सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

८१८ कथासरित्सागर

८१८ कथासरित्सागर
तत्र चैकस्य विप्रस्य निवासायाविशं गृहम्।
स्थितं मयि स विप्रश्च वदति स्म स्वगेहिनीम् ॥९८॥
श्वसर ब्राह्मणकृते पर्वण्यद्य पचेरिति ।
कुडन्तं निर्धनस्यैतदित्यवोचच्च सापि तम् ॥९९॥
ततः स विप्रोऽवादीत्तां प्रिये कार्योऽपि सञ्चये।
नातिसञ्चयधीः कार्या शृणु चात्र कथामिमाम् ॥१००॥
वने क्वापि कृताखेटो व्याधो यन्त्रितसायकः ।
प्रादाय मांसं धनुषि प्राधावत्सूकरं प्रति ॥१०१॥
तेनैव काण्डविद्धेन निहतः पोत्रिणाक्षत' ।
स न्यपतत् तच्चात्र दूरादंशत जम्बुकः ॥१०२॥
स सागरस्य क्षुधार्त्तोऽपि चिकीर्षुः सञ्चयाय सतः।
श्रोऽभ्यापामियात् विच्छिन्नं श्वादादतिभूयसः ॥१०३॥
स्नाक्तुं प्रवृत्तं सत्तु गत्वा धनुषि यन्त्रितम्।
तत्क्षणं बाष्पलग्नत्रगविद्धा ममार सः ॥१०४॥
तन्नातिसञ्चयः कार्य इति तत्र द्विजन्मना।
भार्योक्ता प्रतिपर्यततिलान् प्राक्षिपदातपे ॥१०५॥
प्रविष्टायां गृहं तस्यां प्राद्य श्वा तान्दूषयत्।
तथा न धूषगनान्वद्भिर्मूल्यान्निग्राह्यहीत् ॥१०६॥
तस्यै नागाभागाय लाभ वरणाय वयसम्।
व्युक्त्वा पुनर्गृहं स्म प्रदाहामन्तुरोथ सः ॥१०७॥
गनित्रमग्निं शशं क्षीयतां याञ्च यः ।
युक्त्या निवारयाम्येनं मूषाद्यमुपदंशम् ॥१०८॥
मन्त्रणा मन्त्रिरागो स प्रहारम् गनित्राम्।
ददर्श न च्छत्रग्यम्बर् दृष्ट्वा प्रादित विन्दूम् ॥१०९॥
ततस्तन गनित्रण प्रहारान्नुरोथ सः।
मण्डलार्विर् योग श्रारभ गनित्र शरम् ॥११०॥
रमारूय गालभन्तर् पतायनार मति।
पादल द्वार गग्य तार स पादयत्मयम् ॥१११॥
गज्जा शत शलाधनागानन्दान् परम्।
ज्ज्ञा गनित्रं न च प्रहार यदि भूत्वा ॥११२॥
१ ततस्तेनैव ।

प्रथम तन्त्रम् ८२१
इस प्रकार, वह साधु मेरा सर्वस्व लेकर और हार का सिर पर रख लिया। तदनन्तर
दोनों साधु निश्चिन्त होकर सो गये ।।११३।।
उन दोनों के प्रसन्न होकर सो जाने पर भोजन चुराने के लिए पुनः आये हुए मुझे स्थायी
साधु ने जगकर छड़ी से मेरे सिर पर मारा ।।११४।।
उस प्रहार से आहत मैं बिल में भाग गया किन्तु भाग्यवश मरा नहीं। उसके पश्चात्,
मुझमे उछलकर उससे भोजन लेने की शक्ति नहीं रह गई ।।११५।।
धन ही पुरुषों का यौवन है और धन का अभाव ही बुढ़ापा है। धन के अभाव से मनुष्य
का ओज तेज बल और रूप नष्ट हो जाता है।।११६।।
तदनन्तर, केवल अपने पेट भरने का यत्न करने में ही किसी प्रकार समर्थ देखकर मेरे सभी
साथी मुझे छोड़कर चले गये ।।११७।।
जीवन-निर्वाह न कर सकनेवाले स्वामी को सेवक पुष्पहीन वृक्ष को भ्रमर, जल-रहित
सरोवर को हंस चिरकाल तक उसका आश्रय पाकर भी छोड़ देते हैं।।११८।।
इस प्रकार, वहाँ बहुत समय से रूठा हुआ मैं इस लघुपती कौए की मित्रता पाकर
हे कण्ठश्रेष्ठ यहाँ तुम्हारे पास आ पहुँचा ।।११९।।
हिरण्यक के ऐसा कहने पर मन्थरक कछुआ बोला--मित्र यह तुम्हारा अपना ही स्थान
है। अतः तुम अधीर न होना ।।१२ ।।
गुणी के लिए कोई विदेश नहीं है। सन्तोषी के लिए कोई दुःख नहीं। धैर्यशाली के लिए
कोई विपत्ति नहीं और उद्योगी के लिए कोई कार्य असाध्य नहीं ।।१२१।।
कछुआ जब इस प्रकार कह ही रहा था कि बहेलिये से डरा हुआ चित्रांगद नाम का एक
हिरण दूर से उस वन में आ पहुँचा ।।१२२।।
उसे देखकर और उसके पीछे बहेलिये को न आते देखकर उसे धीरज बँधाकर कौए
कछुए आदि मित्रों ने उसके साथ भी मित्रता कर ली ।।१२३।।
परस्पर एक दूसरे की सहायता करते हुए वे चारों सु-हृदय मित्र सुखपूर्वक उस वन
में साथ ही रहने लगे ।।१२४।।
एक बार बहुत देर तक चित्रांगद को न आते हुए देखकर, उसे देखने के लिए वह
लघुपती कौआ ऊँचे वृक्ष पर चढ़कर चारों ओर उस वन को देखने लगा ।।१२५।।
और उसने नदी के एक किनारे पर बील और जाल में बँध हुए चित्रांगद को देखा। आकर
यह समाचार उसने चूहे तथा कछुए से कहा ।।१२६।।
तब आपस में विचार कर कौआ उस हिरण्यक चूहे को साथ ले जाकर बँधे हुए चित्रांगद
के पास ले गया ।।१२७।।

नीत्वा च तन्मे सर्वस्वं हारं मूर्ध्नि निधाय च।
आगन्तुस्थायिनौ हृष्टौ प्रव्राजौ स्वपतः स्म तौ ॥११३॥
प्रसुप्तयोस्तयोस्त्वं च हर्तुं मां पुनरागतम्।
प्रबुद्ध्याताडयद्यष्ट्या प्रद्राट् स्थायी स मूर्ध्नि मे ॥११४॥
तेनाहं व्रणितो दैवान्न मृतो बिलमाविशम्।
भूयश्च शक्तिर्नाभून्मे तदन्नाहरणप्लवे ॥११५॥
अर्थो हि यौवनं पुंसां तदभावश्च वार्द्धकम्।
तन्नाश्योजो बलं रूपमुत्साहश्चापि हीयते ॥११६॥
अथात्ममात्रभरणे यत्नवन्तमवेक्ष्य माम्।
परित्यज्य गतं सर्वं स मूषकपरिच्छदः ॥११७॥
अवृत्तिकं प्रभुं भृत्या अपुष्पं भ्रमरास्तरुम्।
अजलं च सरो हंसा मुञ्चन्त्यपि चिरोषितम् ॥११८॥
इत्थं तत्र चिरोद्विग्नः सुहृदं लघुपतिनम्।
प्राप्यैतं कच्छपश्रेष्ठं त्वत्पार्श्वमहमागतः ॥११९॥
एवं हिरण्यकेनोक्ते कूर्मो मन्थरकोऽभ्यधात्।
स्वमत्र स्थानमत्से तन्मा मित्राधृतिं कृथाः ॥१२०॥
गुणिनो न विदेशोऽस्ति न सन्तुष्टस्य चासुखम्।
धीरस्य च विपन्नास्ति नासाध्यं व्यवसायिनः ॥१२१॥
इति तस्मिन् वदत्येव कूर्मे चित्राङ्गसंज्ञकः।
दूरतो व्याधवित्रस्तो मृगस्तद्भवनमाययौ ॥१२२॥
तं दृष्ट्वा तस्य दृष्ट्या च पश्चाद् व्याधमनागतम्।
आश्वासितेन तेनापि सख्यं कूर्मादयो व्यधुः ॥१२३॥
न्यवसस्ते ततस्तत्र काककूर्ममृगाखवः।
परस्परोपकारेण सुखिनः सुहृदः समम् ॥१२४॥
एकदा क्वापि चित्राङ्गं चिरायातं तमीक्षितुम्।
आरुह्य तरुमशिष्टं लघुपती स तद्वनम् ॥१२५॥
ददर्श च नदीतीरे कीलपाशेन संयतम्।
चित्राङ्गमवदच्चैतत्तत्त्वदत्त्वाऽलुकूर्मयोः ॥१२६॥
तत सम्मन्त्र्य चञ्च्वा तं गृहीत्वाऽमुं हिरण्यकम्।
चित्राङ्गस्यान्तिकं तस्य लघुपती निनाय सः ॥१२७॥