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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१४८ | कथासरित्सागर

१४८ | कथासरित्सागर

तदेतद्दर्शितं तुभ्यं युक्त्या प्रत्यक्षतो मया।
भवत्क्षिप्तोऽस्मि संसक्तात् साभिज्ञानं च वर्णितम् ॥१०७॥
तस्मात्तुभ्यं मया राज्यमदायीति मम त्वया।
अहङ्कारो न कर्त्तव्यः स्थाप्यं चेतो न कुत्सितम् ॥१०८॥
विना हि प्राक्तनं कर्म न दाता कोऽपि कस्यचित् ।
आगर्भाज्जन्मसुख्याति पूर्वकर्मतरोः फलम् ॥१०९॥
इत्युक्तः स भिषक तेन राज्ञा दृष्ट्वा तथैव तत् ।
ससन्तोषः पुनर्नैव तत्सेवासुस्थितोऽप्यगात् ॥११०॥
सोऽपि राजाऽथ नातिस्मरस्तं भिषजं ततः ।
सम्मान्यार्थप्रदानेन यथोचितमुदारधीः ॥१११॥
अन्तःपुरैः सुहृद्भिश्च साकं नयजितां महीम्।
भुञ्जानः सुकृतप्राप्तां सुखमास्तामकण्टकाम् ॥११२॥
एवं भवति लोकेऽस्मिन् द्वैधं सर्वस्य सर्वदा।
प्राक्कर्मोपार्जितं जन्तोः सर्वमेव शुभाशुभम् ॥११३॥
तस्मात्त्वमपि न स्वामी मय्येवामान्तराजितः।
संसृज्यत्वेवमस्माकं प्रसन्नोऽस्यन्यथा कथम् ॥११४॥
इत्यपूर्वरमणीयविचित्रां कान्तया सह हसन्कथञ्चित्।
संनिशम्य स कथामुपतिष्ठत् स्नातुमत्र नरवाहनदत्तः ॥११५॥
कृतस्नानो गत्वा निकटमथ वत्सेशनृपतेः
पितुर्मुञ्चन् मातुर्मुहुरमृतवर्षं नयनयोः ।
कृताहारस्ताभ्यां सह सममितो मन्त्रिसहितः
सुखैरापानाद्यैर्दिनमगमयेत्तां च रजनीम् ॥११६॥

इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके षष्ठस्तरङ्गः ।

सप्तमस्तरङ्गः
नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता)

ततश्च रत्नप्रभया समं सद्भावबन्द्धनि ।
स्थितोऽन्येषु कथां कुर्वन्तास्ताः स सचिवैः सह ॥१॥
नरवाहनदत्तोऽथ मन्दिरप्राङ्गणे बहिः ।
अपश्यत्तुङ्गमभ्रंलेहं शुकायातत्विपञ्जरम् ॥२॥

यह सब मैंने युक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष दिखा दिया। और तुम्हारे द्वारा फेंके गये मर्कटकांस
के बारे में भी अभिज्ञान के साथ वर्णन कर दिया। इसलिए, यह राज्य मैंने तुम्हें दिया
था वही अब तुमने मुझे दिया। अतः तुम्हें अहंकार न करना चाहिए और मन को भी दुःखी
नहीं करना चाहिए ॥१७-१८॥
पूर्वजन्म के कर्मों के सिवा कोई किसी को कुछ देनेवाला नहीं है। प्रत्येक प्राणी गर्भ में
प्रवेश के समय से पूर्वजन्म के कर्मों का भोग करता है ॥१ ९॥
उस राजासे इस प्रकार कहा गया वैद्य तपनचन्द्र असन्तोष छोड़कर आनन्द से राजा की
सेवा में तत्पर होगया ॥११ ॥
उस जातिस्मर राजा अजर ने भी उस वैद्य को समुचित धन मान आदि देकर अनुगृहीत
किया ॥१११॥
और, स्वयं मित्रों एव रानियों के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ निष्कण्टक राज्य
करने लगा ॥११२॥
इतनी कथा सुनकर तपन्तक ने युवराज नरवाहनदत्त से कहा 'स्वामी ! इसी प्रकार इस
लोक में सभी प्राणियों का शुभ और अशुभ फल अपन-अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार होता है।
मैं समझता हूँ कि आप हमारे पूर्वजन्म के स्वामी हैं। नहीं तो अन्य बहुतेरों के होते हुए भी आप
हम पर इतने प्रसन्न कैसे होते ? ॥११३-११४॥
इस प्रकार, अपूर्व रोचक एवं विचित्र कथा को अपनी नवीन पत्नी रत्नप्रभा के साथ
तपन्तक के मुँह से सुनकर, नरवाहनदत्त स्नान करने के लिए चला गया ॥११५॥
स्नान करके पिता और माता की आँखों मे अमृत की वर्षा करते हुए नरवाहनदत्त ने
पत्नी और मित्रों के साथ मद्यपान आदि में वह दिन और रात व्यतीत की ॥११६॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरितसागर के रत्नप्रभालम्बक का
षष्ठ तरंग समाप्त
सप्तम तरंग
नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)
तदनन्तर, किसी एक दिन रत्नप्रभा के साथ मणिवेश्म मे विविध बातें करते हुए नरवाहन-
दत्त ने बाहर भवन के चौक में अकस्मात किसी पुरुष का रोना-चिल्लाना सुना ॥१ २॥