कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम लम्बक ४५५
नवम लम्बक ४५५
तदनन्तर पिता ने उसका नाम अलंकारवती रखा और वह क्रमशः चन्द्रकला के समान
बढ़ने लगी ॥२२॥
वह कन्या क्रमशः यौवनावस्था को प्राप्त कर, और पिता से विद्याओं को सीखकर,
शिवभक्ति के कारण उन-उन शिव-मन्दिरों में भ्रमण करने लगी ॥२३॥
इसी अवसर पर इसके बड़े भाई धर्मशील ने युवा होने पर भी एक बार एकान्त में
पिता से इस प्रकार निवेदन किया—॥२४॥
'हे पिता ! ये क्षण-भंगुर सांसारिक भोग मुझे प्रसन्न नहीं करते। संसार में वह क्या है
जो अन्त में नीरस नहीं हो जाता ॥२५॥
और, क्या तुमने व्यास मुनि का यह वचन नहीं सुना है कि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन
सभी का अन्त विनाश है। और, जितनी उन्नति है, उस सभी का अन्त पतन है ॥२६॥
सभी संयोगों का अन्त वियोग है और जीवन का अन्त मरण है। इसलिए, हे पिता,
निश्चित रूप से विनाशवान् इन पदार्थों में मनस्वी विद्वानों को क्या प्रेम ? ॥२७॥
सांसारिक भोग और धन का संग्रह परलोक में सहायक नहीं हो सकते। अर्थात्,
ये यहीं नष्ट हो जाते हैं॥२८॥
इसलिए, मैं वन में जाकर सर्वोत्तम तप करता हूँ जिसके द्वारा परम पद (मोक्ष) को
प्राप्त कर सकूँ' ॥२९॥
राजा अलंकारशील पुत्र धर्मशील को इस प्रकार कहते हुए सुनकर व्याकुल हो उठा
और आँखों में आँसू भरकर बोला—॥३०॥
पुत्र इस समय (यौवनकाल) में ही तुम्हें यह क्या बुद्धि भ्रम हो गया ! विद्वान् लोग
युवावस्था का उपभोग हो जाने पर ही वैराग्य की कामना करते हैं ॥३१॥
यह समय विवाह करके धर्मपूर्वक राज्य के पालन करने का है। यह तुम्हारे लिए सांसारिक
भोगों के भोगने का समय है, वैराग्य का नहीं' ॥३२॥
पिता के इस प्रकार वचन सुनकर धर्मशील फिर कहने लगा-'भोग और विराग का नियम
वयस्था पर निर्भर नहीं है। ईश्वर की कृपा से अनुगृहीत कोई बालक भी विरक्त हो जाता है,
किन्तु कोई कुत्सित पुरुष वृद्ध होने पर भी विरक्त नहीं हो पाता ॥३३-३४॥
राज्य पर मेरा प्रेम नहीं है और न मैं विवाह ही करना चाहता हूँ। शिव की आराधना
करके तप करना ही मेरे जीवन का मुख्य ध्येय है ॥३५॥
ऐसा कहते हुए और विविध प्रयत्नों से भी न मानते हुए पुत्र को पिता ने आँसू बहाते
हुए कहा—॥३६॥
यदि यूनोऽपि ते पुत्र वैराग्यमिदमीदृशम् ।
नास्ति वृद्धस्य मे सक्तिर्महमप्याश्रये वनम् ॥३७॥
इत्युक्त्वा मर्त्यलोकं च गत्वा भारायुतं ददौ ।
ब्राह्मणेभ्यो दरिद्रेभ्यो रत्नानां काञ्चनस्य च ॥३८॥
एत्य च स्वपुरं भार्यामुवाचैतत्काञ्चनप्रभाम् ।
त्वया मदाज्ञयैहैव स्थातव्यं नगरे निजे ॥३९॥
रक्षालङ्कारवत्येषा कन्या पूर्णे च वत्सरे ।
अस्ति यैवाह्नोऽस्यास्तिष्याख्यतने शुभे ॥४०॥
नरवाहनदत्ताय दास्याम्येतामहं तदा ।
स चक्रवर्ती जामाता पास्यतीदं पुरं च नः ॥४१॥
इत्युक्त्वा दत्तशपथां भार्यां राजा निवर्त्य सः ।
ससुतां विलपन्तीं तां सपुत्रः शिश्रिये वनम् ॥४२॥
सा तु स्वपुरमभ्यास्त तत्र भार्या काञ्चनप्रभा ।
दुहित्रा सह साध्वी स्त्री भर्त्राज्ञां का हि लङ्घयेत् ॥४३॥
सस्नुता च तया मात्रा सह स्नेहानुयातया ।
अलङ्कारवती भ्रान्ता बहून्यायतनानि च ॥४४॥
एकदा तां च वक्ति स्म विद्या प्रज्ञप्तिसंज्ञिका ।
कश्मीरेषु स्वयम्भूणि गत्वा क्षेत्राणि पूजय ॥४५॥
नरवाहनदत्तं हि निर्विघ्नं त्वं पतिं ततः ।
सर्वविद्याधरेन्द्रैकचक्रवर्तिनमाप्स्यसि ॥४६॥
इत्युक्ता विद्यया गत्वा काश्मीरात्सा समातृका ।
अलङ्कारवती शम्भुं पुण्यक्षेत्रेष्वपूजयत् ॥४७॥
नन्दिक्षेत्रे महादेवगिरावमरपर्वते ।
सुरेश्वर्याद्रिषु तथा विजये कपटेश्वरे ॥४८॥
एवमादिषु सम्पूज्य क्षेत्रेषु गिरिजापतिम् ।
विद्याधरेन्द्रकन्या सा तन्माता चागते गुहाम् ॥४९॥
तामेतां विद्ध्यलङ्कारवतीं सुभग कन्यकाम् ।
तां च मातरमप्येतस्या विद्धि मां काञ्चनप्रभाम् ॥५०॥
अद्य चैषा ममानुक्त्वेवागतेमं शिवालयम् ।
तत प्रज्ञप्तिविद्यातो विज्ञाय्याहमिहागता ॥५१॥
'बेटा यदि तुम्हारी इस अवस्था में ही तुम्हें वैराग्य हुआ है तो क्या वह मुझ वृद्ध को
नहीं होगा ? अतः मैं भी वन में जाऊँगा' ॥३७॥
ऐसा कहकर और मर्त्यलोक में जाकर राजा ने ब्राह्मणों को रत्नों और सुवर्णों के दस
हजार भार दान में दे दिये ॥३८॥
और, अपने नगर में आकर पत्नी कांचनप्रभा से कहा कि 'तुम्हें मेरी आज्ञा से
इसी नगर में रहना होगा ॥३९॥
यहाँ रहकर इस कन्या अलंकारवती की रक्षा करनी होगी और समय आने पर, एक
वर्ष पूरा होने पर,—क्योंकि आज का दिन ही उसके विवाह के लिए शुभ है। यही दिन इसके
विवाह के शुभ लग्नवाला है—इसी दिन मैं स्वयं आकर इसे जामाता नरवाहनदत्त के लिए
दूँगा। वह चक्रवर्ती जामाता हमारे इस नगर की रक्षा करेगा' ॥४०-४१॥
ऐसा कहते हुए राजा रोती हुई पत्नी और पुत्री को धपय देकर और उन्हें अपने घर
छोड़कर स्वयं पुत्र के साथ वन को चला गया ॥४२॥
तब वह रानी कांचनप्रभा अपनी कन्या के साथ अपने नगर में ही रहने लगी। सच है
कौन पतिव्रता स्त्री पति की आज्ञा का उल्लंघन कर सकती है ॥४३॥
तब राजा मलंकारशील की वह कन्या अलंकारवती स्नेह के साथ तीर्थयात्रा करती हुई
अपनी माता के संग बहुत-से शैव तीर्थों का भ्रमण करने लगी ॥४४॥
एक बार उस अलंकारवती को प्रज्ञप्ति नामकी विद्या ने कहा कि कश्मीर में बहुत
से स्वयंभू तीर्थ हैं। उनमें जाकर तप पूजन आदि करो। तब तुम विद्याविष के सब विद्याधरों
के चक्रवर्ती नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त कर सकोगी ॥४५ ४६॥
विद्या के द्वारा ऐसा आदेश मिलने पर अलंकारवती ने माता के साथ कश्मीर जाकर
अनेक पुण्यतीर्थों में शिव की पूजा की ॥४७॥
नन्दिक्षेत्र में महादेव पर्वत पर, अमर पर्वत पर, सुरेश्वरी पर्वत पर, विजय पर्वत तथा
कपटेश्वर आदि क्षेत्रों में पार्वती-पति शिव की पूजा करके वह कन्या और उसकी माता अपने
घर लौट आई ॥४८ ४९॥
हे सुभट, इस कन्या को तुम वही अलंकारवती समझो और मुझे उसकी माता
कांचनप्रभा ॥५०॥
आज यह अलंकारवती मुझे बिना कहे ही यहाँ चली आई। मैंने भी प्रज्ञप्ति विद्या के
प्रभाव से इसका यहाँ आना जानकर, यहाँ आ गई हूँ ॥५१॥
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