माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ४२ ) माधवनिदान ।
( ४२ ) माधवनिदान ।
इस ज्वरमें वैद्य औषधी न दे, अपक्व ज्वरमें औषधि देनेसे ज्वरकी वृद्धि होती है
और शोधन तथा शमन औषध देनेसे विषमज्वरको करे हैं ॥
ज्वरके दश उपद्रव ।
श्वासो मूर्च्छाऽरुचिस्तृष्णा छर्द्यतीसारविङ्ग्रहः ।
हिक्का श्वासोऽङ्गदाहश्च ज्वरस्योपद्रवा दश ॥ ६० ॥
भावप्रकाशके मतसे दश उपद्रवोंको कहते हैं-श्वास, मूर्च्छा, अरुचि, प्यास, वमन,
अतीसार, मलका रुकना, हिचकी, खांसी, देहमें दाह ये ज्वरके दश उपद्रव हैं ॥
पच्यमान ज्वरके लक्षण ।
ज्वरवेगोऽधिका तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः ।
मलप्रवृत्तिरुत्क्लेशः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ ६१ ॥
ज्वरका वेग, अधिक प्यास, प्रलाप, भ्रम, मलकी प्रवृत्ति, उपस्थित वमनसी
मालूम होय ये पच्यमान ज्वरके लक्षण हैं ॥
पक्वज्वर किंवा निरामज्वरके लक्षण ।
क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् ।
दोषप्रवृत्तिरुत्साहो निरामज्वरलक्षणम् ॥ ६२ ॥
भूखका लगना, देहका कृश होना, अंगोंका हलकापना, मन्द ज्वरका आना,
अधोवायुकी प्रवृत्ति होना, मनमें उत्साहका होना ये निरामज्वरके लक्षण जानने ॥
ग्रन्थांतरसे जीर्णज्वरके लक्षण ।
त्रिःसप्ताहे व्यतीते तु ज्वरो यस्तनुतां गतः ।
प्लीहाग्निसार्द कुरुते स जीर्णज्वर उच्यते ॥ ६३ ॥
२१ दिवस व्यतीत होनेपर जो ज्वर बारीक हो देहमें रहे जिससे प्लीहा अर्थात्
तापातिल्ली रोग और मन्दाग्नि होवे उसको जीर्णज्वर कहते हैं ॥
साध्यज्वरके लक्षण ।
बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वरः साध्योऽनुपद्रवः ।
बलवान् पुरुषके थोडे दोषयुक्त और श्वास आदि उपद्रव करके रहित जो ज्वर
हो वह साध्य जानना ।
असाध्यज्वरके लक्षण ।
हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः ।
ज्वरः प्राणान्तकृद्यश्च शीघ्रमिन्द्रियनाशनः ॥ ६४ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ४३ )
जो ज्वर बहुत प्रबल कारणोंसे उत्पन्न भया हो और जिसमें सम्पूर्ण लक्षण
मिलते हों वह ज्वर प्राणोंका हरण करनेवाला जानना और जो ज्वर प्रगट होते ही
चिकित्सा करते २ इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट कर दे अर्थात् अन्धा बहिरा इत्यादि वह
भी ज्वर असाध्य जानना ॥
ज्वरः क्षीणस्य शूनस्य गम्भीरो दैर्घ्यरात्रिकः ।
असाध्यो बलवान् यश्च केशसीमन्तकृज्ज्वरः ॥ ६५ ॥
जो पुरुष ज्वरसे क्षीण पडगया हो अथवा सूजन जिसके देहमें आगई हो वह
असाध्य है और जिसके ज्वर धातुके भीतर हो अथवा अन्तर्वेगज्वर अथवा जिसमें
वातादि दोषोंका निश्चय न होसके और बहुत दिनतक रहनेवाला ज्वर असाध्य होता
है और ज्वर बलवान् हो तथा जिसमें रोगी अपने हाथसे केशों ( बालों ) की
सीमन्त आदि रचना करे वह ज्वर असाध्य है ॥
गम्भीरज्वरके लक्षण ।
गम्भीरस्तु ज्वरो ज्ञेयो ह्यन्तर्दाहेन तृष्णया ।
आनद्धत्वेन चात्यर्थं श्वासकासोद्गमेन च ॥ ६६ ॥
अन्तर्दाह, प्यास, दोष अर्थात् विरुद्ध दोषके बढनेसे मलके रुकनेसे तथा श्वास
खांसीके उत्पन्न होनेसे गम्भीर ज्वर जानना ॥
दूसरे असाध्यज्वरके लक्षण ।
आरम्भाद्विषमो यस्य यस्य वा दैर्घ्यरात्रिकः ।
क्षीणस्य चातिरूह्क्षस्य गम्भीरो हन्ति मानवम् ॥ ६७ ॥
विसंज्ञस्ताम्यते यस्तु शेते निपतितोऽपि वा ।
शीतार्दितोऽन्तरुष्णश्च ज्वरेण म्रियते नरः ॥ ६८ ॥
जो ज्वर प्रगट होते ही विषम पड जांय और जो ज्वर बहुत दिनसे आया करे
और क्षीण तथा अतिरूक्ष देहवाले पुरुषके जो गम्भीर ज्वर हो वह मृत्युकारक
होता है और जो बेहोश होकर मोहको प्राप्त हो तथा गिरकर जिससे उठा न जाय
पडाही रहे अथवा बाहरी शीत लगे और देहके भीतर दाह हो ऐसे ज्वरवाला
पुरुष मरजावे ॥
और असाध्य लक्षण ।
यो हृष्टरोमा रक्ताक्षो हृदि संघातशूलवान् । वक्त्रेण चैवो-
च्छ्वसिति तं ज्वरो हन्ति मानवम् ॥ ६९ ॥ हिक्काश्वासतृषा-
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