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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

६४ कथासरित्सागर

६४ कथासरित्सागर

व्रजाम इति जल्पित्वा पतित्वा सोऽस्य पादयोः।
राज्ञः प्रसङ्गतो निरगात् मन्त्रिद्वययुतस्ततः ॥२१॥
महो पुत्रेष्वपि बद्धास्था सेवका मे दृढा इमे।
सर्वत ममन त्याज्या इति सञ्चिन्त्य तत्क्षणम्॥२२॥
स राजा तान् प्रसङ्गादीनानाय्यैव तथा धनैः।
अपूरयद्यथा भूयो नतान् दारिद्र्यमस्पृशत्॥२३॥
एवं विचित्रा दृश्यन्त स्वभावा देव वहिनाम्।
यत्कार्ये स नृपो नादावकाल तु ददौ तथा॥२४॥
इत्याख्याय कथास्थानपटुर्भूयः स गोमुखः।
वत्सेश्वरसुतादेशादिमामक्कथयत्कथाम् ॥२५॥

राज्ञः कनकवर्षस्य कथा

आसीद् गङ्गातटे पूर्व पूतपौरं तदम्बुभिः।
सौराज्यरम्यं कनकपुराख्यं नगरोत्तमम्॥२६॥
यत्र बन्धः कविगिरां छव पत्रेष्वदृश्यत।
भङ्गोऽलकेषु नारीणां सम्यक्संग्रहणे खलः॥२७॥
तत्र वासुकिनागेन्द्रतनयात् प्रियदर्शनात्।
जाता यशोधराख्यायां राजपुत्र्यां महायशाः॥२८॥
आसीत् कनकवर्षाख्यो नगरे नृपतिः पुरा।
हरत्नभूभारवोढापि योऽशेषगुणभूषितः॥२९॥
मुग्धो यशसि न त्वर्थे भीतः पापान्न शत्रुतः।
मूर्खः परापवादेषु न च शास्त्रेषु योऽभवत्॥३०॥
अल्पस्य यस्य कोपोऽभून्न प्रसादः महार्घ्यतः।
चापे च बद्धमुष्टित्वं न दाने धीरचेतसः॥३१॥
यमात्यदम्भुसम्पन्नं रक्षता चाखिलं जगत्।
मारव्यथाकुलं चक्र दृष्टेनैवावलाजनः॥३२॥


१ काव्येष्वेव गोमूत्रिकाकमलादयो बन्धा दृश्यन्ते स्मतापराधिनां बान्धवमभूत्।
राज्येऽपराधाभावात्।
२ खलः -यत्र ह्वलंकैस्तरंतंगृहः क्रियते क्षेत्रादानीप। अन्यत्र खतो दुर्जनं मूर्तः।
३ अनिर्णीतव्येति भावः।

मदन मञ्चुक ६५
हम सब जाते हैं। ऐसा कहकर और राजा के पैरों में पड़कर वह प्रसंग अपने दोनों साथिया
के साथ निकलकर चला गया ॥२१॥
ओह ! ये मेरे सेवक मेरे पुत्र पर भी आशा बाँध हुए थे अतः इन्हें न छोड़ना चाहिए,
इस प्रकार राजा उसी समय सोचने लगा ॥२२॥
और, उन प्रसंग आदि सेवकों को बुलाकर उसने धन से इतना भर दिया कि फिर
उन्हें दरिद्रता ने कभी छुआ तक नहीं ॥२३॥
महाराज ! मनुष्यों के इस प्रकार विचित्र स्वभाव देखे जाते हैं कि राजा ने उत्सव
आदिदान के अवसरों पर तो उन सेवकों को कुछ नहीं दिया किन्तु पुत्र-शोक के समय उन्हें धन
से इस प्रकार परिपूर्ण कर दिया ॥२४॥
ऐसा कहकर, कथा कहने में कुशल गोमुख ने वत्सराज के पुत्र की आज्ञा से दूसरी कथा
आरम्भ की ॥२५॥
राजा कनकवर्ण की कथा
प्राचीन काल में गंगा के तट पर गंगाजल से पवित्र नाभरिकोंवाला कनकपुर नाम का
एक उत्तम नगर था ॥२६॥
उस नगर में यदि बन्ध था तो कवियों की वाणी में नियम और चरित्र में नहीं। यदि
छेदन था तो मञ्जर (मत्स्यन्दकार आदि) के पत्तों में छिद्र और वृत्ति में नहीं भंग था। तो नारियों
के केशों में बन्धन या प्रतिज्ञा में नहीं। खल (खलिहान) धान्यों के संग्रह के लिए थ जगता
में नहीं ॥२७॥
उस नगर का राजा कनकवर्ण महायशस्वी था जो नागराज वासुकि के पुत्र राजा प्रियदर्शन
से यशोधरा नाम की राजकुमारी से उत्पन्न हुआ था और जो समस्त भूमि के भार को वहन
करते हुए भी अ-शेष (समस्त गुणों से भूषित) था ॥२८-२९॥
राजा कनकवर्ण यश का लोभी था धन का नहीं पाप से डरता था शत्रुओ से नहीं
दूसरो की निन्दा करने मे मूर्ख था शास्त्रो में नहीं ॥३०॥
जिस महात्मा राजा के हाथ में अन्यता थी प्रगल्भता में नहीं और जिसकी मुट्ठी
धनुष में बँधी रहती थी दान में नहीं ॥३१॥
जिस आश्चर्यजनक सौन्दर्यशाली और संसार की रक्षा करनेवाले राजा के देखने मात्र
से सुन्दरियां काम-वेदना से विह्वल हो जाती थीं ॥३२॥