जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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१०. सिगाल वर्ग
२४१. सब्बदाठ जातक
“सिगालोमानत्यट्ठो...” यह शास्ता ने वेळुवन मे विहार करते समय
देवदत्त के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
अजातशत्रु को प्रसन्न कर देवदत्त ने जो लाभ सत्कार पैदा किया था वह
उसे देर तक स्थिर न रख सका। नालागिरि (हाथी) का प्रयोग करने के
समय जो आश्चर्य देखा गया उस समय से वह लाभ-सत्कार नष्ट हो गया।
एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा मे बातचीत चलाई—आयुष्मानो, देवदत्त
लाभ-सत्कार पैदा करके चिरकाल तक स्थिर न रख सका। शास्ता ने आकर
पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर
शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने अपने लाभ-सत्कार को
नष्ट किया है, पहले भी नष्ट किया ही है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
उसका पुरोहित था, तीनो वेदो तथा अठारह शिल्पो में पारङ्गत। वह पृथ्वीजय
मन्त्र जानता था। पृथ्वीजय मन्त्र जापमन्त्र है।
एक दिन बोधिसत्व उस मन्त्र को सिद्ध करने की इच्छा से एक खुली
जगह में एक पत्थर पर बैठकर मन्त्र जाप करने लगा। वह मन्त्र किसी दूसरे