कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
एकादश लम्बक १००१
एकादश लम्बक १००१
तब उस जयेन्द्रसेना नाम की कन्या का वह इस प्रकार ध्यान करने लगा कि दूसरी स्त्रिया
की तो बात ही क्या निद्रा की भी उसने उपेक्षा कर दी ॥२३॥
दूसरे दिन बाणों की विद्या का रहस्य जाननेवाले नरवाहनदत्त ने पातक द्वारा लाये गये
वायु से भी अधिक वेगवाले घोड़ों को देखा और स्वयं रुचिरदेव द्वारा लाई गई हथिनी पर बैठकर
विद्या के प्रभाव से उसमें अधिक वेग का आधान करके हथिनी को घोड़ों से मिला
दिया ॥२४-२५॥
तब रुचिरदेव उन दोनों अश्व-रत्नों को जीत गया। इसके पश्चात् युवराज जैसे ही
रुचिरदेव के घर में प्रवेश कर रहा था कि उसके पिता का एक दूत वहाँ आ पहुँचा। उस बैठकर
दूत ने चरणों में प्रणाम करके यह कहा ॥२६-२७॥
तुम्हें अकस्मात् यहाँ आये हुए जानकर तुम्हारे परिवार के साथ सम्मति करके तुम्हारे
पिता ने मुझे दूत बनाकर यहाँ भेजा है और आज्ञा दी है कि तुम उद्यान से ही बिना सूचना दिये
इतनी दूर क्यों चले गये? हमलोग अधीर हो रहे हैं। इसलिये जिस काम में लगे हो उसे शीघ्र
ही समाप्त करके चले आओ ॥२८-२९॥
पिता के दूत से इस प्रकार सुनता हुआ और नवीन प्रेयसी की प्राप्ति की चिन्ता करता
हुआ वह नरवाहनदत्त कर्तव्य के सन्देह में पड़ गया कि वह क्या करे ॥३०॥
इतने में ही उसी समय अत्यन्त प्रसन्नाचित्त एक व्यापारी आकर दूर से ही नमस्कार करके
युवराज नरवाहनदत्त से बोला—॥३१॥
हे वीर, तुम्हारी जय हो। पुण्य के अनुरूप और पुण्या के द्वारा धारण करनेवाले विद्याधरों
के भावी चक्रवर्ती हे प्रभो तुम्हारी जय हो॥३२॥
हे स्वामिन् बालक होकर भी चित्त को चुरानेवाले और बड़े होकर शत्रुओं का भय इन
दोनों गुणों से तू निःसन्देह रहेगा ॥३३॥
पाताल को जीतकर कमलों स्वयं को जीतता हुआ उत्कृष्ट गुणावाप्त सुने आकाशचारी
लोग भी आश्चर्य हो रहे हैं॥३४॥
इन वचनों से स्तुति करता हुआ और युवराज से सन्तुष्ट बनिया पूछने पर
अपना वृत्तान्त कहने लगा ॥३५॥
व्यापारी और वैश्य की कथा
"समस्त पृथ्वी की मस्तक बाला के समान मध्या नाम की एक नगरी है। उस नगरी में
कुसुमसार नामक एक धनी वैश्य था ॥३६॥
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