड
जाय और नित्य मांसको खाया करे उसको यह अर्बुदरोग होता है । यह मांसार्बुद
असाध्य कहा है । कोई मांसार्बुदका भेद रसोली कहते हैं ॥
साध्यमें असाध्य प्रकार ।
-साध्येष्वपीमानि तु वर्जयेच्च ।
संप्रस्रुतं मर्मणि यच्च जातं स्रोतःसु या यच्च भवेदचाल्यम् ॥ ७ ॥
साध्यमें भी यह इन लक्षणोंवाला अर्बुदरोग वर्जित है, स्राव ( झरे ) और
मर्मस्थानमें प्रगट भया हो, अथवा नासा आदि स्रोत ( मार्ग ) में प्रगट हो और
जो स्थित हो, वह असाध्य है ॥
अध्यर्बुदके लक्षण ।
यज्जायतेऽन्यत्खलु पूर्वजाते ज्ञेयं तदध्यर्बुदमर्बुदज्ञैः ।
पहले जिस ठिकानेपर अर्बुद भया होय उसी ठिकानेपर दूसरा अर्बुद प्रगट
होय उसको अध्यर्बुद कहते हैं ॥
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