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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( ८८ ) माधवनिदान ।

( ८८ ) माधवनिदान ।
राजयक्ष्माके पूर्वरूप ।
श्वासाङ्गसादकफसंस्रवताळुशोषवम्यग्निसादमदपीनसकास-
निद्राः । शोषे भविष्यति भवन्ति स चापि जन्तुः शुक्लेक्षणो
भवति मांसपरो रिरंसुः ॥३॥ स्वप्नेषु काकशुकशल्लकिनील-
कण्ठगृध्रांस्तथैव कपयः कृकलासकाश्च । तं वाहयन्ति स
नदीर्विजलाश्च पश्येच्छुष्कांस्तरून् पवनधूमदवार्दितांश्च ॥ ४ ॥
श्वास, हाथ पैरका गलना, कफका थूकना, तालुवेका सूखना, वमन, मंदाग्नि,
उन्मत्तता, पीनस, खांसी और निद्रा ये लक्षण धातुशोष होनेवालेके होते हैं और
उस मनुष्यके नेत्र सफेद होते हैं और उस मनुष्यकी मांस खानेपर तथा स्त्रीसङ्ग
करनेको इच्छा होती है और स्वप्नमें कौआ, तोता, सेह, नीलकंठ ( मोर ), गीध,
बन्दर, करकेटा इनपर अपनेको बैठा देखे और जलहीन नदीको देखे तथा पवन, धूल
और धूआँ इनसे पीडित ऐसे वृक्ष देखे, चकारसे तृण, केश आदिका गिरना ये
होते हैं। ये सब स्वप्न क्षयरोग होनेसे पहिले दीखते हैं, सो चरकमें लिखा है।
शंका-क्योंजी ! शुक्रका तो क्षय हो जाता है फिर “ रिरंसुः ” यह पद क्यों धरा ?
उत्तर-यह केवल व्याधिके बढनेसे मनके दोषसे जानना चाहिये ॥
त्रिरूपक्षयके लक्षण ।
अंसपार्श्वाभितापश्च संतापः करपादयोः ।
ज्वरः सर्वाङ्गगश्चैव लक्षणं राजयक्ष्मणः ॥ ५ ॥
कन्धा और पसवाडोंमें पीडा हो, हाथ पैरमें जलन और सर्व अंगोंमें ज्वर ये
राजयक्ष्माके लक्षण हैं, ये तीन लक्षण अवश्य होते हैं ऐसा चरकने कहा है ॥
एकादशरूप षड्रूप और त्रिरूप शोषके लक्षण कहते हैं—
स्वरभेदोऽनिलाच्छूलं संकोचश्चांसपार्श्वयोः ।
ज्वरो दाहोऽतिसारश्च पित्ताद्रक्तस्य चागमः ॥ ६ ॥


१ “पूर्वरूपं प्रतिश्यायो दौर्बल्यं दोषदर्शनम् । अदोषेष्वपि भावेषु काये बीभत्सदर्शनम् ॥
घृणित्वमश्नतश्चापि बलमांसपरिक्षयः । स्त्रीमद्यमांसप्रियता प्रियता चावगुण्ठने ॥ मक्षिकाघृण-
केशादितृणानां पतनानि च । प्रायोऽन्नपाने केशानां नखानां चाभिवर्द्धनम् ॥ पतत्रिभिः पतङ्गैश्च
श्वापदैश्चापि धर्षणम् । स्वप्ने केशास्थिराशीनां भस्मनश्चाधिरोहणम् ॥ जलाशयानां शैलानां
वनानां ज्योतिषामपि । शुष्यतां क्षीयमाणानां पततां चापि दर्शनम् ॥ प्राग्रूपं बहुरूपस्य तज्ज्ञेयं
राजयक्ष्मणः ॥” इति । अत्र श्वापदा व्याघ्रादयः ।

भाषाटीकासमेत । (८९)

शिरसः परिपूर्णत्वमभक्तच्छन्द एव च ।
कासः कण्ठस्य चोद्ध्वंसो विज्ञेयः कफकोपतः ॥ ७ ॥
एकादशभिरेतैर्वा षड्भिर्वापि समन्वितम् ।
कासातिसारपार्श्वार्तिस्वरभेदारुचिज्वरैः ॥ ८ ॥
त्रिभिर्वा पीडितं लिङ्गैर्ज्वरकासासृगामयैः ।
जह्याच्छोषार्दितं जन्तुमिच्छन्सुविपुलं यशः ॥ ९ ॥
यह राजयक्ष्मा त्रिदोषसे उत्पन्न है इसमें दोषोंके न्यारे न्यारे मिलाय कर सब
ग्यारह रूप हैं, ये व्याधिके प्रभावसे होते हैं। सन्निपातज्वरके सदृश सर्वलक्षण सब
दोषोंसे नहीं होते पृथक् पृथक् होते हैं। सो दिखाते हैं-बादीके प्रभावसे स्वरभेद,
कन्धे और पसवाडोंमें संकोच और पीडा हो, पित्तसे ज्वर, दाह, अतिसार और
मुखसे रुधिरका गिरना और कफके कोपसे मस्तकका भारीपना, अन्नसे द्वेष,
खांसी, स्वरभेद ये लक्षण होते हैं, इसमें तीन तो वातसे और चार लक्षण पित्तसे
तथा चारही लक्षण कफसे ऐसे सब ग्यारह लक्षणसे अथवा खांसी, अतिसार,
पसवाडोंमें पीडा, स्वरभेद, अरुचि और ज्वर इन छः लक्षणोंसे अथवा ज्वर खांसी
और रुधिरविकार इन तीन लक्षणोंसे पीडित क्षयीरोगवाले मनुष्य तथा जिसका
बल मांस क्षीण होगया हो ऐसे रोगीको यशकी इच्छावाला वैद्य त्याग दे ऐसा
रोगी असाध्य है ॥
साध्यासाध्य विचार ।
सर्वैरधैँस्त्रिभिर्वापि लिङ्गैरैर्वापि बलक्षये ।
युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽप्यतोऽन्यथा ॥ १० ॥
स्वरभेदादिक जो ग्यारह लक्षण कहे उन सब लक्षणों करके अथवा उनमेंसे आधे
अर्थात् छः लक्षणोंसे अथवा तीन लक्षण कहे इनसे युक्त जो क्षयीरोगी बल, मांस
क्षीण होनेपर त्याज्य है। यदि बल, मांस जिसका क्षीण न भया हो परन्तु सर्व-
लक्षण युक्त भी है तथापि त्याज्य नहीं है, उसकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥
असाध्य लक्षण ।
महाशिनं क्षीयमाणमतिसारनिपीडितम् ।
शूनमुष्कोदरं चैव यक्ष्मिणं परिवर्जयेत् ॥ ११ ॥
जो बहुत भोजन करे परन्तु दिनप्रति क्षीण होता जाय वह असाध्य रोगी है,
अतिसार करके अत्यन्त पीडित हो सो रोगी भी असाध्य होता है. क्योंकि क्षय-
रोगवालेका जीना मलके आधीन है । जैसे लिखा है-“मलायत्तं बलं पुंसां शुक्रा-