कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
११० | कथासरित्सागर
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११० | कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वैव स जिह्रांस्तान् वीर शृङ्गभुजोऽब्रवीत्।
धीरा भवत मा भूद्वो भयं कार्पण्यमुज्झत ॥७४॥
आनेष्यामि शरं गत्वा हत्वा तं राक्षसाधमम्।
इत्युक्त्वा सशरं चापं निजं शृङ्गभुजोऽग्रहीत् ॥७५॥
ययौ च तां समुद्दिश्य दिशं यां स बको गतः।
पतितां रक्तसृग्धारां भूमावनुसरञ्जवात् ॥७६॥
दृष्टेषु तेषु चान्येषु मातृपार्श्वं गतेष्वथ।
गच्छन् स क्रमशः प्राप दूरां शृङ्गभुजोऽटवीम् ॥७७॥
तस्यां ददर्श चिन्वानां वनस्यान्तर्महत्पुरम्।
भोगायोपनतं काले फलं पुण्यतरोरिव ॥७८॥
तत्रोद्यानतरोर्मूले स विश्रान्त क्षणादिव।
आश्चर्यरूपामार्यान्तीमत्र कन्यामवेक्षत ॥७९॥
विरहे जीवितहरां सङ्गमे प्राणदायिनीम्।
विचित्रां निर्मितां धात्रा विषामृतमयीमिव ॥८०॥
शनैरुपागतां तां च चक्षुषा प्रेमवर्षिणा।
पश्यन्तीं तद्गतमना स पप्रच्छ नृपात्मजः ॥८१॥
किं नामधेयं कस्येदं पुरं हरिणलोचने।
त्वं च का किं तवेहागमनं कथ्यतामिति ॥८२॥
ततः साचीकृतमुखी न्यस्तदृष्टिर्महीतले।
सा च जगाद मुदती मधुरस्निग्धया गिरा ॥८३॥
इदं धूमपुरं नाम सर्वसम्पद्गृहं पुरम्।
अस्मिन् वसत्यग्निदिशो नाम राक्षसपुङ्गवः ॥८४॥
तस्य रूपशिखां नाम सबुधी विद्धि मां सुताम्।
इहागतामसामान्यात्त्वद्रूपाद्धृतमानसाम् ॥८५॥
त्वं ब्रूहि मेऽधुना कोऽसि किमिहाभ्यागतोऽसि च।
एवमुक्ते तया तस्मै सर्वं शृङ्गभुजः क्षणम् ॥८६॥
सोऽसौ यन्नामधेयश्च यस्य पुत्रो महीपतेः।
यथा शरनिमित्तेन तद्धूमपुरमागतः ॥८७॥
ततो विदितवृत्तान्ता सा तं रूपशिखाभ्यधात्।
न त्वया सुदृगन्योऽस्ति त्रैलोक्येऽपि धनुर्धरः ॥८८॥
सप्तम लम्बर १११
यह सुनकर वीर शृंगभुज उन कपटियों से बोला—'धीरज रखो। घबराओ मत।
डरो मत। मैं उस नीच राक्षस को मारकर उस बाण को लाऊँगा। ऐसा कहकर शृंगभुज अपने
धनुष-बाण लेकर ज़मीन पर गिरती हुई रक्त-धारा का अनुकरण करता हुआ चला ॥७४-७६॥
इस प्रकार प्रसन्न होकर अन्य राजपुत्रों के अपनी माताओं के समीप चले जाने पर
वह शृंगभुज जिस दिशा को बगुला भागा था उस दिशा की ओर बगुले के पीछे-पीछे जंगल
में चला गया ॥७७॥
उसने उस घोर जंगल में बगुले को खोजते हुए उसके भीतर एक महान् नगर को ऐसे
देखा जैसे मानों पुण्य-रूपी वृक्ष का भोग के लिए आया हुआ फल हो ॥७८॥
उस नगर के उद्यान में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए उसने आश्चर्यमय रूपवाली आती
हुई कन्या को देखा ॥७९॥
विरह में प्राण हरण करनेवाली और संगम म अमृतमयी वह कन्या विधाता ने विचित्र
रूप से विष और अमृत के सम्मिश्रण से बनाई थी ॥८०॥
धीरे-धीरे समीप आई हुई और अमृत बरसानेवाली आँखों से देखती हुई उससे
राजकुमार ने पूछा ॥८१॥
'हे मृगनयनी ! इस नगर का क्या नाम है ? यह नगर किसका है और तू कौन है ?
और यहाँ कैसे आई है। यह सब कहो ॥८२॥
तब मुख को कुछ टेढ़ी की हुई भूमि पर आँखें गड़ाई हुई वह सुन्दर दाँतोंवाली कन्या
मीठी और स्नेह-भरी भाषा में बोली—॥८३॥
यह धूमपुर नामक नगर है। यह समस्त सम्पत्तियों का घर है। इस नगर में राक्षसों में
श्रेष्ठ अग्निदिश नामक राक्षस रहता है ॥८४॥
मैं उसी के नाम के अनुसार रूपवाली रूपशिखा नाम की कन्या हूँ। तुम्हारे असाधारण
रूप से आकृष्ट होकर यहाँ आई हूँ ॥८५॥
अब तुम बताओ कि तुम कौन हो ? और यहाँ कैसे आये हो ? उसके ऐसा कहने पर
शृंगभुज ने अपना अपने पिता का और बगुले पर बाण चलाने आदि का सारा वृत्तान्त कह
सुनाया और बताया कि वह पिता का सुनहरा बाण लाने के लिए धूमपुर आया है ॥८६-८७॥
तब उसके विचार को जानकर रूपशिखा उससे बोली कि तुम्हारे समान धनुर्धारी
तीनों लोक में नहीं है ॥८८॥