जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ेंसब्बदाठ ] ४३३
विधिरहित व्यक्ति को नहीं सुनाया जा सकता था, इसीलिए वह वैसी जगह
जाप करने लगा था।
उसके पाठ करने के समय एक गीदड़ ने एक बिल में पड़े पड़े उस मन्त्र
को सुनकर अभ्यास कर लिया। वह अपने पूर्व-जन्म में पृथ्वीजय मन्त्र का
अभ्यासी एक ब्राह्मण था। बोधिसत्त्व ने पाठ कर चुकने पर कहा—मुझे
इस मन्त्र का अभ्यास हो गया। गीदड़ ने बिल से निकल कर कहा—भो
ब्राह्मण ! मुझे इस मन्त्र का तुझ से भी अधिक अभ्यास है। इतना कहकर
वह भाग गया।
बोधिसत्त्व ने यह सोच कि यह गीदड़ बहुत खराबी करेगा 'पकड़ो पकड़ो'
कहते हुए उसका पीछा किया। गीदड़ भागकर जंगल में जा घुसा। वहाँ
जाकर उसने एक गीदड़ी के शरीर में थोड़ा सा बुडका भरा। वह बोली—
स्वामी ! क्या है ? 'मुझे पहचानती है या नहीं ?' उसने कहा—स्वामी !
पहचानती हूँ।
उसने पृथ्वीजय मन्त्र का जाप कर सैकड़ों गीदड़ों को आज्ञा दे सब हाथी,
अश्व, सिंह, व्याघ्र, सूअर, मृग आदि चौपायों को अपने पास बुलाया। सब को
अपने अधीन कर स्वयं सब्बदाठ नामक राजा बन एक गीदड़ी को पटरानी
बनाया। दो हाथियों की पीठ पर सिंह बैठता। सिंह की पीठ पर पटरानी
सहित सब्बदाठ राजा बैठता। बड़ी शान थी।
वह ऐश्वर्य-मद में चूर हो, अभिमान के मारे वाराणसी राज्य जीतने
की इच्छा से सब चौपायों को ले वाराणसी से कुछ ही दूर पर आ पहुँचा।
बारह योजन की परिषद थी। उसने कुछ ही दूर से ही राजा के पास सन्देश
भेजा—राज्य दे अथवा युद्ध करे। वाराणसी निवासिया ने भयभीत हो डर
के मारे नगर के द्वार बन्द कर लिए।
बोधिसत्त्व ने राजा के पास आकर कहा—महाराज ! मत डरें। सब्ब-
दाठ गीदड़ के साथ युद्ध करने की जिम्मेवारी मेरी है। मेरे अतिरिक्त और
कोई उससे युद्ध नहीं कर सकता। उसने राजा तथा नगर वासियों को आश्वा-
सन दे सब्बदाठ क्या करके राज्य जीतेगा पूछने की इच्छा से नगर-द्वार की
अट्टालिका पर चढ़कर पूछा—सब्बदाठ ! क्या करके इस राज्य को लेगा ?
“सिंहनाद कराकर, जनसमूह को शब्द से भयभीत कर राज्य लूँगा।”
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