कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
एकादश लम्बक १०३
एकादश लम्बक १०३
हे वत्सराज के नन्दन उसी परम धार्मिक वैश्य का मैं चन्द्रसार नामक पुत्र हूँ जिस उसने
शंकर की आराधना से पाया था ॥२७॥
एक बार मैं मित्रों के साथ देवताओं की यात्रा देखने के लिए गया। वहाँ मैंने दूसरे
धनिकों से दान माँगते हुए भिक्षुको को देखा ॥२८॥
धन देने की श्रद्धा के कारण मुझे धन उपार्जित करने की इच्छा हुई। पिता द्वारा उपार्जित
बहुत लक्ष्मी होने पर भी मैं उससे सन्तुष्ट न था ॥२९॥
इस कारण मैंने समुद्र के मार्ग से दूसरे द्वीपों में जाकर व्यापार द्वारा धन कमाने का
विचार करके विविध रत्नों से भरे व्यापारिक नाव पर यात्रा की ॥४०॥
दैव और वायु के अनुकूल होने से वह मेरी नाव कुछ ही दिनों में निर्दिष्ट द्वीप पर पहुँच
गई ॥४१॥
वहाँ मेरे जवाहरात के व्यापार को धूमधाम से चलते देखकर उस द्वीप के राजा ने मुझ
पर विश्वास न करके धन के लोभ से मुझे बाँधकर कारागार में डाल दिया ॥४२॥
नरक के समान उस कारागार में रोते-कलपते भूख-प्यास से पीड़ित कंकाल-मात्र शेष
प्रेतों के समान कैदियों के साथ मैं कुछ दिनों तक पड़ा रहा ॥४३॥
तब मेरे कुल (वंश) को जाननेवाले वहाँ के महाधनी व्यापारी महीधर ने मेरे लिए
राजा से प्रार्थना की कि 'हे महाराज यह चम्पा-निवासी वैश्यों के चौधरी का बालक है। यह
निर्दोष है, इसे कारागार में रखना आपके लिए निन्दा की बात होगी' ॥४४-४५॥
इस प्रकार समझाने पर राजा ने मुझे कैद से छुड़ाकर और अपने पास बुलाकर आदर
के साथ मेरा सम्मान किया ॥४६॥
तब राजा की कृपा से राजा के मित्र महीधर वैश्य के आश्रय में रहते हुए मैं वहाँ व्यापार
करता हुआ सुखी था ॥४७॥
एक बार उसी द्वीप में मैंने वसन्तकालीन उद्यान-यात्रा में वहाँ के निवासी शिखर नामक
वैश्य की सुन्दरी कन्या को देखा ॥४८॥
कामदेव के दर्प-रूपी समुद्र की लहरी के समान उस कन्या से हरण (आकृष्ट) किया
गया मैं उसके पिता शिखर के पास गया और उससे उस कन्या की माँग की ॥४९॥
इसके पिता ने मन में क्षण भर सोचकर, मुझसे कहा— मैं इसे स्वयं अपने हाथो से दान
नहीं कर सकता। इसमें कुछ कारण है ॥५०॥
इसलिए, मैं इसे सिंहल-द्वीप में इसके मामा के पास भेज देता हूँ तुम वहाँ जाकर उससे
माँगकर इससे विवाह कर लो ॥५१॥