कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
४१८ कथासरित्सागर
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४१८ कथासरित्सागर
इत्युक्त्वान्तर्दधे सूर्यप्रभेणाभ्यर्थिता जया।
अत्रैवाह्नि सुमेरुश्च लग्नं निश्चितवान्ध्रुवम्॥१२९॥
वेदीमकारयत्सोऽथ सप्तरत्नस्तम्भकुट्टिमाम्।
युक्तां तद्रश्मिजालेन पिहितेनेव वह्निना ॥१३०॥
आनाययामास च तां कामचूडामणिं सुताम् ।
निपीयमानलावण्यां सोत्कैर्देवासुरैर्दृशा ॥१३१॥
उमा हिमवतो जाता जाता सेयं सुमेरुतः ।
इतीव तत्समानेन सौन्दर्येण समाभिताम् ॥१३२॥
ततो वेदीं समारोप्य कृतकौतुकशोभिताम्।
प्रसाधितां सुमेरुस्तां ददौ सूर्यप्रभाय सः ॥१३३॥
सूर्यप्रभश्च जग्राह कामचूडामणेस्तदा।
दनुप्रभृतिभिर्वेदकङ्कण पाणिपङ्कजम् ॥१३४॥
ददौ लाजविसर्गे च प्रथमे तत्क्षणागता।
जया भवानीप्रहिता दिव्यां मालाममश्वरीम् ॥१३५॥
सुमेरुश्चाप्यनर्घाणि रत्नानि प्रददौ तदा।
ऐरावणात्समुत्पन्नं दिव्यं च वरवारणम् ॥१३६॥
द्वितीये लाजमोक्षे च जया रत्नावलीमदात्।
यया कण्ठस्थया मृत्युः क्षुत्तृष्णा च न बाधते ॥१३७॥
सुमेरुश्च ददाति स्म त्रिगुणं रत्नसञ्चयम्।
उच्चैःश्रवसःप्रसूतं च हयरत्नमनुत्तमम् ॥१३८॥
लाजमोक्षे तृतीये च ददावेकावलीं जया।
यौवनं क्षीयते नैव यया कण्ठावलम्बया ॥१३९॥
सुमेरुस्त्रिगुणं राशिं रत्नानां प्रचितीय च।
दत्तवान्गुलिकां दिव्यां सर्वसिद्धयुपयोगिनीम् ॥१४०॥
ततो विवाहे निर्वृत्ते सुमेरुः ससुरासुरान्।
विद्याधरान्देवमातॄः सर्वानैवं व्यजिज्ञपत् ॥१४१॥
भोक्तव्यमद्य युष्माभिः सर्वैरैष गृहे मम।
अनुग्रहश्च कर्तव्यो बद्धो मूर्ध्नि मयाञ्जलिः ॥१४२॥
एवमभ्यर्थनां तस्य सुमेरोः सर्व एव ते।
यावत्प्रेच्छन्ति तावच्च मन्दी तत्रागतोऽभवत् ॥१४३॥
सूर्यप्रभ द्वारा सम्मानिता जया इतना कहकर अन्तर्हित हो गई। सुमेरु ने भी उसी दिन
शीघ्रता पूर्वक लग्न का निश्चय किया और वहीं पर उत्तुंग महामूल्य रत्नों के स्तम्भों तथा छतों
से युक्त सुन्दर वेदी बनवाई। रत्नों की चमकीली लाल किरणों से मानों वेदी सब ओर से
अग्नि द्वारा छाई हुई-सी लग रही थी ॥१२९-३१ ॥
वहीं उसने अपनी सुन्दरी कन्या कामचूड़ामणि को बुलवाया जिसके लावण्य को चंचल
होकर देवता और असुर सभी अपने नेत्रों से पी रहे थे ॥१३२॥
उमा हिमालय से उत्पन्न हुई थी और यह सुमेरु से। मानो इसीलिए वह पार्वती के
समान सुन्दरी थी ॥१३३॥
तदनन्तर, विवाह-वेश में सजी हुई कन्या को सुमेरु ने वेदी पर बैठाकर उसे सूर्यप्रभ को
प्रदान कर दिया ॥१३४॥
सूर्यप्रभ ने भी तन्तु आदि के द्वारा बाँधे गये कामचूड़ामणि के हाथ को ग्रहण
किया ॥१३५॥
पहले लाजा-होम के समय उसी क्षण आई हुई और पार्वती द्वारा भेजी गई जया ने
मन्दरो नाम की दिव्य माला उसे प्रदान की। सुमेरु ने भी अनन्त और अमूल्य रत्न उस अवसर
पर प्रदान किए और ऐरावत से उत्पन्न सुन्दर हाथी भी प्रदान किया ॥१३६-१३६॥
दूसरे लाजा-होम के समय जया ने एक रत्नों की माला भेंट की जिसके गले में रहने पर
मृत्यु, भूख और प्यास का कष्ट नहीं होता था ॥१३७॥
सुमेरु ने भी पहले से अधिक धनराशि और उच्चैश्रवा से उत्पन्न घोड़े का बच्चा
प्रदान किया ॥१३८॥
तीसरे लाजा-हवन के समय जया ने मोतियों की एक लड़ीवाली माला दी। जिसके गले
में रहने से यौवन का क्षय नहीं होता था ॥१३९॥
और, सुमेरु ने भी तिगुनी धनराशि और सब प्रकार की सिद्धियों के उपयोग में आनेवाली
एक अँगूठी दी ॥१४० ॥
इस प्रकार, विवाह-संस्कार पूर्ण होने पर सुमेरु ने सुरों असुरों विद्याधरों और दैवमाताओं
से इस प्रकार निवेदन किया ॥१४१॥
आज आप लोगों को मेरे घर पर भोजन करना चाहिए और मुझ पर कृपा करनी चाहिए।
मैं सिर पर अंजलि बाँधकर आप लोगों से निवेदन करता हूँ ॥१४२॥
उन सब ने जब भोजन करना न चाहा, तब शिवजी का नन्दी वहाँ आकर
उपस्थित हुआ ॥१४३॥