जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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क. वर्तमान कथा
उसके जन्म के समय से ही बहारो ने उसे वहाँ पोसा था। वह वहाँ भात
खाता हुआ आगे चलकर मोटा गया। एक दिन एक ग्रामवासी वहाँ आया।
उसने कुत्ते को देखा और बहारो को चादर तथा कार्षापण दे कुत्ते को चमड़े
के पट्टे से बाँध कर ले गया। वह ले जाने के समय भौंका नहीं। जो जो दिया
गया खाता हुआ पीछे पीछे गया।
तब उस आदमी ने सोचा कि अब यह मुझसे प्रेम करता है और पट्टा खोल
दिया। वह छूटते ही एक दौड़ में आसनशाला आकर पहुँचा। भिक्षुओं ने
उसे देख और उसका किया जान शाम को धर्मसभा में बातचीत चलाई—
'आयुष्मानो ! आसनशाला का कुत्ता बन्धन से मुक्त होने में चतुर है। छूटते
ही फिर आ गया है। शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत
कर रहे हो ?' 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, वह
कुत्ता केवल अभी बन्धन से मुक्त होने में चतुर नहीं है, पहले भी चतुर ही था।"
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
काशी राष्ट्र के एक बड़े सम्पन्न घराने में पैदा हुए। बड़े होने पर गृहस्थी बसाई।
उस समय वाराणसी में एक आदमी के पास एक कुत्ता था। वह भात
के कौर खा खाकर मोटा गया। एक ग्रामवासी वाराणसी आया। उस कुत्ते
को देख, उस आदमी को चादर और कार्षापण दे, कुत्ते को चमड़े की डोरी से
बाँध डोरी के एक सिरे को पकड़ कर ले चला। चलते चलते जंगल के द्वार पर
एक शाला में दाखिल हो कुत्ते को बाँध एक तख्ते पर लेट कर सो गया। उस
समय बोधिसत्त्व ने किसी काम से उस जंगल में प्रवेश होते वक्त उस कुत्ते को
चमड़े की डोरी से बँधे बैठे देख पहली गाथा कही—
बालो बतायं सुनखो यो वरत्तं न खादति,
बन्धना च पमुञ्चेय्य असितो च घरं वजे ॥