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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सप्तम लम्बक ११

सप्तम लम्बक ११
पञ्चम तरंग
राजपुत्र शृंगभुज और रूपशिखा की कथा
इस प्रकार, मरुभूति के कथा सुनाने पर सभापति हरिशिखर ने नरवाहनदत्त के सम्मुख
कहा—॥१॥
'यह सत्य है, कुलीन स्त्री के लिए पति ही एकमात्र गति है। इस प्रसंग में एक आश्चर्यमयी
कथा सुनो—॥२॥
इस भूतल पर वर्धमान नामक जो नगर है, उसमें वीरभुज नाम का राजा था। उसकी
रानियों में गुणवरा नाम की महाराज्ञी उसे प्राणों से भी अधिक प्यारी थी॥३-४॥
उस राजा की एक सौ रानियों में एक को भी पुत्र (सन्तान) नहीं था॥५॥
इस कारण राजाने श्रुतवर्धन नामक वैद्य को बुलाकर पूछा कि क्या ऐसी कोई औषधि
है कि जिससे पुत्र की उत्पत्ति हो सके॥६॥
यह सुनकर वैद्य ने कहा—'महाराज! मैं इस कार्य को सिद्ध करता हूँ किन्तु यदि
आप मेरे लिए एक जंगली बकरा मँगा दें ॥७॥
वैद्य की बात सुनकर राजा ने द्वारपाल को आज्ञा देकर जंगली बकरा मँगा
दिया॥८॥
उस बकरे का राजा के रसोईदारों द्वारा वैद्य ने रानियों के लिए स्वादिष्ट रस
(शोरबा) बनवाया॥९॥
राजा सब रानियों को एक स्थान पर आने की आज्ञा देकर स्वयं भगवान् की पूजा करने
चला गया और सभी रानियाँ एक स्थान पर एकत्र हो गईं॥१०॥
इनमें केवल एक महाराज्ञी गुणवरा अनुपस्थित रही, क्योंकि वह उस समय राजा के साथ
देव-पूजन में संलग्न थी॥११॥
सब रानियों के एकत्र होने पर वैद्य ने उनके पीने के लिए चूल्हे से निकाला हुआ सम्पूर्ण भाग
उन उन में बाँट दिया॥१२॥
तुरन्त ही राजा पूजन करके रानी गुणवरा के साथ वहाँ आया और सभी मांस-रस को
समाप्त देखकर वैद्य से बोला—'बहुत बुरा हुआ कि तुमने गुणवरा के लिए कुछ भी रस बचाकर
नहीं रखा। जिसके लिए यह सब कुछ किया गया, उसे ही तुम भूल गये? —॥१३-१४॥

१०२ कथासरित्सागर

१०२ कथासरित्सागर
इत्युक्त्या स विशस्य तं वैद्यं सूदान्नृपोऽब्रवीत्।
किं तस्य शृङ्गालस्यास्ति मांसशेषोऽत्र कश्चन ॥१५॥
शृङ्गे परे स्त इत्युक्ते सूदैर्वेद्योऽथ सोऽब्रवीत्।
साधु तद्घृतं हि स्यात्प्रसूतौ शृङ्गगर्भजम् ॥१६॥
इत्युक्त्वा कारयित्वैव तत्ततः शृङ्गमांसतः।
तस्यै गुणवरायै स चूर्णमिश्रं भिषग्ददौ ॥१७॥
ततस्तस्याश्च नवतिर्देभ्यो राज्ञो नवाधिका।
आसन्गर्भाः काले च सर्वाः सुषुविरे सुतान् ॥१८॥
अर्वागुपात्तगर्भा च सा सर्वोत्तमलक्षणम्।
प्रासूत स्म महादेवी पश्चाद् गुणवरा सुतम् ॥१९॥
शृङ्गमांसरसोत्पन्नं नाम्ना शृङ्गभुजं च तम्।
पिता वीरभुजश्चक्रे राजा कृतमहोत्सवः ॥२०॥
वर्धमानः सहान्यैस्तैर्भ्रातृभिर्वयसा परम्।
कनिष्ठः सोऽभवत्तेषां गुणैर्ज्येष्ठतमस्त्वभूत् ॥२१॥
क्रमात्स राजपुत्रश्च रूपे कामसमो बभौ।
धनुर्वेदेऽर्जुनसमो भीमसेनसमो बले ॥२२॥
तच्च सपुत्रां सुतरां दृष्ट्वा वीरभुजस्य ताम्।
प्रियां गुणवरां राज्ञो देव्योऽन्या मत्सरं ययुः ॥२३॥
अथ तास्वयशोलेखा नाम राज्ञी दुराशया।
सम्मन्त्र्य ताभिरन्याभिः सह कृत्वा च संविदम् ॥२४॥
समस्ताभिः सपत्नीभिस्तं राजानं गृहागतम्।
मुषाधृतमुखग्लानिं पृच्छन्तं कृच्छ्रतोऽब्रवीत् ॥२५॥
आर्यपुत्र कथं नाम सहसे गृहदूषणम्।
परस्य रक्षिताद्य न रक्षस्यात्मनः कथम् ॥२६॥
यः सुरक्षितनाभायमन्तःपुरपतिर्युवा।
तत्सक्ता हि त्वदीयेषा राज्ञी गुणवरा किल ॥२७॥
तदन्यस्य न कामोऽस्ति सौविदल्ल१निरीक्षिते।
अन्तःपुरेऽत्र पुंसो यद्दत्तासौ तेन सङ्गता ॥२८॥
१ सौविदल्लः कञ्चुकी। तल्लक्षणं यथा —
अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः।
सर्वकार्यार्थकुशलः कञ्चुकीत्यभिधीयते॥

ऐसा सुनकर वैद्य को लज्जित और स्तब्ध देखकर राजा ने पाचक से कहा—'क्या उस
बकरे का कुछ भी मांस शेष है' ? ॥१५॥
'हाँ देव! दो सींग बचे हैं' पाचक के ऐसा कहने पर वैद्य बोला—'ठीक है, सींगों के
अन्दर का मांस तो बहुत उत्तम होगा उसे पकाओ। ऐसा कहकर और सींगों के मांस से रस
बनवाकर वैद्य ने चूर्ण मिलाकर रानी गुणवरा को दिया ॥१६—१७॥
उस ओषधि के सेवन से राजा की निन्यानब्बे रानियां एक साथ ही गर्भवती हुईं और
साथ ही उन्होंने पुत्रों का प्रसव किया ॥१८॥
सबसे अन्त में रस-पान करने के कारण रानी गुणवरा ने सम्पूर्ण शुभलक्षणों से युक्त पुत्र
को सबसे पीछे प्रसव किया ॥१९॥
यह बालक शृंग के मग मांसरस में उत्पन्न हुआ था इसलिए राजा ने इसका नाम शृंगभुज
रख दिया ॥२०॥
क्रमशः भाइयों के साथ बड़ा होता हुआ शृंगभुज रूप से अवस्था में छोटा होने पर भी
गुणों में उनसे बहुत बड़ा मालूम होता था ॥२१॥
क्रमशः वह राजकुमार शृंगभुज रूप में कामदेव के समान धनुर्वेद में अर्जुन के समान
और बल में भीमसेन के समान हुआ ॥२२॥
इस प्रकार, गुणवाले पुत्र के साथ उसकी माता गुणवरा को सन्तुष्ट देखकर राजा वीरभुज
की अन्य रानियाँ उससे डाह करने लगीं ॥२३॥
इनमें सबसे दुष्ट रानी अयशोलेखा ने इस स्थिति को देखकर सभी रानियों से मिलकर
एक सम्मति की और राजा के घर आने पर बुरे ही मुँह को मलिन बना लिया और राजा के
पूछने पर बड़ी ही कठिनाई से बोली—'आर्यपुत्र ! तुम घर के भीतर का कलंक कैसे सहन
करते हो ? दूसरों की बुराई की रक्षा करते हो और उस (बुराई) से अपनी रक्षा क्यों नहीं
करते हो ? ॥२४—२६॥
यह जो गुहा इस नाम का रतिपाल का प्रधान नौकर है उससे तुम्हारी रानी
गुणवरा आसक्त है ॥२७॥
नपुंसिका द्वारा गुहोक्त रतिपाल के अन्तःपुरस्थी इन्दिरा के साथ स्त्री की सम्भावना
रही है इसलिए यह रानी उसी गुहा से संभोग करती है ॥२८॥

१४ कथासरित्सागर

१४ कथासरित्सागर
सर्वत्रान्तःपुरे चैतत्प्रसिद्धमिह गीयते।
इत्युक्तः स तया राजा दध्यौ च विममर्श च ॥२९॥
गत्वा चैकैकशो राज्ञीरन्याः पप्रच्छ ताः क्रमात्।
ताश्च तस्मै तथैवोचुः सर्वा रक्षितकथवा ॥३०॥
ततः स मतिमान् राजा जितक्रोधो व्यचिन्तयत्।
तयो सम्भाष्यते नैतत्प्रवादश्चायमीदृशः ॥३१॥
तदा निश्चित्य कार्यो मे प्रतिमेषो न कस्यचित्।
युक्त्या तु परिहार्यौ तौ सम्प्रत्यस्तमवेक्षितुम् ॥३२॥
इति निश्चित्य सोऽन्येद्युरास्थानेऽन्तःपुराधिपम्।
सुरक्षितं तमाहूय कृतकोपं समभ्यधात् ॥३३॥
ब्रह्महत्या त्वया पाप कृतेत्यवगतं मया।
तत्त्वामकृतसत्तीर्थयात्रं न द्रष्टुमुत्सहे ॥३४॥
तच्छ्रुत्वा च समुद्भ्रान्तः ब्रह्महत्या कुतो मया।
कृता देवेति जल्पन्तं स राजा पुनरब्रवीत् ॥३५॥
मा स्म धाष्ट्र्यं कृथा गच्छ काश्मीराञ्त्यापनाशनान्।
यत्र तद्विजयक्षेत्रं नन्दिक्षेत्रं च पावनम् ॥३६॥
वाराहं यत्र च क्षेत्रं ये पूताश्चक्रपाणिना।
धत्ते नाम वितस्तेति वहन्ती यत्र जाह्नवी ॥३७॥
यत्र तन्मण्डपक्षेत्रं यत्र चोत्तरमानसम्।
तत्तीर्थयात्रापूतो मां पुनर्द्रक्ष्यसि नान्यथा ॥३८॥
एवमुक्त्वा तमवशं विससर्ज सुरक्षितम्।
स युक्त्या तीर्थयात्रायां दूरं वीरभुजो नृपः ॥३९॥
छतो गुणवरावेश्म पूर्वं तस्या जगाम सः।
सस्नेहश्च सकोपश्च सविमर्शश्च भूपतिः ॥४०॥
तत्र सा खिन्नमनसं तं दृष्ट्वापृच्छदादृता।
आर्यपुत्र किमद्यैवमकस्माद् दुर्मनायसे ॥४१॥
तच्छ्रुत्वा स महीभृत्तामेवं कृतकमभ्यधात्।
अद्याग्य महाभागी देवी मां कोऽप्यभाषत ॥४२॥
राजन् गुणवरा देवी मासं कञ्चन भूगृहे।
स्थापनीया त्वया भाव्यं स्वयं च ब्रह्मचारिणा ॥४३॥

सप्तम लम्बक १५

सप्तम लम्बक १५
यह बात सारे अन्तःपुर में प्रसिद्ध हो गई है, यह सुनकर राजा चिन्तित हुआ और
विचार करने लगा ॥२९॥
उसके बाद एक-एक रानी के पास गया और क्रमशः उन सब से पूछा। उन सभी
रानियों ने कपट करके एक ही बात कही जो पहले से निश्चित कर चुकी थीं ॥३० ॥
तब उस बुद्धिमान् और सहिष्णु राजा ने सोचा— उन राजा के सम्बन्ध में ऐसी बात
की सम्भावना तो नहीं है, किन्तु प्रवाद ऐसा हो गया है। इसलिए बिना पूर्ण निश्चय के मुझे
यह रहस्य नहीं खोलना चाहिए। इस समय अन्तिम स्थिति देखने के लिए दाना को रोकना
चाहिए ॥३१-३२॥
ऐसा निश्चय करके दूसरे दिन राजा ने रनिवास के अध्यक्ष मुरक्षित को दरबार में
बुलाकर कोप प्रदर्शित करते हुए कहा—॥३३॥
'रे पापी ! मैंने पता लगाया है कि तूने ब्रह्महत्या की है। इसलिए तीर्थयात्रा किये
बिना तुझे मैं देखना नहीं चाहता' ॥३४॥
यह सुनकर घबराय हुए 'महाराज ! मैंने ब्रह्महत्या नहीं की' —ऐसा कहते हुए
मुरक्षित से राजा ने फिर कहा—॥३५॥
'पूछता न करो। पाप का नाश करनेवाले कश्मीर देश को जाओ। वहाँ विजय-
क्षेत्र और पवित्र नन्दिक्षेत्र है ॥३६॥
और वहाँ वराह-क्षेत्र है। उन क्षेत्रों को भगवान् विष्णु ने पवित्र किया है। जिस
देश में बहती हुई जाह्नवी (गंगा) वितस्ता नाम-धारक बनती है, जहाँ उत्तर-मानस
नामक पवित्र स्थल है। इन तीर्थों की यात्रा करके पवित्र होकर मेरे पास आना—एम
नहीं' ॥३७-३८॥
ऐसा कहकर उस बेचारे मुरक्षित को राजा वीरभुज ने तीर्थयात्रा के बहाने युक्तिपूर्वक
दूर भेज दिया ॥३९ ॥
सब स्नेह, क्रोध और चिन्ता में पड़ा राजा गुणवरा रानी के समीप गया। वहाँ उसे
विमनिमन देखकर व्याकुल रानी ने पूछा कि 'हे नरपुङ्गव ! आज सहसा आप मुख दुःखी
क्यों हो?' ॥४०-४१॥
यह सुनकर राजा वीरभुज रानी से बनावटी बात बोला— 'हे महारानी ! किसी
महाज्ञानी विद्वान् (ज्योतिषी) ने आकर मुझे कहा—॥४२॥
राजन् ! शनीश्वरादि ग्रह तुम पर क्रुद्ध हैं, निष्प्रजा (सन्तानहीन) दशा हो
और अब इस प्रकारी दशा॥४३॥

राज्यभ्रंशोऽन्यथा ते स्यान्मृत्युस्तस्माच्च निन्दितम्।
इत्युक्त्वा स गतो ज्ञानी विषादोऽभूत्ततो मम॥४४॥
एवं तनोदिते राज्ञा राज्ञी गुणवरा तु सा।
भयानुरगविभ्रान्ता सा जगाद पतिव्रता॥४५॥
साहाय्यिपुत्र नार्थेन किं मां क्षिपसि भूगृहे।
धन्या ह्यस्मि यदि प्राणैरपि स्यान्मे हितं तव॥४६॥
मम वा मृत्युरस्त्वत्र तव माऽभूदनिर्वृतिः।
इहामुत्र च नारीणां परमा हि गतिः पतिः॥४७॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा साधु सोऽचिन्तयत्प्रभुः।
शङ्के न पापमेतस्यां न च तस्मिन्सुरक्षिते॥४८॥
स ह्यम्लानमुखच्छायो निराशङ्को मयेक्षितः।
कष्टं तथापि जिज्ञासे प्रवान्तस्यास्य निश्चयम्॥४९॥
इत्यालोच्य स तां राजा राज्ञीमाह स्म दुःखितः।
संविहेव वरं देवि भूगृहं क्रियतामिति॥५०॥
तथेति च तया प्रोक्तस्तत्रैवान्तःपुरे सुगम्।
विधाय भूगृहं राजा देवीं तां न्यदधेष्व सः॥५१॥
पुत्रं शृङ्गभुजं तस्या विषण्णं पृष्टकारणम्।
आश्वासयस्तद्वोक्त्वा राज्ञी सो स यदुक्तवान्॥५२॥
सापि राज्ञो हितमिति स्वर्गं मेने धरागृहम्।
स्वसुखं नास्ति साध्वीनां तासां भर्तृसुखं सुखम्॥५३॥
एवं कृतेऽयशोमुक्ता तस्य राज्यपराङ्मुखा।
निर्वासिभुजनामानं स्वैरं स्वसुतमभ्यधात्॥५४॥
राज्ञास्मद्विधुरा तावत्खाते गुणवरापिता।
एतत्पुत्रद्वयं देशाच्चलितो गच्छेत् सुखं भवेत्॥५५॥
तत्स शृङ्गभुजो देशाभिर्वास्थेताधिश्राधया।
तौ पुत्र चिन्तयेयुंवित् स्वमन्यैर्भ्रातृभिः सह॥५६॥
इति मात्रोदितं सोऽन्यान् भ्रातॄनुक्त्वा समत्सरः।
आस्ते स्म निर्वासभुजस्तत्रोपायं विचिन्तयन्॥५७॥
एकदा ते महास्त्राणि प्रयुञ्जाना नृपात्मजाः।
प्रासादाग्रे महाकायं सर्वेऽपि ददृशुर्बकम्॥५८॥

सप्तम लम्बक १०७

सप्तम लम्बक १०७
यदि ऐसा न करोगे तो तुम्हारा राज्य नष्ट हो जायगा और रानी की मृत्यु हो जायगी।
ऐसा कहकर वह प्राणी चला गया। इसीसे मुझे खेद हो गया है"॥४४॥
राजा के इस प्रकार कहने पर पतिव्रता रानी गुणवरा प्रेम और भय से व्याकुल होकर
बोली—॥४५॥
'महाराज ! यदि ऐसा है तो आप मुझे आज ही भू-गृह में क्यों नही बन्द कर देते।
मैं धन्य हूँगी यदि मेरे प्राणों से भी तुम्हें सुख प्राप्त हो सके ॥४६॥
भले ही मेरी मृत्यु हो जाय किन्तु आपको दुःख प्राप्त न हो, क्योंकि स्त्रियों को इस
लोक और परलोक में पति ही परम गति है ॥४७॥
उसके इस प्रकार के वचन सुनकर आँसू बहाता हुआ राजा सोचने लगा कि इस रानी में
या उस मुनिपुत्र में मुझे पाप की शंका नहीं है ॥४८॥
उस मुनिसुत को मैंने शंका-रहित और प्रसन्नमुख देखा। दुःख है। तो भी इस निन्दा
के सम्बन्ध में निश्चय करता हूँ॥४९॥
ऐसा सोचकर अत्यन्त दुःखी राजा ने रानी से कहा—'तब मैं यहीं रनिवास में भू-गृह
बनवाता हूँ। रानी की स्वीकृति मिलने पर राजा ने वहीं एक सुगम (आने-जाने में सरल) भू-गृह
बनवाया और रानी को उसमें रख दिया ॥५०-५१॥
दुःखी और कारण पूछते हुए पुत्र शुभभुज को रानी ने राजा से कही गई बात कहकर धीरज
बँधाया ॥५२॥
रानी गुणवरा ने राजा का हित समझकर उस भू-गृह को स्वर्ग समान समझा क्योंकि
पतिव्रता स्त्रियों को अपना सुख सुख नहीं है पति का सुख ही उनका सुख है ॥५३॥
यह सब होने पर दूसरी रानी अयशस्कान्ता ने अपने निर्दोषभुज नामक पुत्र को एकान्त
में कहा—'राजा ने तुम्हारी सौत गुणवरा को तो गड्ढे में डाल दिया। अब इसका लड़का भी निष्कण्टक
कर कहीं चला जाय तो बहुत आनन्द हो, हम राज्य देखें ! तुम अपने भाइयों से मिलकर
उसी युक्ति सोचो ॥५४-५६॥
माता से इस प्रकार कहा गया निर्दोषभुज ईर्ष्यापूर्वक अपने भाइयों के साथ उपाय
सोचने लगा ॥५७॥
इधर वे सभी राजकुमार अपने अन्य राज्य की प्राप्ति के लिए राजभवन में संलग्न
व नैराश्य समझ हुए और गुप्त न कहा पर वे ... के लिए यत्न करने को तैयार ... ॥

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर
विकृतं पक्षिणं तं च पश्यतस्तान् सविस्मयान्।
ज्ञानी क्षपणकः कोऽपि पथा तत्रागतोऽब्रवीत्॥५९॥
राजपुत्रा बको नायं रूपमानेन राक्षसः।
भ्रमत्यग्निशिखाख्योऽयं नगराणि विनाशयन्॥६०॥
सद्विध्येतैन काण्डेन यावद् गच्छतितो द्रुतः।
एतत् क्षपणकाच्छ्रुत्वा भवतिस्म नवाधिकाः॥६१॥
काण्डानि चिक्षिपुर्ज्येष्ठा नकोऽप्याहतवान् बकम्।
ततो नग्नक्षपणकः पुनस्तानब्रवीच्च सः॥६२॥
अयं कनीयान् युष्माकं भ्राता शृङ्गभुजो बकम्।
शक्नोति हन्तुमतस्तद्गृह्णात्वेष क्षमं धनुः॥६३॥
तच्छ्रुत्वैव स्मरन् मातुस्तल्लब्धावसरं वचः।
स निर्वासभुजो बालस्तत्क्षणं समचिन्तयत्॥६४॥
सोऽप्य शृङ्गभुजस्यास्य स्यादुपायः प्रवासन।
तदर्पयामस्तातस्य सम्बन्धस्मै धनुःशरम्॥६५॥
सौवर्णं तच्छरं हृत्वा विद्धो यास्यति चेद् बकः।
पश्चादेषोऽपि गन्तास्य मार्गैरुत्स्वस्मासु स शरम्॥६६॥
मवा च लप्स्यते नैतं घ्निन्वन् रक्षो बकः तदा।
स्थास्यतीहस्ततो भ्राम्यँल्लप्स्यतीह शरं विना॥६७॥
इत्यालोच्य ददौ तस्मै पापः शृङ्गभुजाय सः।
बकघाताय सशरं पितृसम्बन्धि कार्मुकम्॥६८॥
स गृहीत्वा तदाकृष्य तेन स्वर्णशरेण सम्।
रत्नपुङ्खेन विव्याध बकं शृङ्गभुजो बली॥६९॥
स विद्धमात्रस्तं कायलग्नमादाय सायकम्।
बकः सद्यदसृग्धारं पलाय्यैव ततो ययौ॥७०॥
ततः शृङ्गभुजं वीरं स निर्वासिभुजः शठः।
तत्सङ्गात्प्रेरितास्ते च भ्रातरोऽन्ये समब्रुवन्॥७१॥
देहि हेममयं तं नस्तातसम्बन्धिनं शरम्।
अन्यथाद्य शरीराणि त्यक्ष्यामः पुरतस्तव॥७२॥
तातस्तेन विना ह्यस्मानितो निर्वासयिष्यति।
न च कर्तुं ग्रहीतुं वा शक्यं तत्प्रतिरूपकम्॥७३॥

सप्तम लम्बक १९

यहाँ दिए गए पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण नीचे प्रस्तुत है:

सप्तम लम्बक १९
उस विकृत पक्षी को देखकर आश्चर्य करते हुए राजकुमारों को देखकर उस मार्ग से
जाते हुए किसी ज्ञानी भिक्षु ने कहा—'हे राजकुमारो ! यह बगुला नहीं है। बगुले के रूप में
नगरों का नाश करता हुआ यह अग्निमुख नामका राक्षस है ॥५९०॥
अतः इसे बाण से बींध दो जिससे कि यह यहाँ से भाग जाय। इसपर से ऐसा सुनकर
उन निशान्तके राजकुमारों ने उसपर अपने-अपने तीर चलाये फिर भी बगुला नहीं मरा। तब
वह दिगम्बर (नंगा) साधु बोला—'तुम लोगों का छोटा भाई शृङ्गभुज बगुले को मार
सकता है इसलिए यह एक अच्छा धनुष ले ॥५९१-९२॥
उसी समय वह क्रूर (जालिम) निर्भासभुज माँ की बातों को यादकर और उस अवसर का
उपयुक्त समझकर सोचने लगा—॥५९४॥
कि यह अवसर है शृङ्गभुज को यहाँ से निकालने का। अतः इसे पिता का धनुष-बाण
देते हैं ॥५९५॥
उसके सुलक्ष्य बाण से बींधा हुआ बगुला यदि उड़ जायगा तो यह भी उस बाण को लाने
के लिए पीछे-पीछे भागेगा ॥५९६॥
और जब इस राक्षस बगुले को खोजते-खोजते नहीं प्राप्त कर सकेगा तो लज्जा और
दण्डाच्छन्न यहाँ न आकर इधर उधर घूमता रहेगा ॥५९७॥
ऐसा सोचकर उस पापी निर्भासभुज ने बगुले को मारने के लिए शृङ्गभुज को पिता के
धनुष-बाण लाकर दे दिये ॥५९८॥
उसे लेकर बलवान् शृङ्गभुज ने रत्नाक्त पंखवाले उस सुवर्णजड़ बाण से बगुले को बींध
दिया ॥५९९॥
बाण से बिंधा हुआ बगुला शरीर में चुभे हुए बाण को लिये और रक्त की धार बहाता
हुआ वहाँ से उड़कर भागा ॥६००॥
तब वह दुष्ट निर्भासभुज और अन्य प्रदीप राजकुमार उस वीर शृङ्गभुज से
बोले—॥६०१॥
'हमारे उस किसीके भी न छूटने योग्य बाण को लाओ नहीं तो हम सब लोग सामने ही शरीर
का हनन कर देंगे ॥६०२॥
क्योंकि उसके बिना पिता हम सबको देश से निर्वासित कर देंगे। उसी बाण के जैसा
दूसरा नया बाण नहीं बनाया जा सकता ॥६०३॥

११० | कथासरित्सागर

[Header]
११० | कथासरित्सागर

तच्छ्रुत्वैव स जिह्रांस्तान् वीर शृङ्गभुजोऽब्रवीत्।
धीरा भवत मा भूद्वो भयं कार्पण्यमुज्झत ॥७४॥
आनेष्यामि शरं गत्वा हत्वा तं राक्षसाधमम्।
इत्युक्त्वा सशरं चापं निजं शृङ्गभुजोऽग्रहीत् ॥७५॥
ययौ च तां समुद्दिश्य दिशं यां स बको गतः।
पतितां रक्तसृग्धारां भूमावनुसरञ्जवात् ॥७६॥
दृष्टेषु तेषु चान्येषु मातृपार्श्वं गतेष्वथ।
गच्छन् स क्रमशः प्राप दूरां शृङ्गभुजोऽटवीम् ॥७७॥
तस्यां ददर्श चिन्वानां वनस्यान्तर्महत्पुरम्।
भोगायोपनतं काले फलं पुण्यतरोरिव ॥७८॥
तत्रोद्यानतरोर्मूले स विश्रान्त क्षणादिव।
आश्चर्यरूपामार्यान्तीमत्र कन्यामवेक्षत ॥७९॥
विरहे जीवितहरां सङ्गमे प्राणदायिनीम्।
विचित्रां निर्मितां धात्रा विषामृतमयीमिव ॥८०॥
शनैरुपागतां तां च चक्षुषा प्रेमवर्षिणा।
पश्यन्तीं तद्गतमना स पप्रच्छ नृपात्मजः ॥८१॥
किं नामधेयं कस्येदं पुरं हरिणलोचने।
त्वं च का किं तवेहागमनं कथ्यतामिति ॥८२॥
ततः साचीकृतमुखी न्यस्तदृष्टिर्महीतले।
सा च जगाद मुदती मधुरस्निग्धया गिरा ॥८३॥
इदं धूमपुरं नाम सर्वसम्पद्गृहं पुरम्।
अस्मिन् वसत्यग्निदिशो नाम राक्षसपुङ्गवः ॥८४॥
तस्य रूपशिखां नाम सबुधी विद्धि मां सुताम्।
इहागतामसामान्यात्त्वद्रूपाद्धृतमानसाम् ॥८५॥
त्वं ब्रूहि मेऽधुना कोऽसि किमिहाभ्यागतोऽसि च।
एवमुक्ते तया तस्मै सर्वं शृङ्गभुजः क्षणम् ॥८६॥
सोऽसौ यन्नामधेयश्च यस्य पुत्रो महीपतेः।
यथा शरनिमित्तेन तद्धूमपुरमागतः ॥८७॥
ततो विदितवृत्तान्ता सा तं रूपशिखाभ्यधात्।
न त्वया सुदृगन्योऽस्ति त्रैलोक्येऽपि धनुर्धरः ॥८८॥

सप्तम लम्बर १११
यह सुनकर वीर शृंगभुज उन कपटियों से बोला—'धीरज रखो। घबराओ मत।
डरो मत। मैं उस नीच राक्षस को मारकर उस बाण को लाऊँगा। ऐसा कहकर शृंगभुज अपने
धनुष-बाण लेकर ज़मीन पर गिरती हुई रक्त-धारा का अनुकरण करता हुआ चला ॥७४-७६॥
इस प्रकार प्रसन्न होकर अन्य राजपुत्रों के अपनी माताओं के समीप चले जाने पर
वह शृंगभुज जिस दिशा को बगुला भागा था उस दिशा की ओर बगुले के पीछे-पीछे जंगल
में चला गया ॥७७॥
उसने उस घोर जंगल में बगुले को खोजते हुए उसके भीतर एक महान् नगर को ऐसे
देखा जैसे मानों पुण्य-रूपी वृक्ष का भोग के लिए आया हुआ फल हो ॥७८॥
उस नगर के उद्यान में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए उसने आश्चर्यमय रूपवाली आती
हुई कन्या को देखा ॥७९॥
विरह में प्राण हरण करनेवाली और संगम म अमृतमयी वह कन्या विधाता ने विचित्र
रूप से विष और अमृत के सम्मिश्रण से बनाई थी ॥८०॥
धीरे-धीरे समीप आई हुई और अमृत बरसानेवाली आँखों से देखती हुई उससे
राजकुमार ने पूछा ॥८१॥
'हे मृगनयनी ! इस नगर का क्या नाम है ? यह नगर किसका है और तू कौन है ?
और यहाँ कैसे आई है। यह सब कहो ॥८२॥
तब मुख को कुछ टेढ़ी की हुई भूमि पर आँखें गड़ाई हुई वह सुन्दर दाँतोंवाली कन्या
मीठी और स्नेह-भरी भाषा में बोली—॥८३॥
यह धूमपुर नामक नगर है। यह समस्त सम्पत्तियों का घर है। इस नगर में राक्षसों में
श्रेष्ठ अग्निदिश नामक राक्षस रहता है ॥८४॥
मैं उसी के नाम के अनुसार रूपवाली रूपशिखा नाम की कन्या हूँ। तुम्हारे असाधारण
रूप से आकृष्ट होकर यहाँ आई हूँ ॥८५॥
अब तुम बताओ कि तुम कौन हो ? और यहाँ कैसे आये हो ? उसके ऐसा कहने पर
शृंगभुज ने अपना अपने पिता का और बगुले पर बाण चलाने आदि का सारा वृत्तान्त कह
सुनाया और बताया कि वह पिता का सुनहरा बाण लाने के लिए धूमपुर आया है ॥८६-८७॥
तब उसके विचार को जानकर रूपशिखा उससे बोली कि तुम्हारे समान धनुर्धारी
तीनों लोक में नहीं है ॥८८॥

११२ कथासरित्सागर

११२ कथासरित्सागर
येन तातोऽप्यसौ विद्धो बकरूपो महेषुणा।
स च हेममयो बाण स्वीकृतः क्रीडया मया॥८९॥
क्षतस्तु निर्व्रणः सद्यो महादंष्ट्रेण मन्त्रिणा।
विशल्यकरणीमुख्यमहौषधिविदा कृतः॥९०॥
तथापि तातं सम्बोध्य नयाम्यभ्यन्तरं द्रुतम्।
त्वामार्यपुत्र न्यस्तो हि त्वय्यात्मायं मयाधुना॥९१॥
इत्युक्त्वा समवस्थाप्य तत्र शृङ्गभुजं क्षणम्।
ययौ रूपशिखा पार्श्वं पितुरग्निशिखस्य सा॥९२॥
तात शृङ्गभुजो नाम राजसूनुरिहागतः।
कोऽप्यनन्यसमो रूपकुलशीलबयोगुणैः॥९३॥
जाने कोऽप्यवतीर्णोऽत्र देवांशो न स मानुषः।
स चेद्भर्त्ता न मे स्यात् तत्यजेयं जीवितं ध्रुवम्॥९४॥
इत्युक्तः स तया तत्र पिता सां राक्षसोऽब्रवीत्।
मानुषाः पुत्रि भक्ष्या मस्तथापि यदि ते ग्रहः॥९५॥
तदस्तु राजपुत्रं तमिहैवानाय्य दर्शय।
तच्छ्रुत्वा सा ययौ रूपशिखा शृङ्गभुजान्तिकम्॥९६॥
तत्सर्वं यथावृत्तं सञ्च तं निनायान्तिकं पितुः।
सोऽपि तं नम्रमादृत्य तत्पिताग्निशिखोऽब्रवीत्॥९७॥
ददामि राजपुत्रैतां तुभ्यं रूपशिखामहम्।
यदि मद्वचनं किञ्चिन्नातिक्रामसि जातुचित्॥९८॥
इत्युक्तवन्तं तं सोऽपि प्रह्वः शृङ्गभुजोऽब्रवीत्।
बाढमुल्लङ्घयिष्यामि नैवाज्ञावचनं तव॥९९॥
इति शृङ्गभुजोक्त्यास्तुष्टः सोऽग्निशिखोऽभ्यधात्।
उत्तिष्ठ तर्हि स्नात्वा त्वमागच्छ स्नानवेश्मनः॥१००॥
तमेवमुक्त्वावादीत्सा सुतां रूपशिखां च सः।
त्वं गच्छ सर्वा भगिनीरादायागच्छ सत्वरम्॥१०१॥
एवमग्निशिखेनोक्तौ तेन निर्जग्मतुस्ततः।
तयैव साकमुत्तस्थौ शृङ्गभुजो रूपशिखा च सा॥१०२॥
ततश्च सा सुधीः शृङ्गभुजं रूपशिखाभ्यधात्।
आर्यपुत्र कुमारीणां स्वसॄणामस्ति मे शतम्॥१०३॥

सप्तम लम्बक ११३

सप्तम लम्बक ११३
क्योंकि तुमने बगुला बने मेरे पिता को भीषण बाण से बींध दिया। उस सोने के बाण को
मैंने देखने के लिए पिता से ले लिया है ॥८९॥
मेरे पिता को उसके मन्त्री महादंष्ट्र ने विशल्यकरणी आदि ओषधियों से तुरन्त अच्छा
कर दिया है ॥९०॥
तो मैं पिता को सूचित करके तुम्हें शीघ्र अन्दर लिवा ले जाती हूँ। हे आर्यपुत्र !
मैंने अपने को तुम्हें दे डाला है ॥९१॥
ऐसा कहकर और शृंगभुज को बैठाकर वह रूपशिखा पिता अग्निशिख के पास
गई ॥९२॥
'हे पिता ! शृंगभुज नाम का एक राजकुमार यहाँ आया है। वह रूप, शील (चरित्र)
अवस्था और गुणों से असाधारण व्यक्ति है। मालूम होता है कि वह कोई पृथ्वी पर अवतीर्ण
देवता का अंश है, मानव नहीं है। यदि वह मेरा पति न होगा तो मैं निश्चय ही प्राण त्याग कर
दूँगी' ॥९३-९४॥
रूपशिखा से इस प्रकार कहे गये उसके पिता ने कहा—'बेटी ! मनुष्य तो हमारे भक्ष्य हैं।
तो भी यदि तुम्हारा आग्रह है, तो वही ठीक है। तुम उस राजकुमार को यहीं लाकर दिखाओ।
ऐसा सुनकर रूपशिखा शृंगभुज के समीप गई और जो कुछ किया था, उसे कहकर पिता के समीप
ले गई। अग्निशिख ने भी उसे विजयी देखकर सत्कार किया और बोला—॥९५-९७॥
'हे राजकुमार ! मैं तुम्हें इस रूपशिखा को देता हूँ, यदि तुम कभी मेरी बात को
इधर-उधर न करोगे' ॥९८॥
ऐसा कहते हुए अग्निशिख से विजयी शृंगभुज बोला—'ठीक है, तुम्हारी आज्ञा के
वचनों का उल्लङ्घन कभी न करूँगा' ॥९९॥
शृंगभुज से इस प्रकार कहा गया प्रसन्न अग्निशिख बोला—'अब उठो और स्नानगृह से
स्नान करके आओ' ॥१००॥
उसे ऐसा कहकर रूपशिखा से बोला—'तू भी जा और सब बहनों को लेकर शीघ्र जा'
इस प्रकार अग्निशिख से कहे गये शृंगभुज और रूपशिखा—दोनों 'जो आज्ञा' कहकर
बाहर निकले ॥१०१-१०२॥
बाहर आकर रूपशिखा ने शृंगभुज से कहा—'आर्यपुत्र ! मेरी एक सौ कुँवारी
बहनें हैं। ॥१०३॥
१५

सर्वा वयं सदृश्यश्च तुल्याभरणवाससः।
सर्वासां सन्ति कण्ठेषु तुल्या हारलताश्च नः॥१०४॥
तत्तातो मेलयित्वास्मांस्त्वां विमोहयितुं प्रिय।
आसां मध्यादभीष्टां त्वं वृणीष्वेति वदिष्यति॥१०५॥
जानाम्येतमहं तस्य व्याजाभिप्रायमीदृशम्।
सर्वा सङ्कटयत्यस्मान्किमर्थमयमन्यथा ॥१०६॥
तवा मूर्ध्नि करिष्ये च कण्ठाद्धारलतामहम्।
तदभिज्ञानलक्ष्म्या यां वनमालां मयि क्षिपे ॥१०७॥
भीतप्रायश्च तातोऽस्य बुद्धिर्नास्य विवेकिनी।
तथा मय्यपि मार्गोऽस्य जातिसिद्धः क्व गच्छति॥१०८॥
तदस्य वञ्चनार्थं ते यद्यत्किञ्चिद्वदिष्यति।
अङ्गीकृत्य त्वया तत्तद्वाच्यं मे वेद्म्यहं परम्॥१०९॥
इत्युक्त्वा भगिनीनां सा पार्श्वं रूपशिखा ययौ।
तथेत्युक्त्वा च गतवांस्नातुं शृङ्गभुजोऽपि सः॥११०॥
अथागात्स्वसृभिः साकं पार्श्वं रूपशिखा पितुः।
सोऽपि शृङ्गभुजश्चैतैः स्नापितोऽत्रागमत्पुनः॥१११॥
आसां मध्यान्निजेष्टायै प्रयच्छैतामिति ब्रुवन्।
वनमालां ददौ शृङ्गमूनायाग्निशिखोऽथ सः॥११२॥
सोऽप्यादायैव तां रूपशिखायाः क्षिप्तवान्गले।
प्राङ्मूर्धन्यस्तसङ्केतहारभ्रष्टेनुं पारमञ्ज ॥११३॥
ततः सोऽग्निशिखो रूपशिखां शृङ्गभुजान्विताम्।
निजगाद विभास्ते यां प्रातस्ताहमङ्गलम्॥११४॥
इत्युक्त्वा तौ च ताश्चान्या विससर्ज सुता गृहम्।
क्षणाच्च तं शृङ्गभुजं समाहूयैवमब्रवीत्॥११५॥
गच्छैवं दान्तयुगलं समादाय पुरावहिः।
राधिस्यं भुवि तन्नाद्य तिलसारीशतं वप॥११६॥
तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा गत्वा शृङ्गभुजोऽब्रवीत्।
खिन्नो रूपशिखायास्तत्साप्येवं निजगाद तम्॥११७॥
आर्यपुत्र न कार्यस्ते विषादोऽत्र मनागपि।
गच्छ त्वं साधयाम्येतदहं क्षिप्रं स्वमायया॥११८॥

सप्तम लम्बक ११५

सप्तम लम्बक ११५
हम सब एक समान रूप और वेश भूषावाली हैं। हम सब के गले में एक समान
हार पड़े हुए हैं॥१०४॥
इसलिए, मेरा पिता तुमको ठगने के लिए सभी लड़कियों को एकत्र करके ऐसा कहेगा कि
इनमें से तुम जिसे चाहते हो उसे वर लो ॥१०५॥
मैं उसके इस कपट-व्यवहार को जानती हूँ। नहीं तो यह हम सब को एकत्र क्यों कर
रहा है ॥१०६॥
वरमाला के वरण के समय मैं अपने कण्ठहार को सिरपर रख लूँगी। तब तुम मुझे पहचान
कर मेरे गले में वरमाला डाल देना ॥१०७॥
मेरा पिता मूर्ख है उसकी बुद्धि विवेकशालिनी नहीं है। इसीलिए, मुझ पुत्री के साथ
भी ऐसा व्यवहार करता है। जातिगत स्वभाव कहाँ जायगा ॥१०८॥
अतः तुम्हें ठगने के लिए यह जो-जो भी कहेगा उसे स्वीकार कर तुम मुझसे कहना—
[L13: आगे जो कर्त्तव्य है मैं करूँगी' ॥१०९॥
ऐसा कहकर रूपसिखा अपनी बहनों के पास गई। 'ऐसा ही करूँगा'—यह कहकर
श्रृंगभुज नहाने चला गया ॥११०॥
तदनन्तर रूपसिखा अपनी बहनों के साथ पिता के पास आई। उधर सेविकाओं द्वारा
स्नान कराया गया श्रृंगभुज भी आ गया ॥१११॥
तब अग्निधिश ने 'इन कन्याओं में जिसे तुम चाहते हो उसे यह माला दे दो' ऐसा
कहकर श्रृंगभुज को एक वरमाला दी ॥११२॥
उस राजकुमार ने भी माला को लेकर, पहले ही सिर पर हार की लड़ियों को रखी हुई
रूपसिखा के गले में डाल दिया ॥११३॥
तब अग्निधिश श्रृंगभुज और रूपसिखा से बोला—'कल प्रातःकाल तुम दोनों का विवाह
सम्पन्न कर दूँगा' ॥११४॥
ऐसा कहकर उन दोनों को तथा अन्य कन्याओं को उसने अपने-अपने घर जाने की
आज्ञा दी और पल-भर में ही श्रृंगभुज को बुलाकर यों बोला—॥११५॥
जाओ इन दो बैलों की गाड़ी सजाकर नगर के बाहर डर के रूप में रंगे हुए तिलों
की एक सौ गाड़ी को रोल में बो आओ—॥११६॥
यह सुनकर और 'ठीक है ऐसा कहकर घबड़ाया हुआ श्रृंगभुज रूपसिखा के
पास आकर सब वृत्तान्त बोला। तब वह भी उससे बोली ॥११७॥
'आर्यपुत्र ! तुम इस सम्बन्ध में जरा भी खेद न करो। तुम खेत की ओर जाओ। मैं
अपनी माया से सब सिद्ध कर देती हूँ' ॥११८॥

११६ कथासरित्सागर

११६ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा तत्र गत्वा स दृष्ट्वा राजसुतस्तिलान् ।
राक्षसान्विह्वलो यावद्वप्तुं प्रक्रमते कृपन् ॥११९॥
तावद्ददर्श भूमिं तां कृष्टमुप्तांश्च तांस्तिलान् ।
प्रियामायाबलात्सर्वान्क्रमेणैव सुविस्मितः ॥१२०॥
गत्वा चाग्निशिखायैतत्कृतं कार्यं न्यवेदयत् ।
ततः स वञ्चको भूयस्तमभाषत राक्षसः ॥१२१॥
न ममोप्तैस्तिलैः कार्यं गच्छ राशीकुरुष्व तान् ।
तच्छ्रुत्वोपेत्य तद्रूपशिखायै सोऽब्रवीत्पुनः ॥१२२॥
सा तं विसृज्य भूमिं तां सृष्ट्वासंख्याः पिपीलिकाः ।
ताभिः सङ्घटयामास तिलांस्तान्निजमायया ॥१२३॥
सवृष्ट्वैव पुनर्गत्वा तस्मै सोऽग्निशिखाय तान् ।
न्यवेदयच्छृङ्गभुजस्तिलां राशीकृतानपि ॥१२४॥
ततः सोऽग्निशिखो मूर्खं शठो भूयोऽप्युवाच तम् ।
इतो दक्षिणतो गत्वा योजनद्वयमात्रकम् ॥१२५॥
अस्ति देवकुलं शून्यमरण्ये भद्र शाम्भवम् ।
तस्मिन्धूमशिखो नाम भ्राता वसति मे प्रियः ॥१२६॥
तत्रेदानीं व्रजेच्चैव वदेद्देवकुलाग्रतः ।
भो धूमशिख दूतस्ते सानुगस्य निमन्त्रणम् ॥१२७॥
प्रहितोऽग्निशिखेनाहं शीघ्रमागम्यतां त्वया ।
भावी रूपशिखाया हि प्रातः परिणयोत्सवः ॥१२८॥
एतावदुक्त्वा चैवात्र त्वमिहायाहि सत्वरम् ।
प्रातः परिणयस्वैतां सुतां रूपशिखां मम ॥१२९॥
इत्युक्तस्तेन पापेन तथेत्युक्त्वा तथैव सः ।
गत्वा रूपशिखायास्तत्सद्यः शृङ्गभुजोऽब्रवीत् ॥१३०॥
सा चास्मै मृत्तिकां तोयं कण्टकानग्निमेव च ।
दत्त्वा तस्य वधार्थं च निजमेवं जगाद तम् ॥१३१॥
एतदादाय तुरगं गत्वा देवकुलं च तत् ।
द्रुतं धूमशिखायोक्त्वा तत्तादृशं निमन्त्रणम् ॥१३२॥
आगन्तव्यं त्वया शीघ्रमन्येनानेन पाप्मना ।
पृष्ट्वा शोणितपं च मृत्युर्लब्धिस्त्वया परम् ॥१३३॥

सप्तम लम्बक ११७

सप्तम लम्बक ११७
यह सुनकर राजकुमार गया और जबतक तिलों के बोने की तैयारी करता है
तबतक देखता है कि उसकी प्रेयसी की माया के बल से सारी भूमि जुत गई और सारे तिल
बो दिये गये हैं ॥११९ १२० ॥
राजपुत्र ने जाकर अग्निशिख से खेत जोतने और तिल बोये जाने का समाचार सुना
दिया तब वह धूर्त और ठग राक्षस फिर बोला—॥१२१॥
'मुझे तिलों के बोने से कोई प्रयोजन नहीं है। तुम जाकर उन्हें एकत्र करके फिर
से ढेर लगा दो। यह सुनकर राजकुमार ने फिर सारा हाल रूपशिखा से कहा—'रूपशिखा ने
उस भूमि में अगणित चीटियाँ उत्पन्न करके उनसे उन तिलों को बिनवाकर अपनी माया से
ढेर करा दिया ॥१२२ १२३॥
यह देखकर राजपुत्र ने अग्निशिख से जाकर कहा कि वे तिल फिर ढेर कर दिये
गये ॥१२४॥
तब वह मूर्ख ठग फिर बोला—'यहाँ से दक्षिण की ओर आठ कोस पर शिव का एक
मन्दिर है। उसमे मेरा प्यारा भाई धूमशिख रहता है ॥१२५ १२६॥
तुम अभी वहाँ जाओ और देव-मन्दिर के सामने खड़े होकर मेरी ओर से कहना कि
'हे धूमशिख ! अपने अनुचरों के साथ तुम्हे निमन्त्रण देने के लिए मुझे अग्निशिख ने भेजा है।
तुम शीघ्र आना। कल प्रातःकाल मेरी कन्या रूपशिखा का विवाहोत्सव है। इतना कहकर
तुम आज ही लौटकर यहाँ आओ और प्रातःकाल मेरी कन्या रूपशिखा से ब्याह
करो ॥१२७—१२९॥
उस पापी अग्निशिख से इसप्रकार कहा गया राजकुमार 'ऐसा ही होगा' कहकर
रूपशिखा के पास आया और ये सारी बातें उससे कहीं ॥१३० ॥
उस पतिव्रता ने उसे मिट्टी पानी काँटे और आग एवं अपना अच्छा घोड़ा देकर
कहा—॥१३१॥
'इस अच्छे घोड़े पर चढ़कर, उस देव-मन्दिर का प्रणाम कर तथा धूमशिख को मेरे
पिता की ओर से निमंत्रण करके तुम दौड़ते हुए इस घोड़े से शीघ्र आ जाओ। आते हुए गर्दन
घुमाकर बार-बार पीछे की ओर देखना ॥१३२ १३३॥

पश्चात्तमागतं धूमशिखं द्रक्ष्यसि यत्ततः।
सन्मार्गे मृत्तिकां ते प्रक्षेप्स्यात्मपृष्ठतः ॥१३४॥
ततोऽपि पश्चादागच्छेत् स ते धूमशिखो यदि।
तथैव पृष्ठतस्त्याज्यं तोयमेव त्वयान्तरा ॥१३५॥
तदप्यत्येति चेत्क्रम्यास्तद्वदेतेऽप्य कण्टकाः।
तथापि चेत्सोऽनुपतेन् मध्येऽग्निमिमं क्षिप ॥१३६॥
एवं कृते हि निर्वेन्यस्त्वमिष्टंवाप्स्यसि मा च ते।
विकल्पोऽभूद्ध्रुवं प्रत्यस्य च विद्याबलं मम ॥१३७॥
इत्युक्तः स तया शृङ्गभुजो धृतमुदादिकः।
तथेति तद्यातश्चोदरण्ये देवकुलं ययौ ॥१३८॥
तत्र वामस्थगौरीकं दक्षिणस्थविनायकम्।
दृष्ट्वा नत्वा च विश्वेशमुक्तचैवाग्निशिखोदितम् ॥१३९॥
निमन्त्रणवचस्तस्य तूर्ण धूमशिखस्य तत्।
ततश्चारुह्य चतुरं प्रधाविततुरङ्गमम् ॥१४०॥
क्षणाच्च पृष्ठतो यावदीक्षते वलिताननः।
तावद्धूमशिखं पश्चादागतं तं ददर्श सः ॥१४१॥
चिक्षेप चाशु मार्गेऽस्य मृत्तिकां तां स्वपृष्ठतः।
क्षिप्तमात्रं तया मध्ये सद्योऽभूत्पर्वतो महान् ॥१४२॥
तमुल्लङ्घ्य कथञ्चित्तमागतं वीक्ष्य राक्षसम्।
तथैव पृष्ठतस्तोयं तत्स राजसुतोऽप्रक्षिपत् ॥१४३॥
तेन तत्रान्तरा जज्ञे वेल्लद्वीचिर्महानदी।
तामप्युत्तीर्य कथमप्यागतेऽस्मिन्निशाचरे ॥१४४॥
शीघ्रं शृङ्गभुजः पश्चात्कण्टकांस्तामवाकिरत्।
तैर्बभूव गहनं वनं मध्ये सकण्टकम् ॥१४५॥
ततोऽपि निर्गते तस्मिन् राक्षस्यग्निं स्वपृष्ठतः।
अहो तेन स जज्वाल मार्गं सत्तृणकाननम् ॥१४६॥
तं वीक्ष्य साण्डबमिव ज्वलितं दुरतिक्रमम्।
ययौ धूमशिखः खिन्नो भीतश्च स यथागतम् ॥१४७॥
सदा रूपसिखामायामोहितः स हि राक्षसः।
पद्भ्यामागावगाञ्चैव न सस्मार मनोजवित्वम् ॥१४८॥

सप्तम लम्बक १११

सप्तम लम्बक १११
यदि तुम्हें पीछा करता हुआ धूमशिख दीख पड़े तो तुम अपने पीछे उसके मार्ग में
मिट्टी फेंक देना ॥१३४॥
उसके अनन्तर भी यदि वह पीछा करता हुआ दीख तो तुम अपने पीछे के मार्ग में पानी
छोड़ देना। फिर भी आवे तो उन काँटों को पीछे फेंक देना और फिर भी पीछा करे तो आग को
पीछे की ओर फेंकना ॥१३५-१३६॥
ऐसा करने से तुम बिना कष्टके वहाँ आ जाओगे । मुझसे न डरो, जाओ। तुम
आज मेरी विद्या का बल देखोगे ॥१३७॥
शशिशास्त्र लेता हुआ गुणशुभ्र मिट्टी पानी आग आदि लेकर घोड़े पर सवार
होकर जंगल में स्थित मन्दिर में पहुँचा ॥१३८॥
उस मन्दिर में उसने काँटों और चोटी एवं दाढ़ी वाले गणेश को फल दिखलाकर सिर
को ढूँगा और प्रणाम करके अभिवादन का उल्लेख बताया ॥१३९॥
और, धूमशिख को नियम की बात कहकर राजकुमार शान्त होकर चुप हो
गया॥१४०॥
क्षण भर में ही जब उसने शब्द सुनाई दी दया कि धूमशिख पीछे-पीछे
आ रहा है॥१४१॥
तब उसने अपने पीछे उस दानव के मार्ग में मिट्टी फेंक दी। क्या हुआ मिट्टी से रास्ते
में बड़ा-सा पहाड़ बन गया॥१४२॥
उस पहाड़ को लाँघकर जब वह दानव का लड़का राजकुमार के पीछे दौड़ने लगा
तब ॥१४३॥
उस पानी के पड़ते ही मार्ग में बड़ी भारी तरंगों वाली अथाह बड़ी नदी बन
गयी॥१४४॥
उसने उस बड़ी नदी को भी पार कर लिया। यह देखकर गुणशुभ्र ने शीघ्र ही काँटों
को फेंक दिया। उन काँटों से मार्ग में काँटों से भरा हुआ जंगल बन गया॥१४५॥
दानव-बालक जब उस काँटोंवाले जंगल को पार कर राजकुमार के पास पहुँचा तब उसने
उसके ऊपर आग फेंक दिया ॥१४६॥
उस आग की ज्वाला से सब दिशाओं को घेर लिया। आग के लपटों से जलते हुए उस
दानव-बालक को अपने पिता का स्मरण हुआ ॥१४७॥
उसने अपने पिता का नाम लेकर कहा कि हे पिताजी! मुझे इस आग से बचाइये। तब
उसके पिता ने उससे कहा॥१४८॥

अथ प्रशमन्नन्तस्तत्त्रिपामायाविजृम्भितम् ।
गतमीरायणौ धूमपुरं शृङ्गभुजः स तत् ॥१४९॥
ततो रूपशिखायै तं समर्प्याश्वं निवेद्य च।
यथा कृतं स दृष्टायै जगामाग्निशिखान्तिकम् ॥१५०॥
निमन्त्रितो मया गत्वा भ्राता धूमशिखस्तव।
इत्युक्तवन्तं तं सोऽत्र सभ्रान्तोऽग्निशिखोऽब्रवीत् ॥१५१॥
यदि तत्र गतोऽभूस्त्वमभिज्ञानं तदुच्यताम्।
इति तेनोदितः शृङ्गभुजो जिह्यं जगाद तम् ॥१५२॥
शृण्विह वक्ष्यमभिज्ञानं तत्र देवकुले विभो।
वामेऽस्ति पार्वती पार्श्वे दक्षिणे च विनायकः ॥१५३॥
तच्छ्रुत्वा विस्मितः सोऽग्निशिखः क्षणमचिन्तयत्।
क्व गतोऽपि मद्‌भ्रात्रा शक्तितो नैष साधितुम् ॥१५४॥
तञ्जाने मानुषो नायं देवोऽप्य कोऽपि निश्चितम्।
अनुरूपस्तवेषोऽस्तु मत्सुताया दुहितुर्मम ॥१५५॥
इति सञ्चिन्त्य तं शृङ्गभुजं रूपशिखान्तिकम्।
कृतार्थं व्यसृजत्स्वं तु नाङ्गभेदं विवेद सः ॥१५६॥
स च शृङ्गभुजस्तत्र गत्वा परिरभ्योत्सुकः।
भुक्तपीतस्तया साकं कञ्चिच्चानयन्त्रिथाम् ॥१५७॥
प्रातश्चाग्निशिखस्तस्मै तां स रूपशिखां ददौ।
ऋद्ध्या स्वसिद्धमुचितया विधिवद्वह्रिसाक्षिकम् ॥१५८॥
क्व राक्षससुता कुत्र राजपुत्रः क्व चैतयोः।
विवाहो बत चित्रेयं गतिः प्राक्तनकर्मणाम् ॥१५९॥
स रेजे राजसूनुस्तां प्राप्य रक्षःसुतां प्रियाम्।
पेशलां पङ्कजम्भूतां राजहंसोऽब्जिनीमिव ॥१६०॥
तस्थौ च स तया तत्र सर्वैकभमसा सह।
भुञ्जानो विविधान् भोगाम् रक्षःसिद्धयुपकल्पिताम् ॥१६१॥
गतेष्वथ दिनेष्वत्र तां स रूपशिखां रहः।
मवादीद्देहि गच्छावो वर्धमानपुरं प्रिये ॥१६२॥
सा हि स्वा राजधानी मस्तस्याश्चैवं प्रवासनम्।
परैः सोढुं न शक्नोमि मामप्राणा हि मादृशाः ॥१६३॥