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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

२४१. सब्बदाठ जातक

दूसरा परिच्छेद
१०. सिगाल वर्ग
२४१. सब्बदाठ जातक
“सिगालोमानत्यट्ठो...” यह शास्ता ने वेळुवन मे विहार करते समय
देवदत्त के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
अजातशत्रु को प्रसन्न कर देवदत्त ने जो लाभ सत्कार पैदा किया था वह
उसे देर तक स्थिर न रख सका। नालागिरि (हाथी) का प्रयोग करने के
समय जो आश्चर्य देखा गया उस समय से वह लाभ-सत्कार नष्ट हो गया।
एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा मे बातचीत चलाई—आयुष्मानो, देवदत्त
लाभ-सत्कार पैदा करके चिरकाल तक स्थिर न रख सका। शास्ता ने आकर
पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर
शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने अपने लाभ-सत्कार को
नष्ट किया है, पहले भी नष्ट किया ही है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
उसका पुरोहित था, तीनो वेदो तथा अठारह शिल्पो में पारङ्गत। वह पृथ्वीजय
मन्त्र जानता था। पृथ्वीजय मन्त्र जापमन्त्र है।
एक दिन बोधिसत्व उस मन्त्र को सिद्ध करने की इच्छा से एक खुली
जगह में एक पत्थर पर बैठकर मन्त्र जाप करने लगा। वह मन्त्र किसी दूसरे

सब्बदाठ ] ४३३

विधिरहित व्यक्ति को नहीं सुनाया जा सकता था, इसीलिए वह वैसी जगह
जाप करने लगा था।
उसके पाठ करने के समय एक गीदड़ ने एक बिल में पड़े पड़े उस मन्त्र
को सुनकर अभ्यास कर लिया। वह अपने पूर्व-जन्म में पृथ्वीजय मन्त्र का
अभ्यासी एक ब्राह्मण था। बोधिसत्त्व ने पाठ कर चुकने पर कहा—मुझे
इस मन्त्र का अभ्यास हो गया। गीदड़ ने बिल से निकल कर कहा—भो
ब्राह्मण ! मुझे इस मन्त्र का तुझ से भी अधिक अभ्यास है। इतना कहकर
वह भाग गया।
बोधिसत्त्व ने यह सोच कि यह गीदड़ बहुत खराबी करेगा 'पकड़ो पकड़ो'
कहते हुए उसका पीछा किया। गीदड़ भागकर जंगल में जा घुसा। वहाँ
जाकर उसने एक गीदड़ी के शरीर में थोड़ा सा बुडका भरा। वह बोली—
स्वामी ! क्या है ? 'मुझे पहचानती है या नहीं ?' उसने कहा—स्वामी !
पहचानती हूँ।
उसने पृथ्वीजय मन्त्र का जाप कर सैकड़ों गीदड़ों को आज्ञा दे सब हाथी,
अश्व, सिंह, व्याघ्र, सूअर, मृग आदि चौपायों को अपने पास बुलाया। सब को
अपने अधीन कर स्वयं सब्बदाठ नामक राजा बन एक गीदड़ी को पटरानी
बनाया। दो हाथियों की पीठ पर सिंह बैठता। सिंह की पीठ पर पटरानी
सहित सब्बदाठ राजा बैठता। बड़ी शान थी।
वह ऐश्वर्य-मद में चूर हो, अभिमान के मारे वाराणसी राज्य जीतने
की इच्छा से सब चौपायों को ले वाराणसी से कुछ ही दूर पर आ पहुँचा।
बारह योजन की परिषद थी। उसने कुछ ही दूर से ही राजा के पास सन्देश
भेजा—राज्य दे अथवा युद्ध करे। वाराणसी निवासिया ने भयभीत हो डर
के मारे नगर के द्वार बन्द कर लिए।
बोधिसत्त्व ने राजा के पास आकर कहा—महाराज ! मत डरें। सब्ब-
दाठ गीदड़ के साथ युद्ध करने की जिम्मेवारी मेरी है। मेरे अतिरिक्त और
कोई उससे युद्ध नहीं कर सकता। उसने राजा तथा नगर वासियों को आश्वा-
सन दे सब्बदाठ क्या करके राज्य जीतेगा पूछने की इच्छा से नगर-द्वार की
अट्टालिका पर चढ़कर पूछा—सब्बदाठ ! क्या करके इस राज्य को लेगा ?
“सिंहनाद कराकर, जनसमूह को शब्द से भयभीत कर राज्य लूँगा।”
२८

[४३४] [ २.१०.२४१

बोधिसत्त्व ने “यह है” जान अट्टालिका पर चढ मुनादी करवा दी कि सारी
बारह योजन वाराणसी के नगर निवासी अपने अपने कानो के छिद्रो को माष
(की दाल) के आटे से लीप लें। जनता ने मुनादी सुन बिल्लियो से लेकर
सभी जानवरो के तथा अपने कानो के छिद्र माष के आटे से इस प्रकार लीप
लिए कि दूसरे का शब्द न सुन सके।
बोधिसत्त्व ने फिर अट्टालिका पर चढकर पुकारा---
“सब्बदाठ !”
“ब्राह्मण ! क्या है।”
“इस राज्य को कैसे ग्रहण करेगा।”
“सिंहनाद करवा कर, मनुष्यो को डरा कर, जान मरवा कर ग्रहण करूँगा।”
“सिंहनाद नही करवा सकेगा। जाति-सम्पन्न, लाल हाथ पाँव वाले,
केशर सिंह राज तेरे जैसे नीच गीदड की आज्ञा नही मानेंगे।”
गीदड ने अभिमान से चूर हो कहा--दूसरे सिंह रहें। जिस सिंह की पीठ
पर मै बैठा हूँ उसीसे सिंहनाद करवाऊँगा।
“यदि सामर्थ्य है तो सिंहनाद करवा।”
जिस सिंह पर बैठा था उसने उसे पांव से इशारा किया कि सिंहनाद कर।
सिंह ने हाथी के सिर पर मुंह रख तीन बार ऐसा सिंहनाद किया, जैसा कोई
न कर सके। हाथियो ने डरकर गीदड़ को पैरो मे गिरा पाँव से उसके सिर
को कुचल चूर्ण विचूर्ण कर दिया। सब्बदाठ वही मर गया। वे हाथी भी सिंह-
नाद सुनकर भय के मारे एक दूसरे से भिडकर वही मर गए। सिंहो को छोड़
कर शेष जितने भी खरगोश और बिल्ला से लेकर मृग सूअर आदि थे सभी
जानवर वही मर गए। सिंह भाग कर अरण्य मे चले गए। बारह योजन में
मास का ढेर लग गया।
बोधिसत्त्व ने अटारी से उतर नगर द्वारो को खोल मुनादी करा दी कि
सभी अपने कानो में से माष के आटे को निकाल दें और जिन्हे मास की जरूरत
हो मास ले जाएं। मनुष्यो ने गीला मास खाया और बाकी को सुखा कर
बल्लूर¹ बना लिया। कहते हैं उसी समय से मास सुखाना प्रारम्भ हुआ।

¹ बल्लूर=सूखा मांस।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला यह अभिसम्बुद्ध गाथाएँ कह जातक का

सुनख ] ४३५

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला यह अभिसम्बुद्ध गाथाएँ कह जातक का
मेल बैठाया—
सिगालो मानत्थद्धोव परिवारेन श्रत्थिको,
पापुणी महतिं भूमिं राजासि सब्बदाठिनं ॥
एवमेवं मनुस्सेसु यो होति परिवारवा,
सो हि तत्थ महा होति सिगालो विय दाठिनं ॥
[गीदड़ अभिमान मे चूर था। उसे और भी "परिवार" चाहिए था।
यह महान् पद को प्राप्त हो गया—सभी चौपायो का राजा हो गया। इसी
प्रकार मनुष्यो मे भी जिसका "परिवार" बडा होता है वह भी महान् हो जाता
है जैसे गीदड जानवरो मे।]
मानत्थद्धो अनुचरो के कारण उत्पन्न अभिमान से चूर। परिवारेन
अत्थिको और भी "परिवार" की इच्छा वाला होकर। महतिं भूमि महा-
सम्पत्ति को। राजासि सब्बदाठिन सब चौपायो का राजा था। सो हि तत्थ
महा होति जो परिवार युक्त आदमी है वह उन परिवारो में महान् होता है।
सिगालो विय दाठिन जैसे गीदड चौपायो मे महान् हुआ उसी प्रकार महान्
होता है। वह उस गीदड की तरह प्रमाद के कारण विनाश को प्राप्त होता है।
उस समय गीदड देवदत्त था। राजा सारिपुत्र था। पुरोहित तो में
ही था।

२४२. सुनख जातक
“बालो वतायं सुनखो . ” यह शास्ता ने जेतवन म विहार करते समय
अम्बल-कोष्ठक आसनशाला में भात खाने वाले कुत्ते के बारे मे कही।

क. वर्तमान कथा

४३६ [ २.१० २४२
क. वर्तमान कथा
उसके जन्म के समय से ही बहारो ने उसे वहाँ पोसा था। वह वहाँ भात
खाता हुआ आगे चलकर मोटा गया। एक दिन एक ग्रामवासी वहाँ आया।
उसने कुत्ते को देखा और बहारो को चादर तथा कार्षापण दे कुत्ते को चमड़े
के पट्टे से बाँध कर ले गया। वह ले जाने के समय भौंका नहीं। जो जो दिया
गया खाता हुआ पीछे पीछे गया।
तब उस आदमी ने सोचा कि अब यह मुझसे प्रेम करता है और पट्टा खोल
दिया। वह छूटते ही एक दौड़ में आसनशाला आकर पहुँचा। भिक्षुओं ने
उसे देख और उसका किया जान शाम को धर्मसभा में बातचीत चलाई—
'आयुष्मानो ! आसनशाला का कुत्ता बन्धन से मुक्त होने में चतुर है। छूटते
ही फिर आ गया है। शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत
कर रहे हो ?' 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, वह
कुत्ता केवल अभी बन्धन से मुक्त होने में चतुर नहीं है, पहले भी चतुर ही था।"
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी राष्ट्र के एक बड़े सम्पन्न घराने में पैदा हुए। बड़े होने पर गृहस्थी बसाई।
उस समय वाराणसी में एक आदमी के पास एक कुत्ता था। वह भात
के कौर खा खाकर मोटा गया। एक ग्रामवासी वाराणसी आया। उस कुत्ते
को देख, उस आदमी को चादर और कार्षापण दे, कुत्ते को चमड़े की डोरी से
बाँध डोरी के एक सिरे को पकड़ कर ले चला। चलते चलते जंगल के द्वार पर
एक शाला में दाखिल हो कुत्ते को बाँध एक तख्ते पर लेट कर सो गया। उस
समय बोधिसत्त्व ने किसी काम से उस जंगल में प्रवेश होते वक्त उस कुत्ते को
चमड़े की डोरी से बँधे बैठे देख पहली गाथा कही—
बालो बतायं सुनखो यो वरत्तं न खादति,
बन्धना च पमुञ्चेय्य असितो च घरं वजे ॥

गुगल ] ४३७
[ यह कुत्ता मूर्ख है जो चमड़े की डोरी को नहीं खाता है । (यदि खा डाले)
तो बन्धन से छूट जाए और भरे पेट ही घर चला जाए । ]
पमुञ्चेय्य मुखं घरं; अथवा पमोच्चेय्य ही पाठ है । असितो च घरं वने
भरे पेट ही अपने निवास-स्थान पर चला जाए ।
उसे सुन कुत्ते ने दूसरी गाथा कही—
अट्ठितं मे मनस्मिं मे अथो मे हृदये कतं,
कालञ्च पतिकङ्खामि याव पस्सुपतु जनो ॥
[ यह मेरा अधिष्ठान था, यह मेरे मन में था; और यह (तुम्हारा) कहना
भी हृदय में रख लिया। मैं समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जबकि लोग
सो जाएँ । ]
अट्ठितं मे मनस्मिं मे जो तुम कहते हो वह पहले से मेरा सङ्कल्प है, वह
मेरे मन ही में है । अथो मे हृदये कतं तुम्हारा वचन भी मैने हृदय में कर लिया
है । कालञ्च पतिकङ्खामि समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ । याव पस्सुपतु जनो
जब तक यह लोग सो जाते हैं, इन्हें नींद आ जाती है, तब तक मैं समय की
प्रतीक्षा करता हूँ । नही तो हल्ला हो जाएगा कि यह कुत्ता भाग रहा है।
इसलिए रात को जब सब सो जाएँगे चमड़े की डोरी खाकर भाग जाऊँगा ।
यह कहकर वह लोगो के सो जाने पर चमडे की डोरी खा, पेट भर कर,
भागा और अपने स्वामी के ही घर गया ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय का
कुत्ता इस समय का कुत्ता है । पण्डित पुरुष तो मैं ही था ।

'२४३. गुत्तिल जातक

४३८ [ २.१०.२४३ ]
'२४३. गुत्तिल जातक
"सत्ततन्ति सुमधुरं..." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
देवदत्त के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय भिक्षुओं ने देवदत्त से पूछा—आयुष्मान् देवदत्त ! सम्यक्
सम्बुद्ध तेरे आचार्य हैं। तूने सम्यक् सम्बुद्ध के कारण तीनो पिटक सीखे,
चारो ध्यान प्राप्त किए, अब आचार्य का विरोधी बनना उचित नहीं। देवदत्त
ने आचार्य का प्रत्याख्यान करते हुए कहा—आयुष्मान श्रमण गौतम मेरे कैसे
आचार्य हैं ? क्या मैंने अपनी सामर्थ्य से ही तीनो पिटक नहीं सीखे हैं तथा
चारो ध्यान नहीं प्राप्त किए हैं ?
भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! देवदत्त अपने
आचार्य का प्रत्याख्यान कर सम्यक् सम्बुद्ध का विरोधी बन महाविनाश
को प्राप्त हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर
रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, न केवल
अभी देवदत्त आचार्य का प्रत्याख्यान कर मेरा शत्रु बन नष्ट होता है, पहले भी
विनष्ट हुआ ही है।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य-करने के समय बोधिसत्त्व
गन्धर्व कुल में पैदा हुआ। उसका नाम हुआ गुत्तिल कुमार। यह बड़े होने पर
गन्धर्व-शिल्प में ऐसा पारङ्गत हुआ कि सारे जम्बूद्वीप में गुत्तिल गन्धर्व ही
सब गन्धर्वों से बढ़ गया। वह स्त्री का पालन न कर अपने अन्धे मातापिता
का पालन करता था।

गुत्तिल ] ४३६
उस समय वाराणसी निवासी बनियो ने व्यापार के लिए उज्जैनि जाकर
उत्सव घोषित होने पर चन्दा करके बहुत सा माला गन्ध विलेपन आदि तथा
खाद्य भोज्य ले क्रीडा-स्थान पर इकट्ठे हो कहा—कि वेतन देकर एक गन्धर्व
को लाओ । उस समय उज्जैनि मे मूसिल नामक ज्येष्ठ गन्धर्व था । उन्होने
उसे बुलवाकर अपना गन्धर्व बनाया ।
मूसिल वीणा भी बजाता था । उसने वीणा को स्वर चढ़ा कर बजाया ।
गुत्तिल गन्धर्व के गन्धर्व से परिचित उन लोगो को मूसिल का बजाना चटाई
खुजलाने जैसा प्रतीत हुआ । कोई भी कुछ न बोला । उन्होने अपनी प्रसन्नता
न प्रकट की । मूसिल ने उनकी प्रसन्नता न देखी तो सोचा—मालूम होता है
मै बहुत तीखा बजाता हूँ । उसने मध्यम स्वर चढा मध्यम स्वर से बजाया ।
वे तब भी उपेक्षावान् ही रहे । उसने सोचा—मालूम होता है यह कुछ नही
जानते । स्वय भी कुछ न जानने वाला बन उसने वीणा के तारों को ढीला
र बजाया । उन्होने तब भी कुछ न कहा ।
मूसिल बोला—भो व्यापारियो ! क्या आप लोग मेरे वीणा-वादन से
सन्न नही होते ?
"क्या तू वीणा बजाता था ? हम तो समझते रहे कि तू वीणा को कस
रहा है ।"
"क्या तुम मुझसे बढ़कर आचार्य को जानते हो ? अथवा अपने अज्ञान
के कारण प्रसन्न नही होते हो ?"
“वाराणसी मे जिन्होने गुत्तिल गन्धर्व का वीणा-वादन सुना है उन्हें
तुम्हारा वीणा बजाना ऐसा ही लगता है जैस स्त्रियाँ बच्चो को सन्तुष्ट कर
रही हों।"
"अच्छा, तो आपने जो खर्चा दिया है उसे वापिस ले । मुझे यह नही
चाहिए । लेकिन हाँ, वाराणसी जाते समय मुझे साथ लेकर जाएँ ।"
उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया । जाते समय उसे साथ वाराणसी
ले गए । वहीं 'यह गुत्तिल का निवासस्थान है' बताकर अपने अपने घर
चले गए ।
मूसिल ने बोधिसत्व के घर में प्रवेश कर वहाँ टँगी हुई बोधिसत्व की
बहुत ही अच्छी वीणा देख उतारकर बजाई । बोधिसत्व के माता पिता

४४० [ २४३
अन्धे होने के कारण उसे न देख सके। वे समझे चूहे वीणा खा रहे हैं।
इसलिए उन्होंने कहा—सू सू चूहे वीणा खा रहे हैं।
उस समय मूसिल ने वीणा रखकर बोधिसत्त्व के माता पिता को प्रणाम
किया। उन्होंने पूछा—कहाँ से आया ?
“उज्जेनी से आचार्य के पास शिल्प सीखने आया हूँ।”
“अच्छा।”
“आचार्य कहाँ हैं ?”
“तात ! बाहर गया है। आज आ जाएगा।”
यह सुन मूसिल वहीं बैठ गया। बोधिसत्त्व के आने पर, उसके द्वारा
कुशल समाचार पूछे जा चुकने पर उसने अपने आने का कारण कहा। बोधि-
सत्त्व अङ्गविद्या के जानकार थे। वे जान गए कि यह सत्पुरुष नहीं है।
उन्होंने अस्वीकार किया—तात ! जा तेरे लिए शिल्प नहीं है।
मूसिल ने बोधिसत्त्व के माता पिता के चरण पकड़े। उन्हें अपनी सेवा
से सन्तुष्ट कर उसने उनसे याचना की कि मुझे शिल्प सिखलवा दें। बोधिसत्त्व
ने माता पिता के बारबार कहने पर उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन न कर सकने
के कारण उसे शिल्प सिखा दिया।
वह बोधिसत्त्व के साथ राजदरबार जाता। राजा ने उसे देखकर पूछा—
आचार्य ! यह कौन है ?
“महाराज !• मेरा शिष्य है।”
वह शनै शनै राजा का विश्वासी हो गया। बोधिसत्त्व ने बिना कुछ
छिपाए अपना जाना सारा शिल्प सिखाकर कहा—तात ! शिल्प समाप्त
हो गया। उसने सोचा—मैंने शिल्प सीख लिया। यह वाराणसी नगर सारे
जम्बूद्वीप में श्रेष्ठ नगर है। और आचार्य भी बूढ़े हो गए हैं। मुझे यहीं
रहना चाहिए। उसने आचार्य से कहा—आचार्य ! मैं राजा की सेवा
करूँगा। आचार्य बोला—अच्छा तात ! मैं राजा से कहूँगा। उसने राजा
से जाकर कहा—“महाराज ! हमारा शिष्य देव की सेवा में रहना चाहता है।
उसको जो देना हो, जान।”
राजा बोला—‘आपको जितना मिलता है, आपके शिष्य को उसका
आधा मिलेगा।’ उसने मूसिल को वह बात कही। मूसिल बोला—“मुझे

४४२ [ २.१०.२४३ ]
"आचार्य्य ! जगल में क्यो दाखिल हुए हो ?"
"तू कौन है ?"
"मै शक्र हूँ।"
बोधिसत्त्व ने उसे 'देवराज ! मैं शिष्य के भय से जगल में दाखिल हुआ
हूँ' यह पहली गाथा कही—
सत्ततन्ति सुमधुर रामणेय्य अवाचायि,
सो म रङ्गमन्हि अव्हेति सरणम्मे होहि कोसिय ॥
अर्थ—हे देवराज ! मैने मूसिल नाम के शिष्य को सात तारो वाली सुमधुर
रमणीक वीणा जितनी मै जानता था उतनी सिखाई । अब वह मुझे रङ्गमंच
पर ललवारता है। हे कोसिय गोत्र (इन्द्र) ! तू मुझे शरण में ले।
शक्र उसकी बात सुन बोला—डरे मत । मै तुम्हारा त्राण करूँगा । मैं तुम्हें
शरण दूंगा। यह कह उसने दूसरी गाथा कही—
अह त सरण सम्म अहमाचरियपूजको,
न त जयिस्सति सिस्सो सिस्समाचरिय जेस्सति ॥
[ सौम्य ! मै तेरा शरणदाता हूँ। मै आचार्य्य की पूजा करने वाला हूँ।
शिष्य तुझे नही जीतेगा। आचार्य्य ही शिष्य को जीतेगा।]
अह त सरण मै शरण (-दाता हूँ), सहायक होकर, प्रतिष्ठा देकर त्राण
करूंगा। सम्म प्रिय वचन है। सिस्समाचरिय जेस्सति आचार्य्य ! तू वीणा
बजाता हुआ शिष्य को जीतेगा।
शक्र ने और भी कहा—"तुम वीणा बजाते हुए एक तार तोडकर छ ,
बजाना। वीणा से स्वाभाविक स्वर निकलेगा। मूसिल भी तार तोड देगा।
उसकी वीणा से स्वर न निकलेगा। उसी क्षण पराजित हो जाएगा। उसका
पराजित होना जान दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी, छटी और सातवी तार
भी तोड कर केवल वीणा-दण्ड ही बजाना। तार रहित खूंटियो से स्वर निकल
कर सारी बारह योजन की वाराणसी नगरी को ढक लेगा।" इतना कहकर

गुत्तिल ] ४४३
शक्र ने बोधिसत्त्व को तीन गोटियाँ दी और कहा—"सारे नगर पर वीणा
शब्द के छा जाने पर इनमें से एक गोटी आकाश में फेंकना। तुम्हारे सामने
तीनसौ अप्सराएं उतर कर नाचने लगेगी। उनके नाचने के समय दूसरी
फेंकना। दूसरी तीन सौ उतर कर वीणा के सिरे पर नाचने लगेगी। तब
तीसरी भी फेंकना। और तीन सौ उतर कर रङ्गमण्डप में नाचेंगी। मैं भी
तुम्हारे पास आऊँगा। जाएँ। डरे मत।"
बोधिसत्त्व पूर्वाह्ण समय घर गए। राजदरबार में भी मण्डप बनाकर
राजासन तैयार कर दिया गया। राजा प्रासाद से उतर सजे मण्डप में आसन
के बीच में बैठा। दस हजार अलङ्कृत स्त्रियो तथा अमात्य ब्राह्मण राष्ट्रिक
आदि ने राजा को घेर लिया। सभी नगरवासी इकट्ठे हो गए। राजाङ्गण
में चवको के साथ चक्के तथा मञ्चो के साथ मञ्च बँध गए। बोधिसत्त्व भी
स्नान करके, लेप कर, नाना प्रकार के श्रेष्ठ भोजन खा वीणा ले, अपने लिए
बिछे आसन पर बैठे। शक्र गुप्त रूप से आकाश में आकर ठहरा। केवल
बोधिसत्त्व ही उसे देख सकते थे। मूसिल भी आकर अपने आसन पर बैठा।
जनता घेर कर खडी हुई। आरम्भ में दोनो ने बराबर बराबर बजाया।
जनता ने दोनो के बजाने से सन्तुष्ट हो हजारो हर्ष-नाद किए।
शक्र ने आकाश में ठहर कर बोधिसत्त्व को ही सुनाते हुए कहा—एक
तार तोड दें। बोधिसत्त्व ने भ्रमर-तार तोड दी। वह टूटने पर भी टूटे हुए
सिरे से स्वर देती थी। देवगन्धर्व का सा स्वर निकलता था। मूसिल ने भी
तार तोड दी। उसमे से स्वर न निकला। आचार्य ने दूसरी—तीसरी करके
सातो तारे तोड दी। केवल दण्डे को बजाने से जो स्वर निकला उसने सारे
नगर को छा लिया। हजारो वस्त्र फेंके गए तथा हजारो हर्षनाद हुए। बोधि-
सत्त्व ने एक गोटी आकाश में फेंकी। तीन सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने
लगी। इस प्रकार दूसरी और तीसरी गोटी के फेंकने पर जैसे कहा गया उसी
तरह नौ सौ अप्सराएँ उतर कर नाचने लगीं।
उस समय राजा ने जनता को इशारा किया। जनता ने उठकर 'तू
आचार्य से विरोध कर उसकी बराबरी का प्रयत्न करता है। अपनी सामर्थ्य
नही देखता' कहते हुए मूसिल को डरा, जो जो हाथ में आया पत्थर डण्डे आदि
से चूर चूर कर, जान मार पैरो से पकड कूडे के ढेर पर फेक दिया। राजा

४४४ [ २.१०.२४३

ने सन्तुष्ट हो घनी वर्षा बरसाते हुए की तरह बोधिसत्त्व को बहुत धन दिया।
नगरवासियो ने भी वैसे ही किया।
शक्र ने भी उससे विदा लेते हुए कहा—"पण्डित ! मैं सहस्र घोड़ो वाले
आजानीय रथ के साथ मातली को भेजूंगा। तू सहस्र घोड़ो वाले श्रेष्ठ वैजयन्त
रथ पर चढ़कर देवलोक आना।" उसके वहाँ जाकर पाण्डुकम्बलशिलातल
पर बैठने पर देवकन्याओ ने पूछा—महाराज ! वहाँ गए थे ? शक्र ने उनको
यह बात विस्तार से बनाई और बोधिसत्त्व के सदाचार तथा प्रज्ञा की प्रशंसा
की। देवकन्याएँ बोली—महाराज ! हम आचार्य्य को देखना चाहती हैं।
उसे यहाँ लाएं।
शक्र ने मातली को बुला कर कहा—तात ! देवप्सराएँ गुत्तिल गन्धर्व
को देखना चाहती हैं। जा उसे वैजयन्त रथ में बिठाकर ला। उसने 'अच्छा'
कहा और जाकर बोधिसत्त्व को ले आया। शक्र ने बोधिसत्त्व का कुशल क्षेम
पूछ कहा—आचार्य्य ! देवकन्याएँ तुम्हारा गन्धर्व सुनना चाहती है।
"महाराज ! हम गन्धर्व लोग शिल्प से ही जीविका चलाते हैं। मूल्य
मिले तो गाऊँगा।"
"बजाएँ। मै तुम्हे मूल्य दूंगा।"
"मुझे और मूल्य की जरूरत नहीं। यह देवकन्याएँ अपना अपना सुकृत
कहें। ऐसा होने से मैं बजाऊँगा।"
देवकन्याएँ बोली—"आचार्य्य ! हम अपने किए सुकृत पीछे सन्तुष्ट
होकर कहेंगी। गन्धर्व करे।"
बोधिसत्व ने सप्ताह पर्य्यन्त देवताओ को गन्धर्व सुनाया। वह दिव्य-
वाद्य से भी बढ़ गया। सातवे दिन आरम्भ से देवकन्याओ का सुकृत पूछा।
काश्यप बुद्ध के समय एक भिक्षु को उत्तम वस्त्र देकर शक्र की परिचारिका
होकर उत्पन्न हुई, हजारो अप्सराओ से घिरी एक उत्तम देवकन्या से पूछा—
तू पूर्व जन्म में क्या कर्म करके (यहाँ) उत्पन्न हुई ?
उससे पूछा गया प्रश्न तथा उसका उत्तर विमानवत्थु¹ में आया है।
वहाँ कहा है—


¹खुद्दक निकाय का एक ग्रन्थ।

गुत्तित ] ४४५
"अभिक्कन्तेन वण्णेन या त्वं तिट्ठसि देवते,
ओभासेन्ती दिसा सब्बा ओसधी विय तारका ॥
केन ते तादिसो वण्णो केन ते इध मिज्झति,
उप्पज्जन्ति च ते भोगा ये केचि मनसो पिया ॥
पुच्छामि तं देवि महानुभावे
मनुस्सभूता किमकासि पुञ्ञं,
येनासि एवं जलितानुभावा
वण्णो च ते सब्बदिसा पभासति ॥"
[ हे देवते ! यह जो तेरा कान्तिपूर्ण वर्ण है, यह जो सारी दिशाएँ इस
प्रकार प्रकाशित है जैसे ओषधी तारा हो, सो यह तेरा ऐसा वर्ण किस कारण से
है ? तू किस कारण से यहाँ ऋद्धिमान् है ? जो भोग तुझे प्यारे लगते हों, वह
किस कारण से प्राप्त होते हैं ? हे महानुभाव देवि ! मैं तुझसे पूछता हूँ कि
मनुष्य योनि में तूने क्या पुण्य कर्म किया ? जिस कर्म के प्रभाव से तू प्रज्वलित
अनुभाव की है ? और तेरा वर्ण सब दिशाओं को प्रकाशित करता है । ]
"वत्थुत्तमदायिका नारी पवरा होति नरेसु नारिसु,
एवं पियरूपदायिका मनापं दिब्बं सा लभते उपेच्च ठानं ॥
पस्स मे पस्स विमानं अच्छरा कामवण्णिनीहमस्मि,
अच्छरासहस्सानं पवरा पस्स पुञ्ञानं विपाकं ॥
तेन मेतादिसो वण्णो तेन मे इध मिज्झति,
उप्पज्जन्ति च मे भोगा ये केचि मनसो पिया,
तेनम्हि एवं जलितानुभावा
वण्णो च मे सब्बदिसा पभासति ॥
[ उत्तम वस्त्र देने वाली नारी नरों में और नारियों में श्रेष्ठ होती है।
इस प्रकार प्रिय रूप देने वाली वह (नारी) मरकर सुन्दर दिव्य स्थान को
प्राप्त करती है। मेरे विमान को देखो। मैं इच्छित रूप धारण करने वाली
अप्सरा हूँ। मैं हजार अप्सराओं में श्रेष्ठ हूँ। यह पुण्य का फल है, देखो।
इसीसे मेरा ऐसा वर्ण है। इसीसे मैं ऋद्धिमान् हूँ। इसीसे मन को जो प्यारे
लगते हैं ऐसे भोग मुझे प्राप्त होते हैं। उसीसे मैं प्रज्वलित अनुभाव वाली हूँ।
उसीसे मेरा वर्ण सब दिशाओं को प्रकाशित करता है।]

४४६ [ २.१०.२४३

दूसरी ने भिक्षा मांगते हुए भिक्षु को पूजने के लिए पुष्प दिए। दूसरी
ने चैत्य में पञ्चाङ्गुलि चिह्न लगाने के लिए सुगन्धि दी। दूसरी ने मधुर
फलमूल दिए। दूसरी ने उत्तम रस दिया। दूसरी ने काश्यप बुद्ध के चैत्य पर
सुगन्धित पञ्चाङ्गुलि-चिन्ह लगाया। दूसरी ने रास्ते चलते भिक्षुओं तथा
भिक्षुणियों के घर में वास ग्रहण करने पर धर्म सुना। दूसरी ने नौका में बैठ
भोजन किए भिक्षु को पानी में खड़े हो पानी दिया। दूसरी ने गृहस्थ में रह
क्रोधरहित चित्त से सास ससुर की सेवा की। दूसरी ने अपने को मिले हिस्से
में से भी बाँट कर ही खाया और शीलवान् रही। दूसरी ने पराए घर में दासी
होकर क्रोध रहित मान रहित रह अपने हिस्से को बाँट कर खाया। इसीसे
वह देवराज की परिचारिका होकर पैदा हुई।
इस प्रकार गुत्तिलविमानवत्थु में आई सैंतीस देवकन्याओं ने जो जो कर्म
करके वहाँ जन्म ग्रहण किया वह सब बोधिसत्त्व ने पूछा। उन सब ने भी अपना
कर्म गाथाओं में ही कहा। यह सुन बोधिसत्त्व ने कहा—"मुझे बड़ा लाभ
हुआ। मुझे बड़ी प्राप्ति हुई। मैंने यह जो यहाँ आकर अल्पमात्र कर्म से भी
प्राप्त सम्पत्तियों की बात सुनी। अब यहाँ से मैं मनुष्यलोक जाकर दानादि
कुशल कर्म ही करूँगा।" यह कह उसने यह हर्ष वाक्य कहा—
स्वागतं वत मे अज्ज सुप्पभात सुवुद्वितं,
य अद्दसासि देवतार्यो अच्छरा कामवण्णियो ॥
इमासाह धम्म सुत्वान काहामि कुसलं बहुं,
दानेन समचरियाय सञ्जमेन दमेन च;
सोहं तत्थ गमिस्सामि यत्थ गन्त्वा न सोचरे ॥
[आज मेरा आना शुभ है। आज का प्रभात शुभ है। आज का उठना
शुभ है। आज मैंने इच्छित रूप धारण कर सकने वाली अप्सरा देवियों को देख
लिया। इनसे धर्म सुनकर मैं बहुत कुशल कर्म करूँगा। दान से, समचर्या
से तथा संयम के प्रताप से मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ जाकर आदमी सोचता नहीं है।]
सप्ताह के बाद देवराज ने मातली सारथी को आज्ञा दे बोधिसत्त्व को
रथ पर बिठा बाराणसी ही भेज दिया। उसने बाराणसी पहुँच देवलोक में
जो देखा था वह मनुष्यों को बताया। उस समय से मनुष्यों ने उत्साहपूर्वक
पुण्य-कर्म करना स्वीकार किया।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मूसिल

वोतिच्छ ] ४४७
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मूसिल
देवदत्त था। शक्र अनुरूद्ध था। राजा आनन्द था। गुत्तिल गन्धवं तो मैं ही था।
२४४. वीतिच्छ जातक
“यं पस्सति न तं इच्छति...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक प्लासिक परिव्राजक के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उसे सारे जम्बूद्वीप मे कोई शास्त्रार्थ करने वाला न मिला। उसने
श्रावस्ती पहुँचकर पूछा—मेरे साथ कौन शास्त्रार्थ कर सकता है ? उत्तर
मिला—सम्यक् सम्बुद्ध। उसने बहुत से आदमियो के साथ जेतवन पहुँच
कर चारो प्रकार की परिषद को धर्मोपदेश देते हुए तथागत से प्रश्न पूछा।
शास्ता ने उसके प्रश्न का उत्तर दे उससे प्रश्न पूछा—एक (चीज) क्या है ?
वह उत्तर न दे सकने के कारण उठकर भाग गया। बैठी हुई परिषद बोली—
भन्ते ! एक ही शब्द से परिव्राजक को हरा दिया। शास्ता ने कहा—“उपा-
सको ! न केवल अभी मैने उसको एक ही पद से हराया है, पहले भी हराया है।”
यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी राष्ट्र मे ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ। बड़े होने पर कामभोगो को छोड़
ऋषियो के प्रब्रज्या क्रम से प्रब्रजित हो दीर्घकाल तक हिमालय मे रहा। वह पर्वत
से उतर एक निगम-ग्राम के पास गङ्गा के मोड पर पर्णशाला में रहने लगा।

४४८ [ २१० २४४
एक परिव्राजक को सारे जम्बूद्वीप मे शास्त्रार्थ करने वाला न मिला।
उसने उस निगम में पहुँच पूछा—मेरे साथ शास्त्रार्थ कर सकने वाला कोई है ?
पता लगा—है। वह बोधिसत्व की प्रशसा सुन अनेक आदमियो के साथ
उसके निवासस्थान पर पहुँच, कुशल क्षेम पूछ कर बैठा। बोधिसत्व ने
पूछा—वनगन्ध से सुगन्धित गङ्गाजल पीएगा ? परिव्राजक ने शास्त्रार्थ
आरम्भ करते हुए कहा—कौनसी गङ्गा ? बालू गङ्गा है ? जल गङ्गा है ?
इधर का किनारा गङ्गा है ? अथवा उधर का किनारा गङ्गा है ? बोधिसत्व
ने उसे उत्तर दिया—परिव्राजक ! उदक, बालू, इधर के किनारे और उधर
के किनारे के अतिरिक्त और गङ्गा कहाँ है ? परिव्राजक को कुछ उत्तर न
सूझा। वह उठकर भाग गया। उसके भाग जाने पर बोधिसत्व ने बैठे हुए
लोगो को उपदेश देते हुए यह गाथाएँ कही—
यं पस्सति न त इच्छति
यञ्च न पस्सति तं किर इच्छति,
मञ्ञामि चिरं चरिस्सति
न हि तं लच्छति यं सो इच्छति ॥१॥
यं लभति न तेन तुस्सति
यं पत्थेति लद्धं हीळेति,
इच्छा हि अनन्तगोचरा
वीतिच्छानं नमो करोमसे ॥२॥
[ जिसे देखता है उसको इच्छा नही करता, जिसे नही देखता है उसकी
इच्छा करता है। मै समझता हूँ कि यह चिरकाल तक भटकेगा। जिसकी इच्छा
करता है वह इसे नही मिलेगा ॥१॥ जो मिलता है उससे सन्तुष्ट नही होता।
जिसकी इच्छा करता है वह मिलने पर उसका अनादर करता है। इच्छा की
गति अनन्त है। जो वीतिच्छा हैं, उन्हे हम नमस्कार करते हैं ॥२॥ ]
यं पस्सति जिस उदक आदि को देखता है, उसे गङ्गा नही मानता है।
यञ्च न पस्सति जिस उदक आदि से रहित गङ्गा को नही देखता उसकी
इच्छा करता है। मञ्ञामि चिरं चरिस्सति मै ऐसा मानता हूँ कि यह परि-
व्राजक इस प्रकार की गङ्गा को खोजत हुए चिरकाल तक भटकेगा, अथवा

मूलपरियाय ] ४४६
जैसे उदक आदि से रहित गङ्गा को उसी तरह रूप आदि से रहित आत्मा को भी
खोजते हुए ससार मे चिरकाल तक भटकेगा । न हि तं लच्छति चिरकाल तक
विचरते हुए भी वह जो इस प्रकार की गङ्गा या आत्मा की इच्छा करता है
उसे न प्राप्त कर सकेगा।
यं सम्भति जो उदक वा रूप आदि मिलता है उससे सन्तुष्ट नही होता ।
यं पत्येति लद्धं हीळेति इस प्रकार प्राप्त से असन्तुष्ट हो जिस जिस सम्पत्ति
को प्राप्त करता है, उस उस को प्राप्त करके 'इससे क्या' कहकर उसका अनादर
करता है, उसकी अवमानना करता है। इच्छा हि अनन्तगोचरा जो जो
प्राप्त हो उसका अनादर कर दूसरी दूसरी चीज की इच्छा करने के कारण
यह इच्छा, यह तृष्णा अनन्त गति वाली है। वीतिच्छान नमो करोमसे इसलिए
जो इच्छा रहित बुद्ध आदि हैं उनको हम नमस्कार करते हैं ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का
परिव्राजक ही इस समय का परिव्राजक है। तपस्वी तो मैं ही था।
२४५. मूलपरियाय जातक
"कालो घसति भूतानि .." यह शास्ता ने उक्कठ्ठा के पास सुभगवन में
विहार करते हुए मूलपरियाय सुत्त¹ के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय तीन वेदों में पारङ्गत पाँच सौ ब्राह्मणों ने (बुद्ध-) शासन में
प्रव्रजित हो तीनो पिटक सीख कर अभिमान में चूर हो सोचा-सम्यक् सम्बुद्ध
¹मज्झिम निकाय का प्रथम सुत्त।
२६ ०

४५० [ २.१०.२४५
भी तीन पिटक ही जानते हैं। हम भी जानते हैं। तब हमारा उनका क्या
अन्तर है? उन्होने बुद्ध की सेवा मे जाना छोड़ दिया। शास्ता की बराबरी
के होकर घूमने लगे।
एक दिन शास्ता ने उनके आकर पास बैठे रहने के समय आठ भूमियों
से सजाकर मूलपरियाय सुत्त का उपदेश दिया। उनकी कुछ समझ में नहीं
आया। तब उनको विचार हुआ—हम अभिमान करते हैं कि हमारे समान
पण्डित नही। लेकिन अब कुछ नही समझे। बुद्ध के सदृश पण्डित नही हैं।
अहो बुद्ध गुण ! उस समय से वह नम्र बन गए, जैसे जैसे सर्प के दांत उखाड
दिए गए हो, विष जाता रहा हो। शास्ता ने उक्कठ्ठा मे यथामिरुचि रहकर
वैशाली जा वहाँ गोतमक चेतिय मे गोतमकसुत्त का उपदेश दिया। हजार
लोकधातु कांप गई। उसे सुनकर वह भिक्षु अर्हत्व को प्राप्त हुए। मूल
परियाय सुत्त के उपदेश के अन्त म, जिस समय शास्ता उक्कठ्ठा में ही बिहार
करते थे, भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अहो बुद्धो
की शक्ति ! वे ब्राह्मण प्रव्रजित वैसे अभिमानी थे। उन्हे भगवान् ने मूल
परियाय सुत्त से मान-रहित कर दिया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ,
बैठे क्या बातचीत कर रहे हो? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—
भिक्षुओ, न केवल अभी इन अभिमानी सिर वालो को मान रहित किया है,
पहले भी किया है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत, कथा
पूर्व समय म वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ। बडे होने पर तीनो वेदो में पारङ्गत हो प्रसिद्ध आचार्य्य
बन पाँच सौ माणवको को मन्त्र बँचवाता था। वे पाँच सौ (माणवक) शिल्प
सीखकर, उसका अभ्यास कर सोचने लगे—'जितना हम जानते है, आचार्य्य
भी उतना ही। उसमे कुछ विशेष नही।' यह सोच वह अभिमान से चूर
हो आचार्य्य के पास न जाते, उसकी सेवा शुश्रूषा न करते। एक दिन जब
आचार्य्य बेर के वृक्ष के नीचे बैठा था, उन्होने उसे ठगने की इच्छा से बेर
के वृक्ष को नाखून से खुरच कर कहा—यह वृक्ष निस्सार है। बोधिसत्त्व ने
यह जान कि यह मुझे ठग रहे हैं कहा—शिष्यो ! एक प्रश्न पूछता हूँ।

मूलपरियाय ] ४५१

उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक कहा—पूछें, उत्तर देंगे। प्राचार्य ने प्रश्न पूछते हुए
पहली गाथा कही—
कालो घसति भूतानि सब्बानेव सहत्तना,
यो च कालघसो भूतो स भूत पचनिं पचि ॥
[ काल सभी प्राणियो को खाता है, अपने को भी (खाता है) । जो काल
को खाने वाला प्राणी है वह सब प्राणियो को जलाने वाली को जलाता हैं।]
कालो पूर्वाह्ण समय तथा अपराह्ण समय आदि । भूतानि प्राणी । काल
प्राणियो का चर्म मास आदि नोच नोच कर उन्हे नही खाता किन्तु उनकी
आयु, वर्ण बल को नष्ट कर यौवन को मर्दन कर आरोग्य का विनाश करता
हुआ खाता है। इस प्रकार खाता हुआ किसी को नही छोड़ता। सब्बानेव
खाता है। केवल प्राणियो को ही नही किन्तु सहत्तना अपने को भी खाता
है। पूर्वाह्ण अपराह्ण तक नही रहता, इसी प्रकार अपराह्ण आदि भी ।
यो च कालघसो भूतो यह क्षीणास्रव के लिए कहा गया है। वह आर्य्यमार्ग
से भविष्य के प्रतिसन्धि-ग्रहण करने के समय को नष्ट करने वाला होने से
कालघसो भूतो कहलाता है। स भूत पचनिं पचि उसने इस तृष्णा को, जो
प्राणियो को अपाय मे जलाती है, ज्ञानाग्नि से जला दिया, भस्म कर दिया ।
इसीसे भूतपचनिं पचि कहा जाता है। पजनिं भी पाठ है। जननि पैदा करने
वाली अर्थ है।
इस प्रश्न को सुनकर माणवको मे एक भी न जान सका । तब बोधिसत्त्व
ने कहा—तुम यह मत समझो कि यह प्रश्न तीनो वेदो मे हैं। तुम यह समझ
कर कि जो मैं जानता हूँ वह सब तुम जानते हो मुझे बेर का वृक्ष बनाते हो।
तुम यह नही जानते कि ऐसा बहुत है जिसे तुम नही जानते और मैं जानता
हूँ। जाओ, सात दिन का समय देता हूँ। इतने समय मे इस प्रश्न पर
विचार करो ।
'वे बोधिसत्त्व को प्रणाम कर अपने अपने निवासस्थान पर गए। वहाँ
सप्ताह भर सोचने पर भी न उन्हे प्रश्न का आरम्भ मिला न अन्त। वे सातव
दिन प्राचार्य के पास गए। प्रणाम करके बैठे। प्राचार्य ने पूछा—भद्रमुखो !

८ ४५२ [ २.१० २४६
प्रश्न समझ में आया ? वे बोले—नही जानते । बोधिसत्त्व ने फिर उनकी
निन्दा करते हुए दूसरी गाथा कही—
बहूनि नरसीसानि लोमसानि बृहन्ति च,
गीवासु पटिमुक्कानि कोचिदेवेत्थ कण्णवा ॥
अर्थ—बहुत आदमियों के सिर दिखाई देते हैं। वे बालो वाले हैं। सभी
बड़े बड़े हैं। गर्दनों पर रखे हैं। ताड के फल की तरह हाथ में पकड़े हुए
नहीं हैं। इन बातो में किन्ही में आपस में भेद नहीं है। लेकिन यहाँ कोई ही
कानवाला है। (यह अपने बारे में कहा) कण्णवा प्रज्ञावान् । कान का छेद
तो किसको नहीं है ?
इस प्रकार उन माणवकों की निन्दा कर कि तुम लोगो को कानो का
छेद मात्र ही हैं, प्रज्ञा नहीं है प्रश्न समझाया। उन्होने सुनकर 'ओह ! आचार्य्य
महान् होते हैं' क्षमा मांग नम्र हो बोधिसत्त्व की सेवा की।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पांच
सौ माणवक यह भिक्षु थे। आचार्य्य मैं ही था ।
२४६. तेलोवाद जातक
“हन्त्वा भत्वा वधित्वा च ” यह शास्ता ने वैशाली के आश्रय कूटा-
गार शाला में विहार करते समय सिंह सेनापति के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उसने भगवान् (बुद्ध) की शरण जा, निमन्त्रण दे, अगले दिन मास सहित
भोजन कराया। निगण्ठों ने उसे सुन कुपित हो असन्तुष्ट हो तथागत को
१ निगण्ठ=निर्ग्रन्थ=जैन सम्प्रदाय वाले साधु ।