सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१८८ कथासरित्सागर

१८८ कथासरित्सागर
प्राप्तं तं तत्र बुद्ध्वा सा श्रुताश्वजर्यरथस्वना ॥
दमयन्ती जहर्षान्तः सम्भावितनलागमा ॥ ३९० ॥
विससर्जाथ सा तन्मन्वेष्टुं चेटिकां निजाम् ।
सा चान्विष्यागता चेटी तामुवाच प्रियोत्सुकाम् ॥ ३९१ ॥
देवि गत्वा मयान्विष्टमेष यः कोशलेश्वरः ।
स्वयंवरप्रवादं तं मिथ्या श्रुत्वा किलागतः ॥ ३९२ ॥
आनीतो रथवाहेन सूदेन ह्रस्वबाहुना ।
एकेनैव दिनेनाश्व रथविज्ञानशालिना ॥ ३९३ ॥
स च तत्सूपशालायां गत्वा सूदो मयेक्षितः ।
कृप्णवर्णो निरुपमश्च प्रभावः कोऽपि तस्य तु ॥ ३९४ ॥
विक्षिप्तमेव यत्तस्य पानीयं परपूरितम् ।
काष्ठान्यनर्पिताग्नीनि स्वयं प्रज्वलितानि च ॥ ३९५ ॥
क्षणाच्च भोजनैस्तैस्तन्निष्पन्नं दिव्यमेव च ।
एतद्बुद्ध्वा महाश्चर्यं ततस्त्वहमिहागता ॥ ३९६ ॥
एतच्चेटीमुखाच्छ्रुत्वा दमयन्ती व्यचिन्तयत् ।
वश्याग्निवरुणः सूदो रथविद्यारहस्यवित् ॥ ३९७ ॥
आर्यपुत्रो भवेत्येष गतो वैरुप्यमन्यथा ।
जाने मद्धिप्रयोगात्तं जिज्ञासुरुह रूप्यमूमू ॥ ३९८ ॥
इति सङ्कल्प्य युक्त्वा स्त्रीं राहू चेट्या तयैव सा ।
तस्यान्तिकं दर्शयितुं प्राहिणोद्दारकावुभौ ॥ ३९९ ॥
स तौ निजशिशू बुद्ध्वा कृत्वा धाङ्क तरुश्चिरम् ।
गलद्वाराप्रवाहेण तूष्णीमरुददक्षुणा ॥ ४०० ॥
ईदृशावेव मे बालो मातामहगृहे स्थितौ ।
जातं मे तत्स्मृतैर्वृत्तभित्युवाच स चेटिकाम् ॥ ४०१ ॥
सा धिच्या सहो गत्वा चेटी सर्वं शशंस तत् ।
दमयन्त्यै ततः सापि जातास्था सुतरामभूत् ॥ ४०२ ॥
अपरेद्युस्ततः सा प्रात स्वचेटीमादिदेश सा ।
गत्वा तमृतुपर्णस्य सूतं मद्वचनाद्वद ॥ ४०३ ॥
श्रुतं मया यदुद्भ्रान्तो सूदो नान्यतोऽस्ति सूपकृत् ।
तन्ममार्थ स्वयागत्य व्यञ्जनं साध्यतामिति ॥ ४०४ ॥

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

आश्चर्यजनक रथ की ध्वनि को सुनकर नल के आने की सम्भावना करती हुई दमयन्ती
हृदय से प्रसन्न हुई ॥३९०॥
तदनन्तर उसने वास्तविक बात जानने के लिए उसके पास एक दासी को भेजा। वह दासी
सब जानकर नल के लिए उत्सुक दमयन्ती से बोली—॥३९१॥
हे देवि मैंने जाकर पता लगाया कि यह राजा ऋतुपर्ण तेरे झूठे स्वयंवर का निमन्त्रण
पाकर आया है। उसे ह्रस्वबाहु नाम का सारथी एक दिन में ही यहाँ ले आया है। क्योंकि
वह रथ-संचालन-विज्ञान का विशेषज्ञ है॥३९२-३९३॥
तो मैंने रसोईघर में जाकर उस रसोइए को देखा। वह काले रंग और विकृत रूप का
कोई व्यक्ति है॥३९४॥
उसका चमत्कार मैंने देखा कि उसने चावलों में पानी नहीं डाला था किन्तु उसमें स्वयं
पानी आ गया लकड़ियों में आग न लगाने पर भी लकड़ियाँ अपने-आप जल उठीं और पलक मारते
ही उसने अनेक प्रकार के दिव्य भोजन तैयार कर दिये। यह सब देखकर मुझे बहुत आश्चर्य
हुआ और मैं यहाँ आई ॥३९५-३९६॥
दासी के मुँह से यह सब सुनकर दमयन्ती सोचने लगी— अग्नि और जल जिसके वश में हों
और जो रथ-विद्या के रहस्य को जानता है, आर्यपुत्र (नल) इतना विकल कैसे हो गया। मैं
समझती हूँ मेरे वियोग से पीड़ित होने के कारण ऐसा हुआ होगा। तो मैं अब उसी से पूछती
हूँ ॥३९७-३९८॥
ऐसा सोचकर दमयन्ती ने उस दासी के साथ आने वाले बच्चों को नल के पास
भेजा ॥३९९॥
उन्हें देखकर और दोनों बच्चों को गोद में रखकर बहुत समय तक धारा प्रवाह आँसू बहाते
हुए नल मौन रोता रहा ॥४००॥
कुछ समय बाद वह चेटी (दासी) से बोला—ऐसे ही मेरे दो बच्चे अपने नाना के
घर में हैं। उन्हें स्मरण करके मुझे दुःख हुआ ॥४०१॥
तब उस दासी ने उन बच्चों के साथ लौटकर दमयन्ती को सारा समाचार सुनाया।
तब दमयन्ती का भी पूर्ण विश्वास हो गया ॥४०२॥
दूसरे दिन प्रातःकाल उसने दासी को आज्ञा दी कि तू जाकर राजा ऋतुपर्ण के रसोइए
से कह दे—॥४०३॥
कि मैंने सुना है तेरे समान दूसरा कोई रसोइया नहीं है अतः आज तू मेरे यहाँ आकर
भोजन बना ॥४०४॥
८२