माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १३८ ) माधवनिदान ।
( १३८ ) माधवनिदान ।
वातके अपस्मारमें रोगी कांपे, दांतोंको चबावे, मुखसे झाग गेरे और श्वास भरे
तथा कर्कश अरुणवर्ण और काला वर्ण मनुष्योंको दीखे अर्थात् कोई नील वर्णका
मनुष्य मेरे पास दौडा आता है । इसी प्रकार पित्तसे पीले वर्णका पुरुष दौडा आता
है और कफमें सफेद रंगका पुरुष सामने दौडा आता है ऐसे जानना ॥
पित्तकी मृगीके लक्षण ।
पीतफेनाङ्गवक्त्राक्षः पीतासृग्रूपदर्शनः ।
सतृष्णोष्णानलव्याप्तलोकदर्शी च पैत्तिकः ॥ ४ ॥
पित्तकी मिरगीवालोंके झाग, देह, मुख और नेत्र ये पीले होते हैं और वह पीले
रुधिरके रंगकीसी सब वस्तु देखे, प्यासयुक्त और गरमीकी साथ अग्निसे व्याप्त
भया ऐसा सब जगत्को देखे ॥
कफकी मृगीके लक्षण ।
शुक्लफेनाङ्गवक्त्राक्षः शीतहृष्टाङ्गजो गुरुः ।
पश्यञ्छुक्लानि रूपाणि मुच्यते श्लैष्मिकश्चिरात् ॥ ५ ॥
कफकी मिरगीवालेके झाग, अंग, मुख और नेत्र सफेद होयं, देह शीतल
होय तथा देंहके रोमांच खडे रहे, भारी होय और सब पदार्थ सफेद दीखे यह अप-
स्मार ( मिरगी ) रोग देरमें छोडे । इससे यह सूचना करी कि, वातपित्तकी मृगी
जलदी रोगीको छोड देती है ॥
सन्निपातकी मृगीके लक्षण ।
सर्वैरेतैः समस्तैश्च लिंगैर्ज्ञेयस्त्रिदोषजः ।
अपस्मारः स चासाध्यो यः क्षीणस्यानवश्च यः ॥ ६ ॥
जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हों वह त्रिदोषज अपस्मार जानना । यह
असाध्य है । और जो क्षीण पुरुषके होय वह भी असाध्य है । तथा पुराना पड
गया होय वह भी अपस्मार ( मिरगी ) रोग असाध्य है ॥
मृगीके असाध्य लक्षण ।
प्रतिस्फुरन्तं बहुशः क्षीणं प्रचलितभ्रुवम् ।
नेत्राभ्यां च विकुर्वाणमपस्मारो विनाशयेत् ॥ ७ ॥
बारंबार कंपयुक्त होय, क्षीण हो गया हो भृकुटी ( भौंह ) का चलानेवाला और
नेत्र बांके करमेवाला ऐसा अपस्मारी रोगी जीवे नहीं ॥
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भाषाटीकासमेत । (१३९)
मृगीरोगकी पाली ।
पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः ।
अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिदथोत्तरम् ॥ ८ ॥
कोपको प्राप्त भये जो दोष सो पंद्रहवें दिन अथवा बारहवें दिन अथवा महीने
भरमें मिरगीरोग प्रकट करें । तिनमें पैत्तिक १५ दिन, वातिक १२ दिन और
श्लैष्मिक ३० दिनमें आती है । इस जगह बारहवें दिनके पिछाडी पक्ष कहना
ठीक था फिर पहिले पक्ष धरनेका यह प्रयोजन है कि, अधिक कालकरके ही
दोष वेग करते हैं यह कहा । “किंचिदथोत्तरम्” इस पदसे यह सूचना करी है
कि, जिस जिस दोषका जो जो काल कहा है उससे पहिले भी दोषोंके तारतम्यसे
मिरगीरोग होय है ऐसे जानना । शंका-वेग उत्पन्न करके अपस्मारके प्रगट कर्त्ता
दोष देहमें सदा रहते हैं, फिर वे सर्वकालमें वेग क्यों नहीं करते, द्वादशादि दिनमें
क्यों करते हैं ? इन विषयमें दृष्टांतरूप समाधान कहते हैं-
देवे वर्षत्यपि यथा भूमौ बीजानि कानिचित् ।
शरदि प्रतिरोहन्ति तथा व्याधिसमुच्छ्रयः ॥ ९ ॥
जैसे चातुर्मासमें इन्द्र वर्षे भी है परन्तु कोई जव, गेहूँ, चना आदि बीज शरद्
ऋतुमें ही ऊगते हैं तैसेही सर्वरोगके बीजरूप वातादिक दोष कदाचित् किसी अप-
स्मारादिक व्याधिविशेष निदानादिकका संगम होनेसे उस रोगको प्रगट करे हैं ।
अथवा इसका मुख्य प्रयोजन यह है कि, बीजके अंकुर फूटनेमें तेज, वायु, पृथ्वी,
जल ये सहायक भी हैं, परन्तु वे सब कालविशेषकी प्रतीक्षा ( इच्छा ) करते हैं ।
अंकुर आनेको काल ही सहाय चाहिये अर्थात् जिस कालमें जिस बीजको अंकुर
आता है वह उसी कालमें आवेगा बीचमें कभी नहीं आनेवाला, यही न्याय चातु-
र्थिक ज्वरादिकोंमें भी जानना ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकायां माधुरीभाषाटीकाया-
मपस्मारनिदानं समाप्तम् ॥
अथ वातव्याधिनिदानम् ।
वातव्याधिकी सम्प्राप्ति ।
रूक्षशीताल्पलघ्वन्नव्यवायातिप्रजागरैः । विषमादुपचाराच्च
दोषास्रक्स्रावणादपि ॥ १ ॥ लङ्घनप्लवनात्यध्वव्यायामाति-