कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
दशम लम्बक १९७
दशम लम्बक १९७
एक भारवाहक (मजदूर) की कथा
महाराज इस नगरी में वसुंधर नाम का एक दरिद्र भारवाहक है। आज वह
अकस्मात् ही लेता-देता और खाता-पीता दीखता है॥७॥
एक बार उसकी इस स्थिति को जानने की इच्छा से मैंने उसे खूब खिला पिलाकर
और नशे में मस्त बनाकर पूछा तो उसने यह बताया—॥८॥
'मैंने राजभवन के द्वार पर रत्नों से भरा एक कंकण (हाथ का आभूषण) पाया
और उसमें से एक रत्न निकालकर मैंने बेच दिया ॥९॥
उस रत्न को मैंने हिरण्यगुप्त नामक जौहरी के पास एक लाख दीनार मूल्य पर
बेचा। इसी कारण मैं आनन्द कर रहा हूँ ॥१० ॥
ऐसा कहकर उसने आपके नाम से अंकित उस कंकण को मुझे दिखाया इसीलिए
मैंने महाराज से निवेदन किया है॥११॥
यह सुनकर मलयराज ने कड़े के साथ उस भारवाहक (मजदूर) को और रत्न के साथ
साथ हिरण्यगुप्त वैश्य को वहाँ बुलवाया ॥१२॥
और, उस कंकण को देखकर राजा ने अपने-आप ही कहा— ओह ! अब स्मरण आ
गया वह कंकण मेरे नगर भ्रमण करते समय हाथ से निकलकर गिर गया था' ॥१३॥
तब सभासदों ने उस भारवाहक से राजा के सामने ही पूछा कि 'राजा के नाम खुदे हुए
इस कंकण को तूने कहाँ से चुराया ? तब वह बोला— बोझा ढोकर जीवन निर्वाह करनेवाला मैं
राजा के नाम के अक्षर को कैसे जान सकता हूँ? दरिद्रता के दुःख से जले हुए मैंने इस ल
लिया ॥१४ १५।।
भारवाहक के ऐसा कहने पर, रत्न खरीदने के अपराधी हिरण्यगुप्त ने कहा 'मैंने बाजार
में बिना जोर दबाव के अधिक मूल्य देकर इस रत्न को इससे खरीदा है' ॥१६॥
इस रत्न पर राजा का कोई चिह्न नहीं है। इसलिए, मैंने खरीदा और इसके मूल्य के
रूप में पाँच हजार रुपये मुझमें लिये ॥१७॥
हिरण्यगुप्त का यह वचन सुनकर वहीं बैठा हुआ राजमंत्री पीताम्बरायण बोला—
'इस विषय में किसी का दोष नहीं है। दरिद्र और निरक्षर भारवाहक का क्या कहा
जा सकता है? दरिद्रता के कारण ही चोरी की जाती है। फिर मिले हुए धन को किसने
छोड़ा है ? ॥१८ १९॥
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