माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १३४ ) माधवनिदान ।
( १३४ ) माधवनिदान ।
देव, ब्राह्मण, गुरुसे द्वेषकर्त्ता, वेद और वेदके अंग ( शिक्षा, कल्प, व्याकरण
आदि ) को पढा भया, पवित्र रहनेवाला, शीघ्र पीडाका कर्त्ता, हिंसा करे नहीं ये
लक्षण ब्रह्मराक्षसजुष्ट मनुष्यके हैं ॥
भूतोन्मादके लक्षण ।
महापराक्रमो यश्च दिव्यं ज्ञानं च भाषते ।
उन्मादकालानैश्चित्यो भूतोन्मादी स उच्यते ॥ २७ ॥
महापराक्रमी और जो श्रेष्ठज्ञानको कहे और जो उन्मादकालका निश्चय न होय
उसको भूतोन्मादी कहते हैं ॥
अब कहते हैं कि, देवादिकग्रह इस मनुष्यको तीन कार्यके वास्ते ग्रहण करते हैं,
हिंसा अर्थात् मारनेके निमित्त और पूजाके निमित्त तथा विहारके निमित्त । इनमें
हिंसाके निमित्त ग्रस्त मनुष्य साध्य (अच्छा) नहीं होय उसके लक्षण आगे कहते हैं॥
स्थूलाक्षो द्रुतमटनः सफेनलेही निद्रालुः पतति च कम्पते
च यो हि । यश्चाद्रिद्विरदनगादिविच्युतः स्यात्सोऽसाध्यो
भवति तथा त्रयोदशेऽब्दे ॥ २८ ॥
नेत्र भयानक होजायँ, शीघ्र चले, मुखमें जो झाग है उसको चाटनेवाला और
जिसको निद्रा बहुत आवे तथा गिरपडे, काँपे और जो पर्वत, हाथी ( अथवा ) नग
नाम वृक्ष, आदिशब्दसे भीत मन्दिर आदि जानने, इनसे गिरकर ग्रहग्रस्त होय वह
असाध्य है । तैसेही तेरहवें वर्षमें सर्व देवादि उन्मादी असाध्य जानने । विदेहने
विशेष लक्षण कहे हैं सो ग्रन्थान्तरोंसे जानलेवे ॥
देवादिकोंका आवेशसमय ।
देवग्रहाः पौर्णमास्यामसुराः सन्ध्ययोरपि ।
गन्धर्वाः प्रायशोऽष्टम्यां यक्षाश्च प्रतिपद्यथ ॥ २९ ॥
पितृग्रहास्तथा दर्श पञ्चम्यामपि चोरगाः ।
रक्षांसि रात्रौ पैशाचाश्चतुर्दश्यां विशन्ति हि ॥ ३० ॥
देवग्रह पूर्णमासीको प्रवेश करते हैं, असुरग्रह सायंकालमें, अपिशब्दसे पूर्णमा-
सीको भी प्रवेश करते हैं, गन्धर्वग्रह बहुधा अष्टमीको, प्रायःशब्दसे सन्ध्याको भी
गन्धर्व ग्रह प्रवेश करते हैं, यक्षग्रह पडवाको, पितृग्रह अमावश्याको, सर्पग्रह पंचमीको,
अपिशब्दसे अमावास्याको भी प्रवेश करते हैं, राक्षस रात्रिमें और पिशाच चतु-
१ सन्ध्या त्रिनाडीप्रमिताऽर्कबिम्बादद्धॉदितास्तादध ऊर्ध्वमत्र । इति ॥
र्दशीको मनुष्यदेहमें प्रवेश करते हैं। तिथि कहनेका यह प्रयोजन है कि, जिस जिस
तिथिको जो ग्रह मनुष्यको ग्रस्त करे उसको उसी तिथिमें शांतिके निमित्त बलिदाना-
दिक कराने चाहिये । शंका-क्योंजी ! जब ग्रहग्रस्त मनुष्योंको उन्माद होता है तो
वह ग्रह मनुष्य देहमें प्रवेश करते क्यों नहीं दीखते हैं ? इसवास्ते उत्तर कहते हैं-
दर्पणादीन् यथा छाया शीतोष्णं प्राणिनो यथा ।
स्वमणिं भास्करांशुश्च यथा देहं च देहधृक् ।
विशन्ति न च दृश्यन्ते ग्रहास्तद्वच्छरीरिणाम् ॥ ३१ ॥
जैसे दर्पणमें मनुष्यका प्रतिबिम्ब पडे है, आदिशब्द इस जगह प्रकारवाची है
अर्थात् जल, तैल आदिमें जैसे छाया पडती है और सरदी, गरमी जैसे मनुष्योंको
लगती है अथवा जैसे सूर्यकिरण सूर्यकान्तमणि ( आतसीकाच ) में प्रवेश करे है
अथवा जैसे जीव देहमें प्रवेश करे है, इसी प्रकार सब ग्रह मनुष्यके शरीरमें प्रवेश
करते हैं परन्तु दीखते नहीं हैं। इस श्लोकके पोषक दृष्टान्त जैज्जट आचार्यने बहुत
दिये हैं परन्तु ग्रन्थ बढनेके भयसे नहीं लिखे ॥
इस उन्मादरोगमें सर्वत्र देवशब्दकरके देवताओंकेसे आचरणवाले देवताओंके
अनुचर ( दास ) जानने चाहिये, क्योंकि देवताओंको मनुष्यके अपवित्र देहमें
प्रवेश होना असम्भव है। सो सुश्रुतमें लिखा है--
न ते मनुष्यैः सह संविशन्ति न वा मनुष्यान् कचिदाविशन्ति ।
ये त्वाविशन्तीति वदन्ति मोहात्ते भूतविद्याविषयादपोह्याः ॥ ३२ ॥
तेषां ग्रहाणां परिचारका ये कोटीसहस्रायुतपद्मसंख्याः ।
असृग्वसामांसभुजः सुभीमा निशाविहाराश्च तथा विशंति ॥ ३३ ॥
जो देवादिक मनुष्यके साथ मिलते नहीं हैं न वे मनुष्योंकी देहमें प्रवेश करते
हैं और जो वैद्य ' प्रवेश करते हैं ' ऐसे कहते हैं, वे अज्ञानसे कहते हैं, ऐसा वैद्य '
भूतविद्यावाला जानकर त्याज्य है । तौ कौन प्रवेश करते हैं ? इस वास्ते कहते हैं
' तेषाम् ' अर्थात् उन देवताओंके परिचारक ( नौकर ) जो करोडों हजारों पद्म-
संख्यक रुधिर, वसा, मांसके भोजन करनेवाले भयंकर, रात्रिमें विचरनेवाले हैं वें
प्रवेश करते हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा-
टीकायामुन्मादरोगनिदानं समाप्तम् ॥
१ ग्रहा गृह्णन्ति ये येषु तेषां तेषु विशेषतः । दिनेषु बलिहोमादीन्प्रयुंजीत चिकित्सकः ॥